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बड़ा राज्य, बड़ी उम्मीदें
Sun, 10 Feb 2019 07:15 PM IST
Nootan Gupta
रवि श्रीवास्तव
रवि श्रीवास्तव
Published by: Nootan Gupta
Updated Sun, 10 Feb 2019 07:15 PM IST
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उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का बजट यह देखने का अवसर भी होता है कि सूबे की अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है। आर्थिक विकास के मुद्दे पर दशकों की उदासीनता को देखते हुए सूबे की तस्वीर बदलने का काम बेहद चुनौतीपूर्ण है।
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उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का बजट यह देखने का अवसर भी होता है कि सूबे की अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है। आर्थिक विकास के मुद्दे पर दशकों की उदासीनता को देखते हुए सूबे की तस्वीर बदलने का काम बेहद चुनौतीपूर्ण है।
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के तीसरे बजट को महत्वाकांक्षी बताया जा रहा है, जिसमें विकास की बात भी है, तो किसान, नौजवान और महिलाओं को तवज्जो देने की कोशिश भी है। इसमें लड़कियों के बेहतर लालन-पालन के लिए कन्या सुमंगला जैसी योजना है, स्वास्थ्य सेवाओं और नागरिक सुरक्षा पर ध्यान है, तो केंद्र सरकार के बजट से प्रेरित होकर आदित्यनाथ सरकार ने भी किसानों के उपज के लिए बेहतर कीमत, उन्नत बीज और सिंचाई योजनाओं के लिए 8,636 करोड़ रुपये का आवंटन किया है।
उसने गेहूं के समर्थन मूल्य में 105 रुपये की बढ़ोतरी की है तथा उन्नत बीज और खाद की उपलब्धता की भी बात कही है। सिर्फ उत्तर प्रदेश की बात नहीं है-हाल के दौर में कई दूसरी राज्य सरकारों ने भी किसानों के लिए इस तरह के कदम उठाए हैं। इसकी वजह सिर्फ चुनाव नहीं है, बल्कि यह है कि पूरे देश में किसानों की स्थिति बेहद खराब है।
किसानों को राहत प्रदान करने के लिए परंपरागत रूप से तीन कदम उठाए जाते हैं, जैसे-कर्ज माफी की घोषणा, फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना और किसानों के खाते में पैसे डालना। हालंकि सिर्फ इन उपायों से किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
उत्तर प्रदेश देश के उन राज्यों में से है, जहां खेती अर्थव्यवस्था का आधार है। लेकिन सूबे की कृषि क्षेत्र का जायजा लेने पर स्पष्ट होता है कि दशकों से यहां खेती को आधुनिक और लाभप्रद बनाने की कोशिशें नहीं हुईं। यहां व्यावसायिक खेती तुलनात्मक रूप से कम है। हालांकि गन्ने की खेती होती है, लेकिन उसकी हालत ठीक नहीं।
खेती-किसानी की तस्वीर बदलनी है, तो कृषि उत्पादन बढ़ाना होगा, किसानों की आमदनी में वृद्धि करनी होगी और हाल के दौर में खेती में किसानों की लागत जिस तरह बढ़ी है, उसमें उल्लेखनीय कमी लानी होगी। केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखे है, जिसके लिए क्रांतिकारी और नवाचार भरे कदम उठाने की आवश्यकता है। कृषि क्षेत्र की तस्वीर बदलनी है, तो दूरगामी कदम उठाए बिना वह संभव नहीं।
औद्योगिक क्षेत्र में उत्तर प्रदेश को आगे ले जाने के लिए तेज विकास की जरूरत है। अगर पहले की सरकारों ने दूरदर्शिता का परिचय दिया गया होता, तो उत्तर प्रदेश औद्योगिक नक्शे पर देश के दूसरे विकसित सूबों से होड़ ले रहा होता।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र चूंकि दिल्ली से सटा हुआ है, इसलिए वहां तो औद्योगिक प्रगति पर ध्यान दिया गया, लेकिन पूरे राज्य को उद्योग के क्षेत्र में आगे ले जाने की कोशिशें नहीं हुईं। उल्टे जिन क्षेत्रों में सूबे आगे था, उन क्षेत्रों में भी आगे बढ़ने की रूपरेखा बनाने का कोई प्रयत्न नहीं किया।
