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बाइडन-जिनपिंग बातचीत: जी-20 को छोड़ें, जी 2 टी बनाएं

Wed, 17 Feb 2021 06:25 AM IST
शंकर अय्यर शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Published by: शंकर अय्यर Updated Wed, 17 Feb 2021 06:25 AM IST
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Biden-Jinping conversation: skip G20, create G2T
Joe Biden and Xi Jinping - फोटो : PTI (File Photo)

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पिछले हफ्ते पहली बार बहुप्रतीक्षित बातचीत हुई। दो घंटे की बातचीत से पता चलता है कि बाइडन ने ताइवान, शिंझियांग और हांगकांग जैसे संवेदनशील मुद्दों को उठाया, लेकिन अभी इसकी विवेचना बाकी है और यह देखना भी कि आगे क्या होगा। शीतयुद्ध की एक सुंदर बात यह थी कि प्रमुख खिलाड़ी उतावलेपन और बयानबाजी से परे उबाल को नियंत्रित रखते थे। अमेरिका और चीन के बीच उभरते टकराव में भविष्य की सारी अनहोनी घटनाएं निहित हैं। 


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स्पष्ट रूप से वर्चस्व की लड़ाई का भू-राजनीतिक प्रभाव होता है और यह विश्व की नई व्यवस्था को प्रभावित करेगा। अमेरिका और चीन के पास 85 ट्रिलियन यानी 850 खरब डॉलर के वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का एक तिहाई हिस्सा से भी ज्यादा है और करीब दस खरब डॉलर का सैन्य खर्च है। अभी शुरुआत है। भले ही अमेरिका-चीन का गतिरोध एक प्रतिस्पर्धी या टकराव भरा मुकाबला हो, दोनों देश आने वाले वर्षों में अन्य क्षेत्रों के अलावा प्रौद्योगिकी, सैन्य शक्ति और व्यापार में वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा को परिभाषित करेंगे। आम समझ कहती है कि जब विशालकाय हाथियों में लड़ाई हो, तो अनुषांगिक क्षति का खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ेगा, जो बीच में फंसेंगे। दिलचस्प है कि बाइडन-शी की वार्ता से एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में एक नई विश्व व्यवस्था में परिवर्तन के दर्शन का आह्वान करते हुए कहा कि उभरती हुई विश्व व्यवस्था में भारत को अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए परिवर्तन की गति को तेज करने की आवश्यकता है। यह सही है कि घरेलू लचीलापन मायने रखता है। यह भी उतना ही सच है कि इस लचीलेपन को बनाए रखने के लिए एक पारस्परिक दुनिया में शक्ति की मांग होती है। भारत को चुनौती और अवसर के लिए समान अर्थव्यवस्थाओं और समान विचारधारा वाले लोकतंत्रों के गठबंधन का निर्माण करना है।

जनवरी में भारत को उसके बढ़ते कद की पहचान के लिए जी-7 में 'विशेष आमंत्रित' का दर्जा दिया गया था। भारत की क्षमता की यह स्वीकार्यता और मान्यता उसे ऐसा कद प्रदान करती है कि वह एक ऐसा समूह बनाने की पहल करे, जो रणनीतिक स्वायत्तता को रेखांकित करे। भारत समेत 13 ऐसे देश हैं, जहां लोकतांत्रिक ढंग से कामकाज होता है और उनकी कुल जीडीपी 27 ट्रिलियन यानी 270 खरब डॉलर है। इनमें से छह देशों की अर्थव्यवस्था दो ट्रिलियन यानी बीस खरब डॉलर से ज्यादा की है और सात देश वहां तक पहुंचने के आकांक्षी हैं, जो मिलकर एक समूह बना सकते हैं। इनमें जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, ब्राजील, ईटली, कनाडा, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, मैक्सिको और इंडोनेशिया शामिल हैं। यह समूह आर्थिक दबदबा और सामान्य चिंताएं साझा करता है, जो जुड़ाव का कारण हो सकता है।

