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रक्षा क्षेत्र में बड़े बदलाव जरूरी

Thu, 10 Apr 2014 07:28 PM IST
मनोज जोशी
मनोज जोशी Updated Thu, 10 Apr 2014 07:28 PM IST
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Big change need in defence sector

हाल ही में एक टेलीविजन चैनल को दिए इंटरव्यू में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने यूपीए सरकार पर न केवल विदेश और रक्षा नीति के क्षेत्र में नाकामयाब रहने का आरोप लगाया, बल्कि आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी इसे विफल बताया। नरेंद्र मोदी के ये आरोप शीशे के माफिक साफ हैं। उन्होंने रक्षा मंत्री और सैन्य बलों के बीच खराब रिश्तों का हवाला देते हुए हाल में हुए सिंधुरक्षक हादसे का उल्लेख किया। उन्होंने फैसले लेने के सरकार के तौर-तरीकों पर भी सवाल खड़े किए। उनके मुताबिक, यूपीए की नीतियों में राष्ट्रीय सुरक्षा की कोई जगह ही नहीं थी। इसी का नतीजा है कि सैन्य ढांचे के आधुनिकीकरण में देश नाकामयाब रहा है। मोदी कहते हैं, 'अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें रक्षा उपकरणों का विनिर्माण करना चाहिए। आयात पर निर्भर होने के बजाय हमें एक निर्यातक देश बनने की कोशिश करनी चाहिए। '

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दरअसल पिछले काफी समय से मोदी रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण के विकास की बात करते आ रहे हैं। मार्च, 2012 में उन्होंने घोषणा की थी कि राज्य में रक्षा उपकरणों के विनिर्माण के लिए गुजरात सरकार एक नीति बनाएगी। तब टाट्रा ट्रक मुद्दे की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, 'सेना के लिए जरूरी ट्रक भी आयात किए जाते हैं।' तब से वह कई बार आयातों में कटौती करने की बात कर चुके हैं।
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मोदी में जिस तरह का जुनून दिख रहा है, वह देश के लिए अच्छा है। दरअसल सैन्य उद्योग क्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा सरकारी स्वामित्व वाली सार्वजनिक रक्षा इकाइयों और आयुध फैक्टरियों के नियंत्रण में है, इससे पूरा सैन्य उद्योग जाम-सा हो गया है। इसमें दोष रक्षा मंत्रालय का भी है, जो इन इकाइयों पर नजर रखती है, और जिसने निजी रक्षा विनिर्माता कंपनियों के विकास पर लगाम खींची हुई है। गौरतलब है कि टाटा, महिंद्रा और रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों की रक्षा विनिर्माण इकाइयां हैं। लेकिन इन्हें मामूली अनुबंधों का ही हिस्सा बनाया गया है। इससे रक्षा उद्योग के विकास के मद्देनजर देश में मौजूद अकूत संभावनाओं के साथ न्याय नहीं हो पाता है।
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सरकारी स्वामित्व वाली इन फैक्टरियों की काहिली टाट्रा समझौते के मामले में साफ देखी जा सकती है, जिसके चलते अब तक भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड ट्रकों के स्वदेशी उत्पादन में कामयाब नहीं हो पाई है। दरअसल स्वदेशीकरण को रोकने से सार्वजनिक रक्षा उपक्रमों के अधिकारियों को दोहरा फायदा होता है। एक ओर, अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता को लेकर किसी भी जिम्मेदारी से उनका बचाव होता है, तो दूसरी ओर इससे उन्हें मौद्रिक लाभ भी होता है। टाट्रा के मामले की सीबीआई जांच चल ही रही है। इसी तरह 2009 में आयुध फैक्टरी बोर्ड के पूर्व चेयरमैन को ठेकों की एवज में घूस लेने के कारण गिरफ्तार किया गया था।

सेना के लिए शक्तिमान और निसान ट्रक बनाने वाली जबलपुर व्हीकल फैक्टरी की कहानी तो और भी हतप्रभ करने वाली है। जब ये दोनों वाहन पुराने माने जाने लगे, तो फैक्टरी को बंद करने के बजाय सरकार ने एक अविश्वसनीय कदम उठाया। गौरतलब है कि तब तक टाटा मोटर्स और अशोक लीलैंड के तौर पर भारत में ट्रकों के विनिर्माण के लिए निजी क्षेत्र का खासा विकास हो चुका था। मगर सरकार ने टाटा और अशोक लीलैंड से पुर्जे मंगाने शुरू किए, जिन्हें आयुध फैक्टरी में जोड़ा जाता था। रोचक यह है कि जबलपुर व्हीकल फैक्टरी के लोगो वाले वाहनों पर टाटा का लोगो भी देखा जा सकता है। इसके बाद सरकार ने अशोक लीलैंड और टाटा से ट्रकों को खरीदना शुरू कर दिया।

बात केवल राष्ट्रीय उद्यम या देश के युवाओं को रक्षा उपकरणों के विनिर्माण से जोड़ने की नहीं है। अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उन्हें रक्षा अनुसंधान और विकास के साथ सरकारी स्वामित्व वाले रक्षा विनिर्माण तंत्र में गंभीर सुधार करने होंगे।

इसके अलावा सरकार को निजी क्षेत्र को भी बराबर का मौका देना होगा। सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों को लाइसेंस जारी करने के बजाय सरकार को रक्षा उत्पादों के विनिर्माण के लिए खुले टेंडर की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को चुना जा सके, चाहे वह सरकारी हो, या निजी। इसमें सबसे बड़ी चुनौती वार्षिक बजटिंग प्रक्रिया में बदलाव की होगी। जब तक किसी समझौते पर सरकार बहुवर्षीय फंडिंग का वायदा नहीं करती, तब तक निजी क्षेत्र की कोई भी कंपनी प्लांट की स्थापना पर निवेश के लिए कदम नहीं बढ़ाने वाली।


राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर रक्षा उद्योग पर सरकारी नियंत्रण की जरूरत बताने वाले तर्क बिल्कुल बेमानी हैं। यह मानना फिजूल है कि सरकारी कंपनियों में काम करने वाले ही देशभक्त होते हैं। जहां तक दस्तावेजों को गुप्त रखने की बात है, निजी क्षेत्र के कर्मचारी भी ऐसा कर सकते हैं। आखिरकार आज सैकड़ों आईटी कर्मचारी साइबर सुरक्षा जैसे संवेदनशील मसले पर सरकार की मदद कर ही रहे हैं। चूंकि सरकारी क्षेत्र में अपेक्षित कुशलता नहीं होती, इसीलिए इसके उत्पादों का मूल्य निजी क्षेत्र की तुलना में ज्यादा होता है। आयुध फैक्टरियां और सार्वजनिक रक्षा उपक्रम 50 और 60 के दशक में प्रासंगिक थे, जब देश में औद्योगिक क्षेत्र का पर्याप्त विकास नहीं हुआ था, और निजी क्षेत्र इसमें हाथ डालने का इच्छुक नहीं होता था। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। हमारे पास विश्वस्तरीय निजी क्षेत्र है। जिसका फायदा उठाना चाहिए।

(लेखक, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के जाने माने फेलो हैं)

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