उत्तर प्रदेश लघु उद्योग के क्षेत्र में आगे रहा है, चाहे वह बनारस का हथकरघा रहा हो, भदोही-मिर्जापुर का कालीन उद्योग रहा हो, मुरादाबाद में पीतल का काम रहा हो, खुर्जा में पॉटरी का काम रहा हो। अगर इन छोटे उद्योगों को प्रोत्साहित किया गया होता और इन्हें वैश्विक नेटवर्क से जोड़े जाने की दूरदर्शिता दिखाई गई होती, तो उत्तर प्रदेश कब का आगे निकल चुका होता। लेकिन दशकों से जारी सरकारी उदासीनता के कारण यह क्षेत्र लगातार कमजोर हुआ है।
यहां तक कि वह चमड़ा उद्योग भी एक या दूसरी वजह से हतोत्साहित हुआ है, जो कभी इस सूबे की पहचान हुआ करता था। एकाधिक वजहों से निवेशकों ने भी यहां वैसी रुचि नहीं दिखाई।
उत्तर प्रदेश के बजट में पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे और रीजनल रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम के लिए कुछ अहम घोषणाएं हुई हैं, जो बताती हैं कि राज्य सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए गंभीर है।
यह अच्छी बात है। इससे सूबे के लोगों को जहां सहूलियत मिलेगी, वहीं पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। लेकिन सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट से राज्य में नया निवेश नहीं आएगा। पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट को सूबे के विकास का रामबाण मान लिया था, जो गलत साबित हुआ। इसलिए बेहतर हो कि आदित्यनाथ सरकार इसके साथ-साथ दूसरे जरूरी कदम भी उठाए।
योगी सरकार ने बुंदेलखंड और पूर्वांचल के विकास के लिए भी कुछ योजनाएं घोषित की हैं। इनमें बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों में पाइप के जरिये जलापूर्ति की योजना भी है। सूखे तालाबों के पुनरुद्धार और जलस्तर ऊपर उठाने की दूरगामी योजनाओं की भी बुंदेलखंड में उतनी ही आवश्यकता है, क्योंकि लगातार सूखा पड़ने के कारण ही इस क्षेत्र की हालत इतनी बदतर हुई है। दूरदर्शी कदम उठाकर ही बुंदेलखंड को विकास के रास्ते पर लाया जा सकता है।
बजट को इस तरह भी देखा जाता है कि इसमें आर्थिक अनुशासन का कितना ध्यान रखा गया है। इस लिहाज से देखें, तो बजट में पूंजीगत खर्च में कमी आई है, जबकि राजस्व खर्च में काफी बढ़ोतरी की गई है। केंद्र से ज्यादा राजस्व मिलने के बाद भी रिजर्व बैंक से उधार लेकर खर्च करने की नौबत आई है, जो खास तौर पर ध्यान देने लायक है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का बजट यह देखने का अवसर भी होता है कि सूबे की अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है। इस सूबे के बारे में बात करते हुए यह नहीं भूला जा सकता कि दशकों की उपेक्षा के कारण मानव विकास के मोर्चे पर देश के विकसित राज्यों की तुलना में यह पीछे है। मसलन, यहां सिर्फ औद्योगिक विकास ही सुस्त नहीं रहा है, बल्कि स्कूली शिक्षा की तस्वीर भी बेहतर नहीं है।
ऐसे ही बड़ा राज्य होने के कारण उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी अधिक है, और रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाने की प्रवृत्ति भी ज्यादा है। शकों से पिछड़े सूबे को एकाएक विकास के रास्ते पर नहीं ले आया जा सकता। लेकिन इस दिशा में अगर सिलसिलेवार ढंग से काम हो, तो यह लक्ष्य बहुत मुश्किल नहीं है।
-लेखक सेंटर फॉर इम्प्लॉयमेंट स्टडीज में प्रोफेसर और अध्यक्ष हैं।