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त्रिपुरा में लाल दुर्ग की जंग
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मोदी-माणिक सरकार
पूर्वोत्तर के दो अन्य राज्यों-नगालैंड और मेघालय के साथ त्रिपुरा में आगामी 18 फरवरी को विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यह ऐसी चुनावी जंग है, जो एकाधिक कारणों से राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है। माकपा के नेतृत्व में वाम मोर्चा वहां 1993 के बाद से लगातार सत्ता में है। उससे पहले भी वह 1978 से 1988 तक वहां सत्ता में थी। स्वच्छ छवि और मृदुभाषी मुख्यमंत्री माणिक सरकार के नेतृत्व में वहां वाम दल की जड़ें केरल और प. बंगाल की तुलना में ज्यादा गहरी हैं।
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केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सभी वामपंथी गढ़ों में अपनी गहरी पैठ बनाना चाहती है, हालांकि पश्चिम बंगाल में ममता के तृणमूल कांग्रेस ने भगवा रथ रोक दिया है। इसलिए त्रिपुरा एक ऐसा राज्य है, जहां भाजपा का दांव बहुत ऊंचा है। अगर भाजपा वहां मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को तीसरे स्थान पर खिसकाने में सफल हो जाती है, तो बंगाल में अपना प्रभाव जमाने में वह सक्षम होगी। त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल, दो बंगाली बहुल राज्य हैं, जहां लंबे समय तक वाम मोर्चे का शासन रहा है, ऐसे में, अगर त्रिपुरा में भाजपा बड़ी सफलता हासिल करती है, तो बंगाल में यह ममता और वाम दल के लिए चिंताजनक होगा।
भाजपा ने अनुसूचित पार्टी-इंडिजेनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ गठजोड़ किया है। किसी भी अन्य क्षेत्रीय दल के साथ गठजोड़ की संभावनाओं से इन्कार करते हुए भाजपा के असम के मंत्री और पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक एलायंस के अध्यक्ष हेमंत विस्वा शर्मा ने मीडिया से कहा, 'हमने आईपीएफटी के साथ सीट बंटवारे का सौदा किया है, आईपीएफटी वहां नौ सीटों पर लड़ेगा। भाजपा बाकी 51 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।' जब उनसे आईपीएफटी की तिपरालैंड राज्य की मांग के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि भाजपा राज्य में आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और भाषायी मुद्दों को निपटाएगी।
यह झूठ है। बिस्वा शर्मा 2016 में असम के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा में शामिल हुए थे, जिसमें भाजपा ने जीत दर्ज की थी। पर उससे पहले ही वह अपने विवादास्पद बयानों के कारण सुर्खियों में आ गए, जैसे उन्होंने मुख्यमंत्री माणिक सरकार को कहा कि वाम मोर्चे के हारने पर उन्हें बांग्लादेश भेज दिया जाएगा। एक ऐसे राज्य में जहां 70 फीसदी आबादी पूर्वी बंगाल मूल की हो, जिनका बांग्लादेश के साथ गहरा भावनात्मक रिश्ता हो, उन लोगों को इस टिप्पणी ने काफी दुखी किया है। स्थानीय राजनीतिक टिप्पणीकार सीतांशु रंजन डे ने कहा कि 'जो लोग माणिक सरकार और उनकी पार्टी का विरोध कर रहे हैं, वे भी बिस्वा शर्मा और भाजपा को सबक सिखाना चाहते हैं। यह धमकी असम में काम कर सकती