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बेनजीर की राह पर बिलावल

Fri, 02 Feb 2018 06:57 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Fri, 02 Feb 2018 06:57 PM IST
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Bilawal on the road to Benazir
बिलावल
वह बहुत छोटे से थे और उनकी आंखों से आंसू टपक रहे थे। तब उनकी मां बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की सबसे युवा प्रधानमंत्री थीं। दरअसल हुआ यह था कि कारों के काफिले के नीचे दबकर उनके पिल्ले की मौत हो गई थी, जो शायद इन्हीं में से किसी एक कार के नीचे सो रहा था। बेनजीर ने अपने बेटे बिलावल के जन्म से संबंधित जानकारी काफी गोपनीय रखी थी, क्योंकि उन दिनों तत्कालीन सैन्य तानाशाह जनरल जिया उल हक चुनाव की घोषणा करने वाले थे और चाहते थे कि यह ऐसे समय हों, जब गर्भवती बेनजीर चुनाव प्रचार में हिस्सा ही न ल सकें। 

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बिलावल का जन्म 21 सितंबर, 1988 को जब हुआ, तो जिया उल हक अवाक रह गए, क्योंकि खुद बेनजीर ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि उनका प्रसव दो महीने बाद होना है और उन्होंने अपने सारे मेडिकल रिकॉर्ड काफी गोपनीय रखे थे। बाद के दिनों में जब बेनजीर विपक्ष में रहीं या फिर प्रधानमंत्री आवास पर, तब बिलावल ने पढ़ाई को तरजीह दी। खुद बेनजीर ने अपने बेटे और दोनों बेटियों को राजनीतिक चकाचौंध से दूर रखा था। बाद में जब वह लंबे समय तक दुबई में आत्मनिर्वासन में थीं, तब उन्होंने अपने बच्चों की कुछ विशेष तस्वीरें सार्वजनिक की थीं। ईद के मौके पर वह लोगों को शुभकामना वाले कार्ड भेजती थीं, जोकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के रंगों के होते थे और उनमें उनकी पारिवारिक फोटो भी होती थी, जिनमें उनके पति आसिफ अली जरदारी भी नजर आते थे। इन्हीं तस्वीरों से लोगों को पता चला था कि बिलावल कितने बड़े हो गए हैं। 

मां की मौत के बाद जब उनके जनाजे को उनके पुश्तैनी कब्रिस्तान ले जाया गया था, तब युवा बिलावल ने जिस विनम्रता के साथ शोकमग्न लोगों का अभिवादन किया था, उससे लोगों की आंखें भी भींग गई थीं। अचानक ऑक्सफोर्ड के क्लास रूम से बाहर उन्होंने खुद को कैमरों के बीच घिरा पाया। अब जबकि पाकिस्तान इस वर्ष गर्मियों में होने वाले आम चुनाव की तरफ बढ़ रहा है, तीस वर्ष के हो रहे बिलावल सिंध से पहली बार चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। अपनी मां की तरह उन्हें पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की कमान सौंपी जा चुकी है। सबकी नजरें भुट्टो परिवार के इस युवा पर है, जिनका राजनीति में आगाज हो रहा है। उधर, पंजाब में एक अन्य युवा की ओर सबकी नजरें हैं, और वे हैं एक अन्य पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पुत्री मरियम। वह भी पहली बार चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही हैं।

बिलावल लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को लेकर काफी संजीदा हैं। अपनी मां की तरह वह भी नारे लगाते हैं, जम्हूरियत सबसे अच्छा बदला है। उनकी अनुवांशिक जड़ें काफी मजबूत हैं और उनके व्यवहार में इसकी झलक मिलती है। अपनी मां ही नहीं, बल्कि नाना जुल्फीकार अली भुट्टो से भी उनमें काफी समानताएं हैं। धीरे-धीरे बिलावल अब मीडिया से रूबरू होने लगे हैं। 

थोड़े दिन पहले बिलावल ने कहा था, लोगों को मेरी उम्र और अनुभव के बारे में सवाल करने का वाजिब हक है। मैं सिर्फ यही कह सकता हूं कि नियति और पीपीपी (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) की सीईसी (केंद्रीय कार्यकारी समिति) ने साजिश कर मुझसे मेरा युवा छीन लिया, लेकिन मेरी मां की हत्या के बाद जब मैंने देखा कि पाकिस्तान किस बदहाली और संकट में है, तो मैंने खुद को उससे लड़ने के लिए तैयार किया। पत्रकार जब उनसे उनकी शादी के बारे में पूछते हैं, तो वह मुस्कराकर कहते हैं, 'मेरी बहनें मेरे लिए दुल्हन चुनेंगी। पहले उसे उन्हें संतुष्ट करना होगा।' 

इन दिनों बिलावल चुनाव के लिए अपनी पार्टी को संगठित करने में जुटे हुए हैं और नए लोगों को जोड़ रहे हैं। वह पीपीपी में वैसा ही जोश भरना चाहते हैं, जैसा कि इसमें जुल्फीकार अली भुट्टो के समय हुआ करता था। साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं को इस वर्ष होने वाले चुनाव के लिए तैयार करना है। वह जानते हैं कि उन्हें युवाओं के साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी साथ लेकर चलना होगा। हाल ही में दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान एक भारतीय मीडिया को दिए इंटरव्यू में बिलावल ने अपने जवाबों से सबको खासा प्रभावित किया था। वह जिस आत्मविश्वास से बात कर रहे थे, वह वाकई गौर करने लायक था। वास्तव में इस इंटरव्यू ने उन्हें खुद को एक भावी नीति नियंता के रूप में प्रदर्शित करने का अवसर दिया। 

2018 के चुनावों में बिलावल को सबसे बड़ी चुनौती पंजाब से मिलने वाली है। हाल ही में उन्होंने कहा, 'मुझे पंजाब में ज्यादा वक्त देना होगा। मुझे वहां पार्टी संगठन को पुनर्जीवित करना होगा और नए पदाधिकारी नियुक्त करने होंगे। मैं समझता हूं कि वहां एक ऐसी पार्टी के लिए काफी अवसर हैं, जो कि बिरादरी या वंश के बजाय विचारों और उम्मीदों की बुनियाद पर खड़ी है। पहले जिया उल हक और उसके बाद मुशर्रफ के समय के लंबे गैर राजनीतिक दौर में यहां विकास का दिखावा किया गया, शहरीकरण संबंधी परियोजनाएं अटकी रहीं।'

पीपीपी को किस तरह आगे ले जाया जाए, इसे लेकर आसिफ अली जरदारी और उनके बेटे बिलावल के बीच मतभेद रहे हैं। जरदारी चाहते थे कि पारंपरिक तरीके की राजनीति की जाए, जबकि बिलावल का मानना है कि बदलाव का समय आ गया है। वास्तव में कुछ खास राजनीतिक मुद्दों पर रुख बदलकर जरदारी ने बिलावल के लिए शर्मिंदगी की स्थिति पैदा की है।

 यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि बिलावल भुट्टो पीपीपी को कहां ले जाते हैं और संसद के भीतर उनका खुद का प्रदर्शन कैसा रहता है। नेशनल एसेंबली में बेनजीर ने बतौर सदन की नेता के साथ ही विपक्ष की नेता के तौर पर भी जिम्मेदारी निभाई थी। अगस्त, 2018 में जब आम चुनाव होंगे तब पता चलेगा कि बिलावल को कौन-सी कुर्सी मिलती है?
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