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धार्मिक पहचान से परे, हाजी अली दरगाह और हिंगलाज माता मंदिर बनी मिसाल

Fri, 26 Feb 2021 04:54 AM IST
मरिआना बाबर मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Published by: मरिआना बाबर Updated Fri, 26 Feb 2021 04:54 AM IST
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Beyond the religious identity, from Haji Ali Dargah to Hinglaj Mata Temple
हाजी अली मुंबई - फोटो : PTI

काफी समय पहले जब मैं पहली बार मुंबई गई थी, तब हाजी अली दरगाह की यात्रा को लेकर बहुत उत्साहित थी, क्योंकि उसके बारे में मैंने काफी कुछ सुन रखा था। जैसे कि यह एकमात्र दरगाह है, जो समुद्र के बीच में है। यह भारत में मुस्लिम धर्मस्थल की मेरी पहली यात्रा थी, और यह काफी आश्चर्यजनक था कि वहां मैंने अपने बगल में कई हिंदू महिलाओं को भी इबादत करते हुए देखा। मैं यह जानती थी कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष मुल्क है, लेकिन हाजी अली दरगाह समेत भारत के अन्य मुस्लिम धार्मिक स्थलों में, जहां भी मैं गई, गैर-मुस्लिम लोगों की मौजूदगी वाकई अद्भुत थी। उनमें से कई जो इबादत करने आए थे, गैर-मुस्लिम थे। इस हफ्ते पाकिस्तान में बलूचिस्तान के ल्यारी जिले में मकरान तट पर बने प्रसिद्ध हिंगलाज माता मंदिर में अनेक लोग पहुंचे। निरंतर हो रहे निर्माण और बेहतर सड़क संपर्क के कारण दक्षिण एशिया के असंख्य लोग अब उन इलाकों से परिचित हो रहे हैं, जहां तक पहुंचना पहले बहुत मुश्किल था। अब भी पाकिस्तान में अनेक ऐसे पर्यटन और धार्मिक स्थल हैं, जहां पहुंचने का रास्ता बहुत दुर्गम है और इसी वजह से बहुत कम लोग उन स्थलों तक पहुंच पाते हैं। 


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मुंबई स्थित हाजी अली दरगाह की तरह हिंगलाज माता के मंदिर में भी विभिन्न धार्मिक समुदायों के लोग इबादत करने जाते हैं। हिंगलाज मंदिर में साल भर में अमूमन 30,000 लोग आते हैं, लेकिन सिंध को बलूचिस्तान से जोड़ने वाली नई सड़क के बनने से श्रद्धालुओं की संख्या में और इजाफा होगा। पाकिस्तान के हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों को इस मंदिर में देखना आम बात है, और जब वीजा की समस्या नहीं थी, तब भारत से भी हजारों लोग यहां पूजा करने आते थे। जबकि एक समय बलूचिस्तान के स्थानीय हिंदुओं और मुसलमानों के लिए भी हिंगलाज माता मंदिर तक पहुंचना बहुत कठिन था। पर अब नए मकरान तटीय राजमार्ग का निर्माण हो जाने से कराची से सड़क मार्ग से यहां पहुंचने में मात्र चार घंटे लगते हैं। इसलिए अब यहां ज्यादा दर्शनार्थी आने लगे हैं। 

पाकिस्तान के अधिकांश मंदिरों की तरह हिंगलाज माता मंदिर के बारे में भी कई कहानियां हैं। हिंदुओं का मानना है कि देवी सती का सिर हिंगलाज माता मंदिर के क्षेत्र में गिरा था। इस इलाके में रहने वाले लोग हिंगलाज माता को बीबी नानी या दादी मां कहते हैं। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि यह मंदिर 'देवी नाना' का हो सकता है, जिनकी पश्चिम और मध्य एशिया में पूजा की जाती है। जिन पाकिस्तानियों को इस मंदिर के बारे में जानकारी नहीं थी, उन्हें हाल ही में लाहौर लिटरेचर फेस्टिवल में हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट में आधुनिक दक्षिण एशियाई भाषाओं और साहित्य विभाग में सहायक प्रोफेसर जुरगेन शेफलेनर द्वारा बहुत-सी जानकारी दी गई। इस मंदिर पर उनकी एक पुस्तक है, जिसका नाम है, हिंगलाज देवी आइडेंटिटी, चेंज, ऐंड सोलिडिफिकेशन एट ए हिंदू टेंपल इन पाकिस्तान। 

