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प्रेम में लेना और देना

Wed, 06 May 2020 08:42 AM IST
संजीव कुमार झा भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (आध्यात्मिक विचारक एवं संत)
भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (आध्यात्मिक विचारक एवं संत) Published by: संजीव कुमार झा Updated Wed, 06 May 2020 08:42 AM IST
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Bhaktivedanta Swami Prabhupada opinion, Give and take in love
भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद - फोटो : twitter

भक्ति की विधि अत्यंत सुखद है; हम वाद्य यंत्रों के साथ सुमधुर स्वर में गाते हैं और कोई दूसरा व्यक्ति भी साथ हो लेता है। हां, उस संगीत का परमेश्वर से संबंध होना चाहिए, यह उनके यशोगान के लिए होना चाहिए। भगवद्गीता का श्रवण भी भक्तिमय सेवा का अंग है और इसे सुनने के अतिरिक्त इसे जीवन में उतारने की उत्सुकता होनी चाहिए। कृष्णभावनामृत एक विज्ञान है, अतः इसे आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करना चाहिए।


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निस्संदेह यदि कोई सोचे कि भगवद्गीता तथा हरे कृष्ण मंत्र तो हिंदू पद्धति के अंग हैं, और इस कारण से उसे ये स्वीकार्य न हों, तो वह गिरजाघर में जाकर गायन कर सकता है। इस विधि तथा उस विधि में कोई भेद नहीं है; अभिप्राय यह है कि चाहे वह किसी भी विधि को अपनाए, उसे भगवद्भावनामय होना चाहिए। भगवान न तो मुस्लिम हैं, न हिंदू, न ईसाई-वह ईश्वर हैं। हम सब विशुद्ध आत्मा हैं, परमेश्वर के अंश हैं। ईश्वर पवित्र हैं और हम भी पवित्र हैं।

फिर भी हम किसी न किसी तरह इस भवसागर में आ गिरे हैं और उसकी तरंगों की उछाल के साथ हम भी कष्ट पाते हैं। वास्तव में हमें भौतिक क्लेश रूपी इन उत्ताल तरंगों से कुछ लेना-देना नहीं है। हमें मात्र यही प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे कृष्ण, कृपया मुझे बचा लें।' ज्यों ही हम कृष्ण को भूल जाते हैं, त्यों ही माया के महासागर को वहां पाते हैं और उसकी जकड़ में आ जाते हैं। इस भवसागर से निकलने के लिए हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करना अति महत्वपूर्ण है।

कृष्ण शब्द की ध्वनि तथा मूलभूत कृष्ण एक हैं।जब हम हरे कृष्ण का जप और नृत्य करते हैं, तब कृष्ण भी हमारे साथ नृत्य करते हैं। निस्संदेह हम यह कह सकते हैं कि, 'मैं उनको देख नहीं सकता हूं', किंतु हम उन्हें देखने पर इतना बल क्यों देते हैं? हम सुनने (श्रवण) पर इतना बल क्यों नहीं देते? ऐसा नहीं है कि हम कृष्ण से ही वस्तुएं प्राप्त करते रहें और उन्हें कुछ भी अर्पित न करें। हर व्यक्ति ईश्वर से कुछ न कुछ लेता रहता है, तो उन्हें हम कुछ क्यों न दें? हम कृष्ण से न जाने कितना प्रकाश, वायु, भोजन, जल आदि लेते रहते हैं।

यदि कृष्ण ये संसाधन प्रदान न करें, तो कोई जीवित नहीं रह सकता। क्या यह प्रेम है कि बदले में कभी कुछ दिए बिना लगातार लेते ही रहो, लेते ही रहो? प्रेम का अर्थ है, लेना और लेने के साथ ही देना। यदि हम किसी से कुछ लें और बदले में कुछ भी न दें, तो यह प्रेम नहीं हुआ-यह तो शोषण है। धर्म वह है, जो हमें ईश्वर से जोड़े। यदि वह हमें ईश्वर से जोड़ने में सक्षम नहीं है, तो वह धर्म नहीं है। धर्म का अर्थ है ईश्वर की खोज करना, ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करना तथा ईश्वर के साथ संबंध स्थापित करना।

यही धर्म है। जो लोग भक्तिमय सेवा में लगे रहते हैं, वे कृष्ण अथवा ईश्वर के लिए कर्म करते हैं। चूंकि इस प्रकार ईश्वर के साथ संबंध बनता है, अतः कृष्णभावनामृत एक धर्म है। प्रत्येक व्यक्ति पर मृत्यु का नियम लागू होता है, फिर भी कोई इसको गंभीरता से नहीं लेता। यही माया है। यह सोचकर, कि हम अमर हैं, हम मनमानी करते रहते हैं और सोचते हैं कि हम कभी भी पकड़े नहीं जाएंगे। यह जीवन विपदाग्रस्त है और मोह का महान अंधकारमय भाग है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि हमारे सारे कष्ट हमारे पापकर्मों के कारण हैं और पापकर्मों का कारण हमारा अज्ञान है। ज्ञान, जिसके द्वारा हम कष्टों से छुटकारा पा सकते हैं, मनुष्य जीवन में ही संभव है।

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