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अंतरात्मा को बचाने की खूबसूरत जिद

Fri, 14 Sep 2012 03:34 PM IST
गौरीनाथ
गौरीनाथ Updated Fri, 14 Sep 2012 03:34 PM IST
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beautiful insistence of saving the Conscience
यूं ये जिद्द/ बड़ी खराब है/पर यही, /यही तो ज़िंदगी का बजता हुआ रबाब है...
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अरुण प्रकाश अद्भुत जीवट इंसान थे। उनके पास कुछ बहुत खूबसूरत ज़िदें थीं। जिसके पास कोई जिद न हो वह और कुछ भी हो सकता है, एक अच्छा-प्रतिबद्ध रचनाकार-कलाकार तो नहीं ही हो सकता है। यह जिद ही थी कि वे जमी-जमाई सरकारी नौकरी छोड़कर पत्रकारिता में आए। उन्हीं के शब्दों में, 'लोकप्रिय धारणा है कि कमलेश्वर जी ने मेरी सरकारी नौकरी छुड़वा दी, पत्रकारिता में ले आए, और यह उन्होंने बुरा किया। कमलेश्वर जी को सहज उपलब्ध खलनायक मानकर कोई भी दोष उनके मत्थे मढ़ देते हैं... मैंने अपनी जिद के कारण सरकारी नौकरी से मुक्ति ली, मेरी जिद देखकर उन्होंने मुझे पत्रकारिता में मौका दिया और कसकर काम लिया।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों से लेकर व्यापार-सम्पादन जैसा टेढ़ा काम तक करवाया। जिसके कारण पत्रकार-बिरादरी ने मुझे अपनाया. .... लम्बी बीमारी के बाद उठा तो पीठ पर कूबड़, हाथ में बैसाखी थी। मेरे किशोरोचित उत्साह पर विकलांगता की सिल चढ़ गई थी। किसी ने कहा कि तैरने से तुम ठीक हो जाओगे। बस जिद चढ़ गई। बूढ़ी गंडक में धारा के विरुद्ध तैर-तैरकर मैंने अपना शरीर सीधा कर लिया। वैसाखी छूटी और मेरे पास काम चलाऊ शरीर फिर आ गया। जिद को उपहास का सामना करना पड़ता है, लेकिन यदि जिद आपकी क्षमता के अनुकूल हो, तो उपहास करतल ध्वनि में बदल जाता है।'
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अरुण प्रकाश जी से मेरा प्रथम परिचय उनकी 'जल प्रांतर' कहानी के माध्यम से हुआ, लेकिन अभिन्न और पारिवारिक हुए हम दिल्ली-रहवास के साथ। 1995 से मैं शालीमार गार्डेन में रहता रहा हूं, वे दिलशाद गार्डेन में रहते थे। दिलशाद गार्डेन से शालीमार गार्डेन की दूरी मेरे लिए आज भी पैदल की है। यूं रिक्शे से भी आते-जाते, लेकिन पैदल में जो सहजता, सुविधा और मज़ा है, उसकी बात ही कुछ और... इस रास्ते में कुछ चाय के ठीहे और पान की दुकानें हैं, जहां अरुण जी के साथ सुकून से बतियाते इस परिक्षेत्र के लोगों से उनके जुड़ाव-लगाव की गहराई भांपते-महसूसते मैं अपने लिए एक परिचित-सी जगह बनाने की कोशिश में था। दिलशाद गार्डेन से लगे सीमापुरी, शहीद नगर, शालीमार गार्डेन इलाके की हरेक गली से अरुण जी का गहन आत्मीय जुड़ाव-लगाव रहा था।
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सिर्फ चायवाले नहीं, रिक्शेवाले, सब्जीवाले, फलवाले, नाई-धोबी, मोची, बढ़ई, दरजी से लेकर दैनंदिन जीवन में जरूरत की चीजों या कामों के सिलसिले में मिलने-जुलने वाले हरेक तरह के पेशे के लोगों से उनका आत्मीय रिश्ता था। अरुण जी हरेक के बारे में तफसील से और मुकम्मल जानकारी रखते थे। किनके कितने बच्चे हैं, क्या करते, कहां-कहां उनके रिश्ते हैं और क्या-क्या खासियतें... ऐसी तमाम जानकारियां। अरुण जी उन गलियों में घूमते, लोगों से मिलते समय बताते। शहीद नगर के एक मोची-मित्र से मिलाते हुए उन्होंने बताया कि ये इतने अच्छे गायक और कलाकार हैं कि फिल्म में चांस पाने को घर बेचकर मुंबई चले गए। जब वहां इनकी कला को पहचानने वाले नहीं मिले और पैसा खत्म हो गया, तो फिर यहां आए। अब इनकी कलाकारी इन जूतों की बनावट में देख सकते हो।

शुरू-शुरू में मैं कई बार रोमांचित-विस्मित होता था कि उनके परिचय और अनुभव का दायरा कितना बड़ा है! डाकिया हो या बिजली मिस्त्री, डॉक्टर हो या टेक्नोक्रेट, ऑटो रिक्शावाला हो या ट्रक ड्राइवर, सब से उनका आत्मीय और सघन जुड़ाव था। 'फिर मिलेंगे' का वीर सिंह सिर्फ कल्पना से नहीं पैदा हुआ है। 'विषम राग' की कम्मो की दुनिया को गहराई से समझे-जाने बगैर उसकी ऐसी कहानी नहीं लिखी जा सकती।