यह दिलचस्प है कि पश्चिमी दुनिया के एक व्यक्ति ने पाकिस्तान के एक दुर्गम इलाके में इतनी दिलचस्पी ली, जिसके बारे में खुद हम ही ज्यादा नहीं जानते। लेखक के मुताबिक, अनेक तीर्थयात्री पैदल यात्रा को प्राथमिकता देते हैं,  क्योंकि उनका मानना है कि मंदिर तक पहुंचने के लिए वे जितना अधिक कष्ट सहन करेंगे, देवी उनकी उतनी ही भलाई करेंगी। अपनी पुस्तक में लेखक ने हिंदी, संस्कृत, सिंधी और उर्दू के साहित्यिक स्रोतों को समाहित किया और मंदिर से संबंधित व्यापक नृवंशविज्ञान पर अनुसंधान किया, मंदिर पर सांस्कृतिक एवं राजनीतिक प्रभावों की पड़ताल की और दुर्गम रेगिस्तानी तीर्थ की मौजूदा स्थिति का पता लगाया, जो कि पाकिस्तान में सबसे प्रभावशाली हिंदू तीर्थ स्थल है। मंदिर के आंतरिक हिस्से का वर्णन करने वाली एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह मंदिर एक गुफा में स्थित है और देवी की प्रतिमा मानव निर्मित नहीं है, बल्कि यह एक छोटा-सा निराकार पत्थर है, जिसे कोट्टारी देवी के रूप में पूजा जाता है। 

पख्तून चार्ली चैप्लिन-इस बीच उत्तर पाकिस्तान की प्रांतीय राजधानी पेशावर में लोगों ने एक स्थानीय पठान में चार्ली चैप्लिन की खोज कर ली है। कोविड-19 की वजह से एक साल से ज्यादा समय से मुश्किलों और निराशाओं का सामना करते हुए लोग हंसना-मुस्कराना भूल गए थे। पेशावर की सड़क पर आप उस्मान खान नामक एक युवा पख्तून को बिल्कुल चार्ली चैप्लिन की तरह बॉलर हैट, नेकटाई और छड़ी लेकर अभिनय करते हुए देख सकते हैं, जिसे देखकर लोग अपनी चिंताएं भूल जाते हैं और हंसने लगते हैं। उन्होंने मीडिया को बताया कि 'चार्ली के वीडियो और फिल्में देखकर मेरा शरीर पूरी तरह से हास्य अभिनय में ढल चुका है और यहां तक कि सोते हुए भी मैं उसी की तरह अभिनय करता हूं। जैसे कि मैं हंसते हुए जगता हूं और फूहड़ हंसी के साथ बिस्तर पर सोने जाता हूं, क्योंकि मेरा पक्का यकीन है कि हंसना सबसे अच्छी दवा है।' केवल दो महीने में सोशल मीडिया प्लेटफार्म टिकटॉक पर उनके आठ लाख से ज्यादा फॉलोवर बन चुके हैं। वह बताते हैं कि दुनिया भर के वे लोग उनसे जुड़े हैं, जिन्हें उनकी कॉमेडी महामारी, लॉकडाउन और सामाजिक-दूरी से राहत प्रदान करती है। वह कहते हैं, मैं लोगों को हंसाना चाहता हूं, क्योंकि कोविड की वजह से लोगों को बहुत दुख पहुंचा  और जीवन बहुत मुश्किल हो गया। 

यह पख्तूनी चार्ली चैप्लिन अपनी आजीविका के लिए बच्चों के खिलौने बेचता है। अब भी जब वह सोशल मीडिया पर डालने के लिए फिल्में नहीं बना रहे होते, तब उन्हें सड़क पर खिलौने बेचते हुए देखा जा सकता है। अगर आप उन्हें सड़कों पर भागते हुए देखते हैं, तो उसकी वजह उनके सबसे पसंदीदा प्रशंसक वे छोटे बच्चे हैं, जो उनके पीछे भागते हैं और जिन्हें हंसाने के लिए वह विभिन्न तरह के करतब करने की कोशिश करते हैं। चाहे वह पाकिस्तान के दक्षिण में बलूचिस्तान हो, जहां लोग अपनी चिंताओं से छुटकारा पाने के लिए मंदिर जाते हैं, अथवा पाकिस्तान के उत्तर में पेशावर, जहां लोग पख्तूनी चार्ली चैपलिन को देखकर हंसते हैं, इन सब कुछ के जरिये लोग अपने दुख और चिंताओं से छुटकारा पाने की कोशिश कर रहे हैं। 

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