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कोविड 19 से जंग लंबी है और अनिश्चित, टीके पर टिके भविष्य पर पत्रलेखा चटर्जी का आलेख
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : ANI
कोविड-19 महामारी हमें अप्रत्याशित परिस्थितियों से निपटने की हमारी क्षमता को और मजबूत बनाने के लिए बाध्य कर रही है। कई हफ्ते से टेलीविजन एंकर विशेषज्ञों से पूछ रहे हैं कि टीका कब आएगा। हमारी सरकार की ओर से कहा गया है कि अगले वर्ष की पहली तिमाही तक वैक्सीन आ जाएगी।
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ऐसी ही बातें वैक्सीन के अन्य दावेदारों की ओर से भी की गई हैं। पर हम जानते हैं कि वैक्सीन या टीके के आने की कोई तारीख तय नहीं की जा सकती, क्योंकि इसकी एक लंबी प्रक्रिया है। हाल ही में वैश्विक दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका ने घोषणा की कि वह एक स्वयंसेवक की रीढ़ की हड्डी में सूजन होने के बाद कोविड-19 टीके के लिए चल रहे नैदानिक परीक्षण को रोक रही है।
हालांकि यह लेख लिखे जाने तक एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड कोरोना वायरस वैक्सीन एजेडडी 1222 का नैदानिक परीक्षण ब्रिटेन में फिर से शुरू कर दिया गया है, जब वहां के मेडिकल हेल्थ रेगुलेटरी ऑथरिटी ने इसकी पुष्टि की कि परीक्षण सुरक्षित है।
इस बहुप्रतीक्षित टीके का परीक्षण भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक भारतीय वैक्सीन निर्माता, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, इसका हिस्सा है। यह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के कोविशिल्ड वैक्सीन का निर्माण कर रहा है, लेकिन भारत में वैक्सीन के नैदानिक परीक्षणों को रोक दिया गया है।
द सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया का कहना है कि ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका कोविड-19 टीके के दूसरे और तीसरे चरण के नैदानिक परीक्षण भारत के ड्रग्स कंट्रोलर जनरल से हरी झंडी मिलने के बाद फिर से शुरू होंगे।
यह सब कुछ स्पष्ट रूप से कोरोना वायरस के खिलाफ एक आशाजनक टीके के विकास से संबंधित उतार-चढ़ाव और संभावित देरी को दिखाता है। इस समय तीसरे चरण के परीक्षण में नौ संभावित टीके हैं। एस्ट्राजेनेका के पहले कोविड-19 टीके का तीसरे चरण का परीक्षण फिलहाल रोक दिया गया है।
परीक्षण के पहले दो चरणों के विपरीत (जिसमें स्वस्थ वयस्कों को टीका लगाया जाता है), तीसरे चरण के परीक्षण में भारी संख्या में प्रतिभागी शामिल होते हैं। इसका मतलब है कि इस चरण के दौरान टीके के सामान्य दुष्प्रभाव भी नहीं मिलते हैं।
लेकिन यहां कुछ प्रमुख मुद्दे हैं। अमेरिका में दर्जनों स्थलों पर एस्ट्राजेनेका और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किए जा रहे कोविड-19 वैक्सीन के तीसरे चरण के परीक्षण को अस्थायी तौर पर रोका जाना जरूरी नहीं कि निराशा का कारण हो। और न ही नैदानिक परीक्षण की बहाली इस बात की गारंटी है कि आगे कोई रुकावट नहीं आएगी।
जैसा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और टीका विशेषज्ञ चंद्रकांत लहरिया बताते हैं, यह दिखाता है कि महामारी के समय में भी संभावित टीके का कठोरता से परीक्षण करना चाहिए और जो हुआ है, वह आश्वस्त करने वाला है तथा टीके के प्रति लोगों के भरोसे को बढ़ाएगा।