बहरहाल, मैं अखबार में काम करता था तब भी और जब 'हंस' में आया तब भी-- आफिस जाने और घर लौटने के मेरे रास्ते मात्र ही नहीं, लगभग कहीं भी घर से बाहर जाने और लौटने के रास्ते अरुण जी के घर की तरफ से गुजरते थे। इस कारण भी हमारी मुलाकातें ज्यादा होती थीं। अक्सर हम कहीं जाते अलग-अलग भी, मगर लौटते साथ थे। और इस क्रम में उनके घर या आसपास के किसी चायवाले ठीहे पर हम घंटों जम जाते थे। हम जहां भी जमते, उनकी दुकान बढ़ाने के बाद ही वहां से हिलते। जब उनके घर बैठते, तब भी वहां से निकलते-निकलते अक्सर रिक्शेवाले अपने घर जा चुके होते। असल में अरुण जी के घर हों या कहीं और, कभी बात एक चाय पर ख़त्म नहीं होती थी। कई चाय और मट्ठी, फेन-रस या नमकीन-दालमोठ के साथ हमारी बातचीत अंतहीन चलती रहती थी। हमारी बातचीत के विषय साहित्यिक कम ही हुआ करते।

अक्सर सामाजिक समस्याएं और मनुष्य की जिंदगी के सुख-दुःख ही हमारी चर्चाओं में होते। फसल-चक्र, अनाज की किस्मों और व्यंजनों के अलग-अलग स्वाद को लेकर उसके अतल तल तक जाते। 'कलछुल की टकराहट के बावजूद उसे भुने प्याज की गंध अच्छी लग रही थी' (छाला) जैसी गहरे इंद्रियबोध से संपृक्त पंक्तियां कोई यूं ही नहीं लिख सकता। उनकी रचनाओं में पात्र-परिवेश और स्थितियों से संदर्भित विवरण (डिटेल्स) प्राप्त होते हैं और ये आम लोगों के जन-जीवन से होते हैं। यूं वे कहते हैं, 'मिथिला की बातें, सन्दर्भ, जो भूल जाता हूं, उसे बेहिचक बाबा नागार्जुन से लेता हूं। मसलन मिथिला के आमों, मछलियों की वेरायटी के बारे में कहां से जानकारी दूं? नागार्जुन के बगीचे और पोखर से चुराने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।' लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं। सिमरिया की गंगा और बूढ़ी गंडक किनारे के इस मैथिल लेखक के पास जितनी विविधतापूर्ण जानकारी है, उतनी अन्यत्र दुर्लभ। बाबा सिर्फ वैरायटी और स्वाद बताते, अरुण प्रकाश उनके रासायनिक गुणों को बेहतर जानते हैं-- उन वस्तुओं के तात्विक गुणों, खूबियों-खामियों के साथ ही उसके विपणन-व्यापार को भी उद्घाटित करते हैं।

अरुण जी से मेरा सम्बन्ध बिलकुल घरेलू था। वर्ष 2003 में जब मैं डेंगू से पीड़ित हुआ, तो वे दिन-रात एक किए खड़े थे। एक दफा मेरा बेटा बीमार पड़ा, तो आफिस से मेरे लौटने से पहले उसको लेकर वे अस्पताल पहुंच गए थे। ऐसे अनेक प्रसंग हैं। उनके जाने से मैंने अपना आख़िरी अभिभावक खो दिया है।

अरुण प्रकाश जिस इलाके से आते हैं, वह कठिन श्रम के बावजूद आर्थिक-संघर्ष में जीने वाले लोगों का इलाका है। वहां सामाजिक-राजनीतिक सजगता काफी है। अरुण जी के पिता राजनीति में थे और मां शिक्षिका थीं। सात साल के थे, उनकी मां गुजर गईं। जब किशोरावस्था में पहुंचे, तभी राजनीतिक ईर्ष्या के कारण उनके पिता को कार से कुचलकर मार डाला गया। बाईस वर्ष की अवस्था में उन पर पूरे परिवार का बोझ आ गया। कहने को सांसद के बेटे थे, मगर दो वर्ष बाद ही एम.पी. फ्लैट खाली कर सर्वेंट क्वार्टर में आ गए थे।

`बमुश्किल पढ़ाई हुई, ट्यूशन के चक्कर, पिता के खाते-पीते मित्रों/रिश्तेदारों के सहारे बड़ा हुआ। परिवार के लोग सम्मान-स्वाभिमान को गरीबी से ज्यादा प्यार करते थे। सारे अमीर मूल्यहीन दिखते थे। हायर सेकेंडरी की परीक्षा के दिन थे। अप्रैल की तेज गरमी में कोलतार की सड़क पर नंगे पांव परीक्षा देने जाता था। तलवों में छाले पड़ गए। रहम खाकर मेरे पिता के एक मित्र ने नई चप्पलें खरीद दीं। वह मेरे जीवन की पहली चप्पल थी। नई चप्पल ने काट खाया। तभी जाना कि गरीबी से उबरने में भी छाले पड़ते हैं।'


स्वाभिमान से भरे अरुण प्रकाश के इस साहस और जिद को सलाम करने से पहले इतना कहना चाहूंगा कि हिन्दी में ऐसा जिद्दी, साहसी और संघर्षचेता शायद ही फिर हो। मुझे प्रसन्नता है कि मुझे उनका स्नेह मिला।
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