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बिहार की जनता का नरेंद्र मोदी पर भरोसा अटल
Thu, 12 Nov 2020 04:10 AM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी
Published by: नीरजा चौधरी
Updated Thu, 12 Nov 2020 04:10 AM IST
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नरेंद्र मोदी-नीतीश कुमार (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
बिहार विधानसभा का चुनाव एक ऐसे कठिन वक्त में हुआ, जब देश भयंकर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, जो कोविड महामारी के कारण और भी गहरा गया है, लोगों की नौकरियां चली गईं, लॉकडाउन के दौरान लाखों श्रमिकों को हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव-घर लौटना पड़ा। सीमा पर चीन ने हमारे देश के कुछ हिस्सों पर कब्जा जमा लिया है। इन तमाम चीजों के बावजूद अगर बिहार की जनता ने इस चुनाव में राजग गठबंधन पर अपना भरोसा जताया है, तो इसका साफ संदेश है कि लोगों ने आर्थिक संकटों से ज्यादा दूसरी चीजों को तवज्जो दी, जिसमें राष्ट्रवाद, हिंदूवाद, सवर्ण जातियों की पहचान और मोदी के ऊपर अटल भरोसा शामिल है।
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चुनाव प्रचार के दौरान इसकी काफी चर्चा हुई कि नीतीश कुमार के खिलाफ लोगों में जबर्दस्त गुस्सा है। नतीजों में भी साफ दिखता है कि 2015 की तुलना में उनकी सीटें काफी कम हुई हैं। लेकिन नीतीश कुमार की पार्टी जदयू की जितनी सीटें कम हुई हैं, लगभग उतनी ही सीटें उनकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी की बढ़ी हैं। इससे पहले ऐसा शायद ही कभी हुआ कि अगर किसी पार्टी अथवा मुख्यमंत्री के खिलाफ लोगों में गुस्सा है, तो उसकी सीटें कम हुईं और सरकार में जो सहयोगी पार्टी है, उसे जनता ने न सिर्फ जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया, बल्कि कहें तो उसे और ज्यादा सीटें देकर पुरस्कृत कर दिया। ऐसा न तो 2017 में पंजाब में हुआ, और न ही 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश में हुआ। उन दोनों जगहों पर अकाली दल और बसपा के साथ भाजपा को भी मतदाताओं के भारी गुस्से का शिकार होना पड़ा था। अगर ऐसा पहली बार हुआ है, तो यह साफ है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अब भी बरकरार है।
बिहार विधानसभा का चुनाव शुरू में तेजस्वी यादव के पक्ष में जाता दिख रहा था। उनकी रैलियों में जो युवाओं की भीड़ दिख रही थी, जो उत्साह था, वह आम तौर पर परिवर्तन की लहर के रूप में ही दिखता था। बिहार के युवा परिवर्तन और विकास, खासकर सरकारी नौकरियों के लिए परेशान हैं। ऐसे युवाओं के उत्साह पर सवार तेजस्वी के विजय रथ की रफ्तार को अगर किसी ने सुस्त किया, तो वह नरेंद्र मोदी थे। पहले चरण के मतदान के बाद साफ तौर पर तेजस्वी यादव को बढ़त दिख रही थी, लेकिन तभी दूसरे चरण के चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी ने उन्हें 'जंगलराज' का युवराज कहकर निशाना साधा। यही वह निर्णायक प्रहार था, जिसने लोगों को लालू यादव के कार्यकाल की अराजकता की याद दिला दी। और मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ मुड़ गया। एक बार फिर बिहार के चुनाव ने दिखा दिया है कि मोदी को लोग अलग ही नजरों से देखते हैं। चाहे कुछ भी हो जाए, उसका ठीकरा मोदी पर नहीं फूटता।
