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वैक्सीन उत्पादन में आत्मनिर्भरता
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Amar Ujala
हाल की सरकारी घोषणाओं में एक ओर जहां आत्मनिर्भरता पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सार्वजनिक उद्यमों की उपस्थिति सुनिश्चित की जा रही है। इन दोनों नीति-निर्णयों के संबंध में वैक्सीन या टीकाकरण को जुड़ना चाहिए। स्वास्थ्य क्षेत्र में वैक्सीन सदा महत्वपूर्ण रही है, ‘कोविड-19’ के इस दौर में तो इसका महत्व और भी बढ़ गया है। क्या हम वैक्सीन के क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भरता को बढ़ा सकते हैं? इसके लिए सार्वजनिक उद्यमों को महत्वपूर्ण स्थान देना होगा। वैक्सीन के क्षेत्र में सफलता के लिए वैक्सीन का सुरक्षित होना बहुत जरूरी है।
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आत्मनिर्भर होने पर ही हम वैक्सीन की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। देश में टीकाकरण कार्यक्रम के लिए वैक्सीन उत्पादन क्षमता को मजबूत करना जरूरी है। सच्चाई यह भी है कि कुछ साल पहले देश में सार्वजनिक क्षेत्र की वैक्सीन उत्पादक कंपनियों की उत्पादन क्षमता को बहुत नुकसान पहुंचा था। टीकाकरण कार्यक्रम के विशेष महत्त्व को देखते हुए टीकों के उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र को प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। पर एक समय हालत यह हो गई थी कि आत्मनिर्भरता के प्रतीक बने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम बुरी तरह बदहाल हो गए थे। भारत का टीकाकरण कार्यक्रम कठिन दौर से गुजर रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) व तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चला है कि भारत में जरूरी टीकाकरण पाने वाले बच्चों का प्रतिशत कम हुआ है, जबकि विश्व स्तर पर यह बढ़ा है। दूसरी चिंताजनक बात यह है कि विश्व स्तर पर वैक्सीन बनाने में लगी कंपनियों में कई महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे हैं। उनका ध्यान जन-स्वास्थ्य की रक्षा के लिए सस्ते, मगर अच्छी गुणवत्ता की वैक्सीन बनाने पर उतना नहीं है, जितना कि मोटे मुनाफे के लिए वैक्सीन बनाने पर। भारत जैसे विकासशील देशों को बड़ी मात्रा में सस्ती, विश्वसनीय वैक्सीन चाहिए, पर वैश्विक स्तर पर इस उद्योग को नियंत्रित करने वाली कंपनियों की प्राथमिकताएं अलग हैं।
कम मुनाफे में काम करने में उनकी रुचि नहीं है। हां, यदि उनके द्वारा विकसित नई वैक्सीनों को किसी तरह टीकाकरण कार्यक्रम में प्रवेश मिल जाए व इस तरह के ‘कॉम्बिनेशन’ को अधिक कीमत में बेच सकें, तो वे तैयार हैं। ‘इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ जनवरी-2008 के एक अनुमान के अनुसार, ‘डिफ्थीरिया, पोलियो और ट्यूबरकोलोसिस’ (डीपीटी) में ‘हैपेटाइटिस-बी वैक्सीनेशन’ जोड़ा जाए, तो ‘डीपीटी इम्यूनाइजेशन’ का खर्चा 17 गुना बढ़ जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां ऐसे ‘कॉम्बिनेशन’ बेचने के लिए जोर लगा रही हैं, जबकि इससे विकासशील व गरीब देशों का खर्च बिना कोई खास लाभ पाए ही बहुत बढ़ जाएगा।
विश्व स्तर की बड़ी कंपनियां जिन बीमारियों का वैक्सीन तैयार करने में जुटी हैं, उससे होने वाली मौतों के बारे में बहुत बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़े बताती हैं। जैसे, भारत में ‘हैपेटाइटिस-बी’ से होने वाली मौतों के आंकड़ों को हकीकत से कई गुना अधिक बताया गया। पूछताछ करने पर आंकड़ों का झूठ सामने आया। इसी तरह एड्स/एचआईवी के आंकड़े भी सचाई से अधिक बताए गए थे।
दूसरा हथकंडा यह अपनाया जाता है कि महंगी वैक्सीन को आरंभ में टीकाकरण में शामिल करने के लिए कुछ सहायता दे दी जाती है, जो कुछ ही समय के लिए होती है। बाद में यह बोझ विकासशील देश को स्वयं ही उठाना पड़ता है। इसके अलावा, व्यवसाय बढ़ाने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और गठबंधनों का सहारा लिया जाता है। ऐसे एक गठबंधन ने भारत के टीकाकरण कार्यक्रम में नए, महंगे टीके व ‘कॉम्बिनेशन’ जोड़ने के लिए दबाव डाला था।
जाहिर है कि आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक उद्यम की मजबूती टीकाकरण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। वैक्सीन की सुरक्षा और कम खर्च सुनिश्चित करते हुए अगर देश को बाहरी लूट से बचाना है, तो यह आत्मनिर्भरता व सार्वजनिक उद्यम की मजबूती से ही पूरा होगा।