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दिल्ली में बड़ा दांव
Fri, 10 Jan 2020 06:22 PM IST
Raman Singh
के. एस. तोमर
के. एस. तोमर
Published by: Raman Singh
Updated Fri, 10 Jan 2020 06:22 PM IST
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दिल्ली विधानसभा चुनाव
- फोटो : a
आगामी आठ फरवरी को होने वाले महत्वपूर्ण दिल्ली विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। यह चुनाव भाजपा के लिए परीक्षा होगा, क्योंकि बिहार में भावी एनडीए गठबंधन पर इसका असर पड़ने की संभावना है।
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दिल्ली विधानसभा चुनाव को मोदी बनाम केजरीवाल बनाने के भाजपा के फैसले को एक बड़ा दांव माना जा रहा है, क्योंकि यह फिर से नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी), अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने जैसे राष्ट्रवादी नारे की प्रासंगिकता और वोट बटोरने की क्षमता तथा राजधानी के मतदाताओं के मानस पर प्रभाव छोड़ने वाले भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा दोहराए जाने वाले 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' जैसे नारे के असर की परीक्षा होगी।
हाल ही में राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़ने पर झारखंड में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। उसके बाद भाजपा के रणनीतिकारों, जिसमें मोदी, शाह और नड्डा शामिल हैं, ने प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को दांव पर लगाने का फैसला किया है, जिन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 300 से अधिक सीटों पर जीत दिलाई थी। इसके अलावा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और देश के कई परिसरों में हुई हिंसा भी इस चुनाव में मुद्दा बनेगी, क्योंकि इसे वाम बनाम संघ के रूप में पेश किया जा रहा है। भाजपा को, जो जेएनयू को देशद्रोहियों की फैक्टरी के रूप में चित्रित करती है, उम्मीद है कि इस पर उसे मध्यवर्गीय और हिंदू मानसिकता के मतदाताओं की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलेगी। साथ ही दिल्ली में बांग्लादेशी घुसपैठियों की बड़ी गंभीर समस्या है, जिसका सीएए और एनआरसी के जरिये फायदा उठाया जा सकता है, खास तौर पर इसके खिलाफ प्रदर्शन करने वाले वामपंथी झुकाव वाले लोगों, छात्रों और तटस्थ युवाओं के खिलाफ कार्रवाई करके। अगर दिल्ली में यह दांव भाजपा के पक्ष में काम कर जाता है, तो पश्चिम बंगाल, बिहार आदि के भावी चुनावों में भाजपा पीछे मुड़कर नहीं देखेगी। आखिरकार एनडीए, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के भावी गठजोड़ इन चुनावों के नतीजों पर निर्भर करेगा, जो राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों की दृष्टि से मतदाताओं की प्रासंगिकता और प्राथमिकता तय करेगा, हालांकि झारखंड ने एक स्पष्ट रेखा खींच दी है।
इस लिहाज से दिल्ली विधानसभा का चुनाव भारतीय राजनीति के लिए गेम चेंजर हो सकता है। वर्ष 2015 में आम आदमी पार्टी (आप)ने दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को मात्र तीन सीटें ही मिली थीं। कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई थी और उसके 63 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी, जिनमें कई प्रमुख नेता शामिल थे। आप को 54.3 फीसदी, भाजपा को 32.2 फीसदी और कांग्रेस को मुश्किल से 9.7 फीसदी वोट मिले थे।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा अभी भले आक्रामक नहीं दिख रही हो, लेकिन वह हर गुजरते दिन के साथ असीमित संसाधनों (जो इन दिनों चुनाव जीतने के लिए आवश्यक हैं) के साथ अकल्पनीय गति से सामने आएगी। भाजपा 1,728 अवैध कॉलोनियों को नियमित करने, उन्हें आयकर छूट में राहत देने और संपत्ति की रजिस्ट्री पर न्यूनतम 9.5 फीसदी शुल्क लगाने के मुद्दे को जोर-शोर से उठाएगी, जिसका उद्देश्य केजरीवाल के वोट बैंक में सेंध लगाना है।
इसके विपरीत आप बिजली और पानी बिल में भारी कटौती, बसों में महिलाओं की मुफ्त यात्रा, मोहल्ला क्लिनिक और सरकारी स्कूलों की सफलता जैसे लोकप्रिय उपायों पर ध्यान केंद्रित करेगी। एक आश्चर्यजनक राजनीतिक कदम के रूप में केजरीवाल ने एक वर्ष पूर्व मोदी को कोसने की अपनी रणनीति बदल दी है और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है, जो तार्किक लगता है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि जब भाजपा ने 300 से ज्यादा सीटें जीती, तो प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी। उनके करिश्मे का कारण केजरीवाल की आलोचना का लोगों के मानस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। केजरीवाल खुद को भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की उदासीनता के शिकार के रूप में दिखाने की कोशिश करेंगे, जिसके अधीन दिल्ली पुलिस और दिल्ली के उप राज्यपाल आते हैं, जिन्होंने उनकी सरकार को असहाय बना दिया। इसके अलावा केजरीवाल ने जाने-माने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सेवाएं ली हैं। आप भाजपा को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने की चुनौती दे सकती है, जो भाजपा के लिए मुश्किल हो सकता है। आप के पास भाजपा और संघ की तरह प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं, इसलिए मुकाबला करो या मरो जैसा दिलचस्प हो सकता है।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि दुर्भाग्य से कांग्रेस राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद दयनीय स्थिति से गुजर रही है, हालांकि सोनिया गांधी गड़बड़ियों से बेहतर ढंग से निपट रही हैं, लेकिन उनके पास सत्ता छीनने लायक क्षमता नहीं है। इस बात का भी डर है कि धर्मनिरपेक्ष वोट आप और कांग्रेस के बीच बंट सकता है, जो अल्पसंख्यक मतदाताओं पर निर्भर करेगा, जो अपना वोट बर्बाद नहीं करना चाहेंगे और भाजपा को हराने की क्षमता रखने वाली आप को वोट दे सकते हैं। शीला दीक्षित के निधन के बाद पार्टी में प्रदेश स्तर पर कोई प्रभावी चेहरा नहीं है। पर्यवेक्षकों को लगता है कि कांग्रेस दिल्ली में सीएए और एनआरसी विरोधी भावनाओं पर जोर दे सकती है, क्योंकि उसने प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है, जिसमें मुख्य रूप से छात्र और युवा शामिल हैं।
इस पृष्ठभूमि में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा और आप द्वारा किस तरह से प्रचार किया जाता है और कौन-कौन से मुद्दे उठाए जाते हैं। पूरे देश की नजर इस चुनाव पर होगी, क्योंकि भावी गठबंधनों पर इसके नतीजे का असर पड़ सकता है। इस चुनाव का नतीजा यह भी तय करेगा कि क्या मोदी का करिश्मा बरकरार है या भाजपा इस चुनाव को मोदी बनाम केजरीवाल बनाकर गलती कर रही है, क्योंकि जब केंद्र के चुनाव की बात आती है, तो मतदाता उन्हें ही तवज्जो देते हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में उनके करिश्मे की परीक्षा करना एक बड़ा जोखिम हो सकता है।