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पड़ोस की पहली महिला स्पीकर

Fri, 03 May 2013 09:43 PM IST
हेमेन्द्र मिश्र
हेमेन्द्र मिश्र Updated Fri, 03 May 2013 09:43 PM IST
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bangladesh first woman speaker shirin sharmin chowdhury

कट्टरपंथियों के लिए वह शरीयत कानून की 'विरोधी' हैं, तो आलोचक उन्हें जनता का 'परोक्ष' प्रतिनिधि मानते हैं। लेकिन शिरीन शरमीन चौधुरी इन आरोपों की परवाह नहीं करतीं।

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उनके लिए तो महिला अधिकार और सम्मान की वह लड़ाई ही बड़ी उपलब्धि है, जिसका एक पड़ाव करीब दो वर्ष पहले बनाई गई नेशनल वूमेन डेवलपमेंट पॉलिसी (राष्ट्रीय महिला विकास नीति) है, जिस वजह से उदारवादी उन्हें महिलाओं के सम्मान का 'प्रतीक' मानते हैं।
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इसलिए जब बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने जातीय संसद की स्पीकर के रूप में उनका नाम प्रस्तावित किया, तो किसी ने भी उनका विरोध नहीं किया। इस तरह शिरीन बांग्लादेश की संसद की पहली महिला और सबसे युवा स्पीकर बन गई हैं। कट्टरपंथियों को हालांकि उनकी नियुक्ति पर ऐतराज है।
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शिरीन की अब तक की राजनीतिक यात्रा मुश्किलों भरी रही है। पेशे से वकालत करने वाली शिरीन का नाम लोगों की जुबां पर तब चढ़ा, जब उन्होंने अवामी लीग की अध्यक्ष और वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ चल रहे मुकदमों की पैरवी शुरू की।

ये मुकदमे सेना समर्थित अंतरिम सरकार के दौरान लगे थे। ज्यों-ज्यों ये मुकदमे अपने अंजाम तक पहुंचने लगे, शिरीन अवामी लीग के करीब आती गईं। और फिर महिलाओं के लिए आरक्षित सीट से जीतकर वह जातीय संसद में पहुंच गई।

कट्टरपंथियों से उनकी 'सीधी' लड़ाई उस वूमेन डेवलपमेंट पॉलिसी से शुरू हुई, जिसमें महिला सशक्तिकरण और रोजगार की वकालत की गई है। लेकिन बचपन से ही तथ्यों को तर्कों की कसौटी पर कसने में माहिर शिरीन ने कभी इन झंझावातों की परवाह नहीं की। इसकी एक वजह मानवाधिकार और संसदीय कानून में डॉक्टरेट की उनकी डिगरी भी है, जिसने उन्हें मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में भी चीजों को व्यापक नजरिये से देखना सिखाया है।

हालांकि तब भी शिरीन के लिए संसद-अध्यक्ष का ओहदा काटों-भरे ताज जैसा है। अब तक वह संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों से ही जूझती रही हैं, अब उन्हें सत्ता पक्ष और विपक्ष के उन सांसदों को भी संभालना है, जिनके बीच चल रहा सियासी टकराव इस नाजुक मोड़ पर पहुंच गया है कि देश में 'अभूतपूर्व' राजनीतिक संकट की बात कही जा रही है।


पर जीवट की धनी शिरीन आशान्वित हैं। उनके मुताबिक, कोई भी अध्यक्ष राष्ट्र की स्वतंत्रता और अधिकार का प्रतीक होता है, और वह इस प्रतीक को ताकत के रूप में इस्तेमाल करना बखूबी जानती हैं।

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