बापू आज, जैसे नमक स्वादानुसार : यह खतरा उस समय देख लिया था जब उनकी पीढ़ी के लोग निश्चिंत थे
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आज जब देश 73वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तो इस अवसर पर बापू का स्मरण भी हम कर सकते हैं। वह एक व्यक्ति के रूप में भले ही नश्वर हों, परंतु एक आदर्श के रूप में शाश्वत हैं। उनके विचार और सिद्धांत तब तक रहेंगे, जब तक इंसानियत को जीवन मूल्यों की कद्र रहेगी। जब कद्र खत्म हो जाएगी, तो हम विनाश की तरफ कदम बढ़ा देंगे।
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आज जब देश 73वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तो इस अवसर पर बापू का स्मरण भी हम कर सकते हैं। वह एक व्यक्ति के रूप में भले ही नश्वर हों, परंतु एक आदर्श के रूप में शाश्वत हैं। उनके विचार और सिद्धांत तब तक रहेंगे, जब तक इंसानियत को जीवन मूल्यों की कद्र रहेगी। जब कद्र खत्म हो जाएगी, तो हम विनाश की तरफ कदम बढ़ा देंगे।
इसे सबसे पहले बापू के विचारों और मूल्यों में पर्यावरण चिंता के परिप्रक्ष्य में ही देख लें। ग्लोबल वार्मिंग समेत विश्व पर्यावरण पर आए खतरे से मनुष्य के अस्तित्व पर मंडराता संकट सबको दिख रहा है। खतरे को बढ़ने से बचाने के लिए विश्व समुदाय एक मंच पर है।
बापू ने यह खतरा उस समय देख लिया था, जब उनकी पीढ़ी के लोग निश्चिंत थे कि हमें कुदरत से जो मिल रहा है, वह हमेशा मिलता रहेगा। संपदा बेशुमार है। तब बापू ने कहा था कि कुदरत में अपने सभी बच्चों की जरूरतों को पूरा करने की सामर्थ्य है, परंतु किसी की भी खुदगर्जी या लालच को वह पूरा नहीं कर सकती। हम उनकी इस बात को मानते, तो आज बहुत सारी समस्याएं नहीं होतीं।
बापू की बात छोड़ भी दें, तो हमारे ऐतिहासिक नायकों में कौन है, जिसके आदर्शों-मूल्यों का हम अचरण कर रहे हैं या उन पर खरे उतर रहे हैं? राष्ट्रवादी ध्रुवीकरण की तरफ झुकती वर्तमान राजनीति में बापू होते, तो उन्होंने कहा होता कि संसद में जब विपक्ष विफल हो रहा है, उसके कहे का कोई महत्व नहीं रह गया है, तो सड़कों पर विपक्ष का प्रतीक नजर आना चाहिए।
फिर कोई भी अंजाम क्यों न भुगतना पड़ता। बापू ने लिखा भी है कि अगर आम जन को लगे कि सरकार उसके हित में काम नहीं कर रही, ऐसे कानून या नीति बनाती है, जिसमें जनता का अहित है, तो लोकतंत्र में राजद्रोह जनता का धर्म बन जाता है। इससे अधिक कठोर शब्दों में यह परिभाषित नहीं किया जा सकता कि लोकतंत्र में जनता का क्या कर्तव्य है।
यह विडंबना है कि वतर्मान राजनीति ने हमारे किसी भी महापुरुष को उसके संपूर्ण अस्तित्व के साथ नहीं अपनाया। राम को अपनाया तो उनकी मर्यादापुरुषोत्तम वाली छवि में से केवल योद्धा का स्वरूप ले लिया।
भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल की छवि में से कुछ खास बातें चित्रित कर दी गईं। यही बापू के साथ किया। चश्मा, झाड़ू और चरखा ले लिया। यह सिलेक्टिव भक्ति बहुत छिछले किस्म की है। यह ठीक वैसा है, जैसे रेसिपी बुक में अलग-अलग विधियां विस्तार से बताई जाती हैं, परंतु एक पंक्ति समान होती हैः नमक स्वादानुसार।
इसके बावजूद मैं मानता हूं कि बापू और उनकी बातों को देश-समाज ने पूरी तरह भुला नहीं दिया। वह समय-समय पर बहुत प्रासंगिक दिखे। राजनीतिक रूप से देखें, तो इमरजेंसी के दौर के बाद जिस तरह जनता ने चुनावी प्रक्रिया में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हुए इंदिरा गांधी को सबक सिखाया था।
हाल के वर्षों में राइट टू इनफॉरमेशन के लिए जिस तरह सरकार से लड़ाई लड़ी गई, यह भी लोकतंत्र में जनता की ताकत का उदाहरण था। इसके अतिरिक्त निजी स्तर पर हजारों-लाखों गैर-सरकारी लोग देश में हुए हैं, जिन्होंने बापू के सिद्धांतों पर चलते हुए गरीबों-लाचारों को, पंक्ति के आखिरी आदमी को सशक्त, शिक्षित और सक्षम बनाया।
-लेखक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रपौत्र हैं।