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बांग्लादेश की सियासत: वे अपने ही देश को अस्थिर कर रहे हैं..., भारतीय उत्पादों का बहिष्कार नहीं होगा कामयाब

Sat, 06 Apr 2024 05:34 AM IST
Deepak Vohra दीपक वोहरा
Updated Sat, 06 Apr 2024 05:34 AM IST
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सार
'बांग्लादेश के मामलों में हस्तक्षेप' का विरोध करने के लिए भारतीय उत्पादों के बहिष्कार का 'इंडिया आउट' अभियान, जो ज्यादातर सोशल मीडिया पर ही चल रहा है, कामयाब नहीं होगा, क्योंकि इसका उद्देश्य भारत को नुकसान पहुंचाना उतना नहीं है, जितना ढाका की सरकार को अस्थिर करना।
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Bangladesh Politics Indian Commodity Boycott India Out Campaign on social media
खालिदा जिया और प्रधानमंत्री शेख हसीना (फाइल) - फोटो : ani

विस्तार

जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के नेतृत्व वाली विपक्षी इस्लामवादी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बहिष्कार के बावजूद जनवरी, 2024 के चुनाव में जीत हासिल करके शेख हसीना पांचवीं बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं। छिटपुट हिंसा के बीच व्यापक रूप से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तरीके से 40 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ। शेख हसीना पर पश्चिमी देशों का दबाव था। लेकिन भारत ने निजी तौर पर इस हस्तक्षेप का विरोध किया।



शेख हसीना की स्वायत्त विदेश नीति, भारत से निकटता और बांग्लादेश की शानदार सफलता की वजह से पश्चिमी देश उन्हें सत्ता से बाहर करना चाहते थे। इसलिए वे भारत और बांग्लादेश के बीच दरार पैदा करने के लिए ‘इंडिया आउट’ अभियान चला रहे हैं। यह निराश इस्लामवादियों को सक्रिय होने का मौका देता है। अर्थव्यवस्था को धर्म के साथ मिलाने का नतीजा हमेशा विनाशकारी होता है। इसे पाकिस्तान, सूडान और अफगानिस्तान, आदि के हालात से समझा जा सकता है। बांग्लादेश के इस्लामवादी समूहों का मुख्य लक्ष्य बांग्लादेश में सरिया कानून से शासन चलाना है। जहां आर्थिक मंदी हसीना की मुख्य चुनौती है, वहीं देश का बढ़ता इस्लामीकरण चिंता की बात है। पहले की तुलना में अब ज्यादा बांग्लादेशी महिलाएं बुर्का और हिजाब में दिखती हैं।


शासन परिवर्तन आंदोलन का नेतृत्व ओपन सोसाइटी फाउंडेशन कर रहा है, जिसकी स्थापना खतरनाक जॉर्ज सोरोस ने की है, जो न्याय, लोकतांत्रिक शासन और मानवाधिकारों (और दुनिया को नियंत्रित करने के अमेरिकी हित) के लिए काम करने वाले तथाकथित स्वतंत्र समूहों का सबसे बड़ा निजी वित्तपोषक है। पहला बांग्लादेशी इस्लामी उग्रवादी गुट 1989 में उभरा, जब कई दर्जन गुटों का एक नेटवर्क स्थापित और विस्तारित हुआ। भारत मुक्ति संग्राम के समय
से ही बांग्लादेश की बाहरी चुनौतियों से निपटा है। भारत ने अवामी लीग का समर्थन किया, जबकि पाकिस्तान, चीन और अमेरिका उसके खिलाफ खड़े थे। ये सभी शेख हसीना को सत्ता से हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

दक्षिण एशिया में सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली देश के रूप में भारत कमजोरों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों का सामना करता है, लेकिन हमारे सभी छोटे पड़ोसियों द्वारा आरोप लगाए जाते हैं। जाहिर है, सही संतुलन बनाना आसान नहीं है, लेकिन हम संवेदनशील प्रयास कर रहे हैं। क्या 'बांग्लादेश के घरेलू मामलों में निरंतर हस्तक्षेप' का विरोध करने के लिए भारतीय उत्पादों के बहिष्कार का इंडिया आउट अभियान, जो ज्यादातर सोशल मीडिया पर चल रहा है, काम करेगा। इसका जवाब है-नहीं, क्योंकि इसका उद्देश्य भारत को नुकसान पहुंचाना उतना नहीं है, जितना ढाका की सरकार को अस्थिर करना।