विश्व के सामने स्थिति यह है कि एक तरफ चीन अधिनायकवादी रवैया अपना रहा है और रूस का रवैया ढुलमुल है, दूसरी ओर अमेरिका मूकदर्शक बना हुआ है, जो हम सबके लिए चिंताजनक है। लेकिन यह उभरती हुई अराजकता चुनौतियों का सामना  करने तथा उभरते अवसरों में परस्पर जुड़े रहने के लिए संभावनाओं के नए झितिज खोल सकती है। इन 13 देशों में से प्रत्येक उपभोग और उत्पादक अर्थव्यवस्था है, जैसा कि कृषि और औद्योगिक उत्पाद बाजारों में दिखाई देता है। ये मानव और प्राकृतिक
संसाधनों से समृद्ध हैं, एल्गोरिथम ऑटोमेशन की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं और आपूर्ति शृंखला में शामिल हैं। महामारी ने लचीलेपन का कठोर सबक सिखाया है—40 खरब से ज्यादा के वैश्विक व्यापार का एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा वर्ष 2025 तक आपूर्ति आधार इस समूह में स्थांतरित हो सकता है। यानी प्रतियोगिता और सहयोग के लिए शानदार अवसर है। आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती ने ह्वावेई के मसले पर एक अघोषित गठबंधन लाया, जिसे पांचवीं आंख कहा गया, जो 5 जी का मार्ग प्रशस्त करता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुदृढ़ीकरण ने जी-4 का गठन किया—जिसमें प्रतिनिधित्व सुधार के लिए ब्राजील, भारत, जर्मनी और जापान एकजुट हुए। डेटा प्रबंधन से लेकर कानूनी कर राजस्व के ऑफशोरिंग तक-अप्रिय सवालों का सामना करने के लिए इसी तरह के दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी।

अपने मौजूदा संदर्भ में 'नई विश्व व्यवस्था' पदबंध का इतिहास, जो कानून के शासन पर आधारित है, जार एलेक्जेंडर प्रथम में खोजा जा सकता है, जिसने 1814 में 'अतंरराष्ट्रीय व्यवस्था' की अवधारणा प्रस्तुत की। एक शताब्दी बाद 1919 में वुडरो विल्सन ने लीग ऑफ नेशंस के गठन के लिए 'नई विश्व व्यवस्था’ की शब्दावली का इस्तेमाल किया। वर्ष 2021 में यह प्रकट होता है कि युद्ध के बाद की 'विल्सनियन विश्व व्यवस्था' अप्रचलित है—खासकर सोवियत संघ के पतन के बाद। इस धारणा के कुछ आधार हैं कि संस्थागत स्थापत्य की कल्पना इसलिए की गई है कि वह दुर्भावनापूर्ण धारणाओं और महाशक्तियों की नाजायज इच्छाओं की पूर्ति कर सके। लंबे समय से यह तर्क दिया जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र जीवाश्म बन चुके सुरक्षा परिषद का बंधक है। औद्योगिक देशों के जी-7 समूह के पास दुनिया की संपत्ति का आधा से ज्यादा हिस्सा है। 1973 के तेल संकट के बाद 1975 में इसका गठन किया गया था, लेकिन वित्तीय संकटों के दौरान ही यह सक्रिय होता है। और 1999 में गठित जी-20 को आलोचकों द्वारा जी-शून्य के रूप में वर्णित किया जाता है। 

इससे स्पष्ट है कि कानून के शासन को सक्षम बनाने के लिए बनाई गई संरचनाएं कुंद हो चुकी हैं और वे समानता व दक्षता सुनिश्चित करने के मंच के बजाय मुनाफे का साधन बनकर रह गई हैं। 1939 में एचजी वेल्स ने अपनी पुस्तक द न्यू वर्ल्ड ऑर्डर में कहा था, नई विश्व व्यवस्था की जरूरत निरंतर रहेगी, घटनाएं कभी नहीं रुकेंगी। तब से लेकर दुनिया और जटिल हो गई है। इस विश्वास को चुनौती दी जाती है कि इच्छा की स्वतंत्रता और मुक्त बाजार शांति एवं समृद्धि का रास्ता है। बीस खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था का समूह शायद ही इसके परिणाम भुगत सकता है और उसे साथ आना चाहिए। सबसे बड़े मुक्त बाजार वाले 
लोकतंत्र के रूप में भारत का काफी कुछ दांव पर लगा है, इसलिए उसे मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

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