वह कहते हैं कि भले ही टीके की उपलब्धता में देरी हो, लेकिन यह सबको आश्वस्त करता है कि सभी जरूरी जांच का वैज्ञानिक कठोरता के साथ पालन किया गया है और सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब राजनीति कई देशों में विज्ञान को परास्त करती हुई प्रतीत होती है और राजनेता खुशखबरी की तलाश में मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाना चाहते हैं तथा टीकों की होड़ शुरू होने का डर है।
भारत में जिस तरह से हम सामूहिक रूप से इस नए वायरस और आर्थिक मंदी से जूझ रहे हैं, कोराना संक्रमण से संबंधित आंकड़े निराश करने वाले हैं। हमारे देश में पहले ही कोविड-19 के कारण 78,000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं।
हम अमेरिका के बाद दूसरा सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमण वाला देश भी हैं। यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि किस तरह से संदिग्ध या संभावित कोविड-19 के कारण होने वाली मौतों को कोविड-19 मृत्युदर के अनुमानों में शामिल किया जाता है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के दिशा-निर्देश बताते हैं कि संदिग्ध या संभावित कोविड-19 मौतों को विश्व स्वास्थ्य संगठन की संहिता के आधार पर कोविड-19 मृत्युदर के आंकड़ों में शामिल किया जाना चाहिए। हालांकि, यह दिशा-निर्देश परामर्श के रूप में है और यह निश्चित नहीं है कि क्या सभी राज्य इन सिफारिशों का पालन कर रहे हैं।
पिछले हफ्ते हमें देश में कोविड-19 संक्रमण की वास्तविक संख्या के संबंध में कुछ आधिकारिक स्वीकारोक्ति पढ़ने-सुनने को मिली। आईसीएमआर और अन्य संस्थानों के 50 से अधिक वैज्ञानिकों द्वारा किए गए पहले सीरो-सर्वेक्षण के हाल ही में जारी नतीजों के अनुसार, भारत में संभावित रूप से मई में कोविड-19 संक्रमण के 64 लाख मामले थे और कोरोना के 82 से 130 संक्रमण के अज्ञात मामलों में से सिर्फ एक की ही पुष्टि हो सकी थी।
इसका मतलब है कि हम सावधानी बरतना बिल्कुल भी नहीं छोड़ सकते। लहरिया कहते हैं, हमें तीन मुख्य गैर-औषधीय रणनीतियों का पूरी तरह से पालन करना चाहिए-जब भी हम बाहर निकलें, तो मास्क पहनें और साथ में सैनिटाइजर रखें; हमेशा सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखें और हाथों को नियमित रूप से साबुन-पानी से धोते रहें।
हमें इन कदमों का पालन सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहिए कि सरकार ने या किसी विशेषज्ञ ने ऐसा करने के लिए कहा है, बल्कि इसलिए करना चाहिए, क्योंकि इनके बिना महामारी और फैल जाएगी तथा हम सबका जीवन खतरे में पड़ जाएगा।
दूसरी मुख्य बात, जो ध्यान में रखने लायक है, वह यह कि हम कोविड-19 के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दीर्घकालीन प्रभाव के बारे में पूरी तरह से नहीं जानते हैं। जिन लोगों को संक्रमण हुआ था और बाद में उन्हें आधिकारिक रूप से स्वस्थ बताया गया, उनके साथ क्या हुआ, इसका पता लगाने की जरूरत है।
दुनिया भर से बहुत-सी ऐसी रिपोर्टें आई हैं कि कई मामलों में वायरस शरीर को लंबे समय तक नुकसान पहुंचाता है, खासकर बुजुर्गों और सह-रुग्णता वाले लोगों को। महामारी के छह महीनों से ज्यादा के समय में एकमात्र निश्चित बात यह है कि अनिश्चितता आ गई है। हमें इसे स्वीकार करना चाहिए और सुरक्षित रहने के लिए सभी सावधानियां बरतनी चाहिए तथा नए मानदंडों को स्वीकार करना सीखना चाहिए।