दूसरी बात जो बिहार विधानसभा के चुनाव में दिखी है, वह है तेजस्वी यादव नामक एक नए नेता का उभार, जो भाजपा पर सामने से निशाना साध सकता है। हालांकि तेजस्वी सरकार नहीं बना पा रहे हैं, लेकिन उनकी सीटों की संख्या उनके पिछले प्रदर्शन के लगभग बराबर ही है। और यह लालू यादव की छत्रछाया के बगैर हुआ है कि उनकी पार्टी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वह विपक्ष के एक नए सितारे के रूप में उभरे हैं। बिहार में भाजपा जो सीनियर पार्टनर के रूप में उभरी है, उसका भी एक पैटर्न है। जिन राज्यों में भाजपा कमजोर रहती है, वहां वर्षों से उसकी यह रणनीति रही है कि पहले गठजोड़ कर लो, सहयोगी दल के सहारे मजबूत हो जाओ और फिर जूनियर पार्टनर से सीनियर पार्टनर बन जाओ, जैसा कि महाराष्ट्र में हुआ। उसके बाद सीनियर पार्टनर बनकर पूरे राज्य की सत्ता पर कब्जा करो। यही इसकी रणनीति रही है और बिहार में यह उसी दिशा में बढ़ रही है, जिसमें इस बार उसकी मदद चिराग पासवान ने की है।
भाजपा ने ऐसी रणनीति बनाई कि सरकार में होते हुए भी उसके प्रति नाराजगी को अपने ऊपर नहीं आने दिया, बल्कि खुद को मजबूत ही किया। चिराग ने भाजपा की काफी मदद की, लेकिन अपनी स्वतंत्र राजनीति का उन्होंने नुकसान ही किया है। इसकी भी गारंटी नहीं है कि केंद्र में उन्हें मंत्री पद मिलेगा ही, क्योंकि नीतीश कुमार उसका विरोध कर सकते हैं। नीतीश कुमार बेशक कमजोर हुए हैं, लेकिन भाजपा अभी उनकी अनदेखी नहीं कर सकती। यह हो सकता है कि भाजपा उन्हें और कमजोर करने की कोशिश करे, उन पर दबाव बनाए, लेकिन अभी उन्हें छोड़ नहीं सकती, क्योंकि भाजपा को डर है कि वह कहीं दूसरे पक्ष से हाथ न मिला लें। महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ ऐसा करने का हश्र भाजपा भुगत चुकी है। तो यह बड़ी अजीब स्थिति है कि भाजपा को मजबूत करने में चिराग बहुत प्रभावी साबित हुए, लेकिन उनकी अपनी जमीन कमजोर हो गई, दूसरी तरफ नीतीश कुमार सबसे ज्यादा कमजोर हुए, लेकिन एक बार फिर वह बिहार की सत्ता के केंद्र में हैं।
कई राज्यों में हारने के बाद बिहार जीतने से भाजपा का मनोबल काफी बढ़ेगा। इसका फायदा भाजपा को अन्य राज्यों के चुनाव में भी होने वाला है। आर्थिक मुद्दे जो सामने आ रहे हैं, जिसकी चर्चा आर्थिक न्याय कहकर तेजस्वी ने भी की, वह आगे के चुनावों में भी उठेंगे। पर मोदी बहुत चतुराई से उसका ठीकरा खुद पर नहीं फोड़ने देते, बल्कि इसके लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। अगर विपक्ष को भाजपा की इस चतुराई से लड़ना है, तो इकट्ठा हुए बिना काम नहीं चलेगा। तेजस्वी ने बहुत बढ़िया ढंग से गठजोड़ किया था, लेकिन कांग्रेस उसके लिए कमजोर कड़ी साबित हुई। इस चुनाव में नीतीश कुमार से भी ज्यादा कांग्रेस को नुकसान हुआ है। नीतीश तो फिर भी मुख्यमंत्री बन जाएंगे, लेकिन कांग्रेस का तो मुस्लिम जनाधार भी हाथ से चला गया। सीमांचल में पांच सीटें ओवैसी की पार्टी को जाना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरनाक संकेत है।
कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को छोड़कर, जो भाजपा से लड़ सकती है अगर मुस्लिम मतदाता एक क्षेत्रीय पार्टी पर भरोसा जता रहे हैं, तो इसका मतलब है कि वे आज कांग्रेस से कितना निराश हैं। कांग्रेस को आत्ममंथन करने की जरूरत है और जब तक कांग्रेस में नेतृत्व के सवाल का समाधान नहीं निकलता, वह कुछ नहीं कर पाएगी। अगर तेजस्वी यादव कांग्रेस को कुछ कम सीटें देते, मुकेश साहनी की पार्टी को अपने साथ जोड़े रख पाते और वाम दलों को कुछ और सीट देते, तो शायद आज वह जीते होते। इसलिए भाजपा से लड़ने के लिए विपक्ष को छोटी-छोटी पार्टियों, नए लोगों को एकसाथ जोड़ने की कोशिश करनी होगी।