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छोटी उम्र के बड़े अपराध

Wed, 03 Jun 2015 07:17 PM IST
क्षमा शर्मा
क्षमा शर्मा Updated Wed, 03 Jun 2015 07:17 PM IST
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Big crime of juvenile

यह दिल्ली में हुआ। अट्ठाइस साल का एक नौजवान शराब की दुकान में शराब पी रहा था। पास में ही उसकी फूलों की दुकान थी। काम खत्म करके वह शराब पीने आया था। तभी नौ और दस साल के दो बच्चे वहां आए। वे उस आदमी से पैसे मांगने लगे। जब उस आदमी ने पैसे देने से मना किया, तो उन्होंने उसे जान से मारने की धमकी दी। यह सुनकर उस आदमी को गुस्सा आ गया। उसने बच्चे को थप्पड़ मार दिया। लेकिन उसे अंदाज नहीं था कि आगे क्या होगा? जिस बोतल से वह शराब पी रहा था, उसी को बच्चे ने हिंदी फिल्मों के दृश्यों की तरह, आदमी के ही सिर से मारकर तोड़ा और टूटे हुए कांच से उसका गला काट दिया। अपने कटे गले के साथ उस आदमी ने भागने की भी कोशिश की, मगर ज्यादा खून बह जाने के कारण वहीं ढेर हो गया। इतने छोटे बच्चों ने जिस तरह किसी भाड़े के एक्सपर्ट या सुपारी किलर और हत्यारों की तरह हत्या की, वह हैरतअंगेज है।

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पूछताछ के बाद पुलिस ने बताया कि वे बच्चे कूड़ा बटोरने का काम करते हैं। मृतक बच्चों का परिचित था। वह अक्सर उन्हें खाना खिलाया करता था। वह उनकी मदद भी करता था। बच्चों के पिता रिक्शा चलाते हैं। एक साल पहले वे मदनपुर खादर के अपने घर से भाग आए थे और गोविंदपुरी में मंदिर के पास रहते थे। उन्हें नशे और ड्रग्स लेने की भी आदत है। बहरहाल, जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट के अंतर्गत उन्हें सुधार गृह में भेज दिया गया है। ज्यादा से ज्यादा तीन साल का समय वहां उन्हें काटना होगा। सुधार गृहों में बच्चे कितने सुधरेंगे, यह बात तो हम सभी जानते हैं!
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नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की मानें, तो चौदह से सत्रह साल के किशोर इन दिनों बहुत बड़े अपराध करते हैं। 2013 में ऐसे 28,000 किशोर पकड़े गए थे। इनमें से 3,887 ने हत्या, भाड़े पर हत्या, दुष्कर्म, डकैती आदि संगीन अपराध किए थे। लेकिन नौ से दस साल के बच्चों का इस तरह से हत्या करना डराता है। क्या इसके लिए सिर्फ मीडिया और फिल्मों को दोष दिया जा सकता है? अपराध के प्रति किसी तरह की शर्म या अपराध भावना का न होना यह भी बताता है कि ये बच्चे कितनी छोटी उम्र में ही बड़े बन गए। सोचने की बात यह भी है कि जब वे घर से भागे, तो लौटकर घर क्यों नहीं गए? ऐसी कौन-सी मजबूरी थी कि घर की सुरक्षा, माता-पिता का प्यार और देखभाल छोड़कर वे बाहरी दुनिया की ओर आकर्षित हो गए। या कि घर में ऐसा कुछ था-मार-पिटाई, हिंसा, डांट-डपट, भूख- जिस कारण उन्हें घर के मुकाबले बाहर का संसार पसंद आया।
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घर से भागने वाले बच्चे अक्सर घर नहीं लौट पाते या वे लौटना नहीं चाहते। पुलिस की मदद से ऑपरेशन मिलाप जैसे कार्यक्रमों के जरिये कुछ लौटते भी हैं, तो उनमें से कई दोबारा भाग जाते हैं। लेकिन जहां इन दोनों बच्चों का घर था- मदनपुर खादर और जहां ये इतने दिनों से रहते थे, इन दोनों जगहों में ज्यादा दूरी भी नहीं है। दोनों दिल्ली में ही हैं। सवाल यह है कि क्या वे न लौटे, या शायद घरवालों ने भी उन्हें ढूंढने की कोई कोशिश नहीं की। बहरहाल, यह कहा नहीं जा सकता कि सुधार गृह में जाकर भी वे सुधरेंगे या अपराधों के नए-नए तरीके सीखेंगे। मगर इस तरह की घटनाएं हमारे समाज में बढ़ रही हिंसा का खतरनाक संकेत तो हैं ही।

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