है, त्रिपुरा में नहीं।' पूर्वोत्तर के शीर्ष राजनीतिक टीकाकार उत्पल बारदोलोई कहते हैं, 'माणिक सरकार स्वच्छ छवि के लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं। उनकी लोकप्रियता दलगत सीमाओं से परे है और विशेष रूप से नौकरशाह उनके प्रशंसक हैं, जबकि बिस्वा शर्मा एक विवादास्पद राजनेता हैं, जो कई घोटालों में सलिप्त रहे हैं।' इसलिए बिस्वा शर्मा की टिप्पणी और आईपीएफटी के साथ भाजपा के गठजोड़ से बंगालियों में असुरक्षा की भावना ही बढ़ेगी, जिसका वाम मोर्चे को भारी फायदा होगा।
इसलिए बिस्वा शर्मा की टिप्पणी और त्रिपुरा के विभाजन की मांग करने वाली आदिवासी पार्टियों के साथ भाजपा और कांग्रेस, दोनों के गठबंधन तथा बंगाली आबादी के निष्कासन से वाम दलों को अपने पक्ष में बंगाली आबादी के वोट को मजबूत करने में मदद मिलेगी, इसके अलावा विभाजित आदिवासी क्षेत्रीय विपक्ष आदिवासी इलाकों में वाम उम्मीदवारों की मदद ही करेगा।
माणिक सरकार की सरकार ने जनजातीय विद्रोह को निर्दयतापूर्वक कुचल दिया और कानून-व्यवस्था बहाल रखने में इसका रिकॉर्ड ज्यादातर भारतीय राज्यों से बेहतर है। इसलिए राष्ट्रपति शासन लगाने का भाजपा का दांव यहां काम नहीं करेगा और बंगाली बहुमत को वाम मोर्चे के पाले में जाने के लिए प्रेरित करेगा। माणिक अकेले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने 2002-2008 के दौरान बांग्लादेश में विद्रोही अड्डों के खिलाफ सीमा-पार कार्रवाई का आदेश दिया और उसे सफलतापूर्वक निष्पादित किया, जिसका जिक्र मैंने अपनी पुस्तक अगरतला डॉक्ट्रिन में किया है। इसलिए उनकी सरकार ने बेशक ज्यादा निवेश आकर्षित न किया हो और न ही रोजगार का सृजन किया हो, पर कानून-व्यवस्था की बहाली और जनजातीय उग्रवाद को कुचलने के रिकॉर्ड के कारण बहुसंख्यक बंगालियों में इसके प्रति प्रेम बचा है। हाल ही में वाम नेता श्यामल राय ने कहा कि अगर सिर कंधे पर बरकरार है, तो पेट के लिए भोजन का सवाल आता है। वह जोर देकर यह कह रहे थे कि जनता को प्रभावित करने के लिए वह कानून-व्यवस्था के अपने रिकॉर्ड के बारे में बताएंगे। लेकिन यह तर्क अगली पीढ़ी, महत्वाकांक्षी बंगालियों और आदिवासी लड़के-लड़कियों को प्रभावित नहीं करने वाला, जो काम और अवसर की तलाश में हैं। हां, यह ग्रामीण बंगाली मतदाताओं को प्रेरित करेगा, जो भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी के साथ आईपीएफटी के सत्ता में आने की स्थिति में जनजातीय उग्रवाद के उभार के डर में जीते हैं।
माकपा प्रवक्ता गौतम दास भाजपा-पीडीपी गठबंधन के बारे में संकेत करते हुए कहते हैं, 'हम यहां एक और कश्मीर नहीं चाहते।' राजनीतिक विश्लेषक जयंत भट्टाचार्य कहते हैं, भाजपा को आईपीएफटी के अलग त्रिपुरालैंड की मांग पर स्पष्ट रुख रखना चाहिए। अगर वह उसका समर्थन करती है, तो वह आत्मघाती होगा।
हिंदू एकजुटता की राजनीति ने भले असम में भाजपा की मदद की, पर त्रिपुरा में धर्म नहीं, जातीयता और विचारधारा राजनीति की प्रेरक शक्ति है। जितनी जल्दी भाजपा यह बात समझ जाएगी और हिंदुत्व के बोझ को उतार फेंकेगी, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में उसके लिए उतना ही अच्छा होगा।