बांग्लादेश भारत से आयात पर निर्भर है, जो कुल मिलाकर 16 अरब डॉलर से ज्यादा का है। इसमें खाद्य, ईंधन, उर्वरक, औद्योगिक कच्चा माल जैसी जरूरी चीजें शामिल हैं, जबकि उसके कॉरपोरेट सेक्टर सॉफ्टवेयर और सेवा-आधारित कुशल भारतीय श्रमिकों और विशेषज्ञों को नियुक्त करते हैं। भारत ने बांग्लादेश को विकास सहायता के मद में 10 अरब डॉलर से ज्यादा रकम दी है। भारत अगर बांग्लादेश से बाहर निकल जाएगा, तो क्या बांग्लादेश चीन से आयात करेगा?

'इंडिया आउट' अभियान से जुड़े लाखों बीएनपी समर्थकों का झुकाव जिहादवाद और हिंदू विरोधी भावनाओं की ओर है, जो इस क्षेत्र के लिए गंभीर सुरक्षा खतरा पैदा कर सकता है। बांग्लादेशी मदरसे उग्रवाद के लिए खाद-पानी मुहैया कराते रहते हैं। हिंदुओं पर छिटपुट हमले और उनकी संपत्तियों को लूटने की घटनाएं होती रहती हैं।

इन सबके बावजूद बांग्लादेश भारत के लिए और भारत बांग्लादेश के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं कि इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। नदी जल का बंटवारा, जलवायु परिवर्तन से लड़ना, अधिक आयात, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, बेहतर सीमा प्रबंधन-ये प्राथमिकता वाले क्षेत्र हैं। कई दक्षिण एशियाई देश यह सबक ले रहे हैं कि चीन वास्तव में उन्हें अपने बराबर नहीं मानता।

बांग्लादेश का लक्ष्य अगले 20 वर्षों में अपने 16.7 करोड़ लोगों के लिए उच्च-मध्यम आय का दर्जा प्राप्त करना है, जो भारत के समर्थन के बिना संभव नहीं है। कुछ ही महीने पहले ढाका ने अपनी भुगतान संतुलन की लड़खड़ाती स्थिति को देखते हुए आईएमएफ से ऋण मांगा था। बांग्लादेश का कर-जीडीपी अनुपात दुनिया में सबसे कम है। ईंधन की कीमतों में रातों-रात 50 फीसदी की वृद्धि हुई और लोग सड़कों पर उतर आए। बांग्लादेश को भारत से पैसा, निवेश,
तकनीक और खाद्यान्न चाहिए। जबकि भारत चाहता है कि वहां भारत-विरोधी गुटों को पनाह नहीं मिले, गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों की सुरक्षा हो और चीन को इतना तवज्जो न दिया जाए कि हमारे सुरक्षा हितों को नुकसान पहुंचे।

कोई भी अर्थव्यवस्था तब संकट में होती है, जब उसे बढ़ती ऊर्जा लागत, बढ़ती मुद्रास्फीति, घटते विदेशी मुद्रा भंडार, प्रतिकूल अंतरराष्ट्रीय आर्थिक माहौल और सिकुड़ते निर्यात बाजारों का सामना करना पड़ता है। बांग्लादेश को इन सबके साथ-साथ और भी बहुत कुछ झेलना पड़ा है। वस्त्र उद्योग बांग्लादेश का गौरव है, लेकिन कारखाने पहले से ही अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के ऑर्डर में मंदी, तैयार माल की कम कीमतों, वैश्विक स्तर पर कच्चे माल की ऊंची कीमतों और लगातार बिजली कटौती के कारण जूझ रहे हैं। महंगी प्राकृतिक गैस की कमी के कारण 2026 तक बिजली कटौती का खतरा मंडरा रहा है, जिससे निर्माताओं को नुकसान हो रहा है। इसका बुरा प्रभाव हो सकता है।

बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर 17 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया है, क्योंकि इसका केंद्रीय बैंक मुद्रा का बचाव करने में नाकाम रहा है, जो अब डॉलर के मुकाबले लगभग 110 टका है। मौजूदा विदेशी मुद्रा भंडार से लगभग तीन महीने के आयात बिल का भुगतान किया जा सकता है। ऐसे में, कौन उनकी मदद कर सकता है? जाहिर है, पहले भी भारत ने ही 4.5 अरब डॉलर का अनुदान एवं ऋण देकर उसकी मदद की थी।

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