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चुनाव की दस्तक: दांव पर बांग्लादेश की साख, शेख हसीना के सामने स्वतंत्रता और निष्पक्षता की चुनौती
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विस्तार
बांग्लादेश में आगामी सात जनवरी को आम चुनाव होने वाले हैं। वहां के आम चुनाव पर दुनिया भर की नजर है और भारत के साथ अमेरिका एवं रूस जैसे देश भी इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं। बांग्लादेश की मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना वर्ष 2009 से सत्ता में हैं। उन्हें मुल्क के सामाजिक व आर्थिक विकास को गति देने एवं एक उभरती अर्थव्यवस्था वाला देश बनाने का श्रेय दिया जाता है। मुल्क के लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए उनकी सरकार की दुनिया भर में तारीफ होती रही है। लेकिन सच यह भी है कि उन पर अपने राजनीतिक विरोधियों के दमन और अधिनायकवादी रवैया अपनाने के आरोप लग रहे हैं।
यही नहीं, मीडिया के लोगों को प्रताड़ित करने के आरोप भी उन पर हैं। लेकिन इतने वर्षों से एक ही पार्टी और एक ही नेता के सत्ता में होने के कारण वहां सत्ता विरोधी लहर भी है। बांग्लादेश के इस चुनाव में कई सारे मुद्दे हैं, जैसे बेरोजगारी, महंगाई, अर्थव्यवस्था, लोककल्याण आदि का मुद्दा है, क्योंकि ये सारी चीजें लोगों को प्रभावित कर रही हैं।
हमारे दक्षिण एशियाई देशों की एक खासियत है कि यहां के लोग राजनीतिक रूप से काफी सजग एवं जागरूक होते हैं, उसमें भी खासकर बंगाली समुदाय। बांग्लादेश की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यह है कि वहां जितनी भी पार्टियां हैं, सबके नेता लगभग बुजुर्ग हो चुके हैं और उनके उत्तराधिकारी किसी भी पार्टी में तैयार नहीं हो पाए हैं। इसकी वजह है कि वहां की पार्टियों ने दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को तैयार करने की कोशिश ही नहीं की है। चाहे आप शेख हसीना की अवामी लीग को देखें, या खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को देखें या जातीय पार्टी को देखें, इन तीनों बड़ी पार्टियों में दूसरी पंक्ति का कोई नेता नजर नहीं आता।
इस बार के चुनाव की अनूठी बात यह है कि प्रमुख विपक्षी पार्टी बीएनपी समेत कई विपक्षी दल वहां चुनाव में हिस्सेदारी नहीं कर रहे हैं। जातीय पार्टी में भी दो धड़े हैं, जिसमें से इरशाद रौशन वाला धड़ा चुनाव नहीं लड़ रहा है। बीएनपी समेत ये विपक्षी पार्टियां यह सोचती हैं कि अगर प्रमुख विपक्षी पार्टियां चुनाव में हिस्सेदारी नहीं करेंगी, तो इस चुनाव को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिलेगी। अंतरराष्ट्रीय जगत में अगर बांग्लादेश की नई सरकार को मान्यता नहीं मिलेगी, तो उसे कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
गौरतलब है कि कुछ महीनों पहले बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी जैसी विपक्षी पार्टियों ने सरकार के खिलाफ रैली निकाली थी, जिसमें काफी हिंसा हुई। रैली के दौरान लाखों कार्यकर्ता सड़क पर उतरे थे, और पुलिस के साथ जबर्दस्त झड़प के दौरान कुछ जानें भी गई थीं। इन विपक्षी पार्टियों का कहना था कि चूंकि शेख हसीना सरकार के सत्ता में रहते निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते, इसलिए उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए और एक कार्यवाहक सरकार के तहत चुनाव करवाया जाना चाहिए।
मुझे लगता है कि इसके पीछे कुछ हद तक अमेरिका का भी हाथ है, क्योंकि अमेरिका लगातार कहता रहा है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र नहीं रह गया है और वहां अधिनायकवादी सरकार का शासन चल रहा है। पाठकों को याद होगा कि जब अमेरिका में ‘डेमोक्रेसी समिट’ हुई थी, तो उसमें बांग्लादेश को आमंत्रित नहीं किया गया था। इसके अलावा संभवतः अमेरिका यह भी सोचता है कि शेख हसीना सरकार के नेतृत्व में बांग्लादेश के रिश्ते चीन और तुर्किये के साथ काफी घनिष्ठ हो गए हैं। जहां तक रूस की बात है, तो उसकी दिलचस्पी का प्रमुख कारण यह है कि वहां रूस की कई परियोजनाएं चल रही हैं। रूस राजनीतिक रूप से वहां बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं है।
हाल के वर्षों में बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार में भी कट्टरपंथी आवाजें मुखर हुई हैं। हमारे देश में जब एनआरसी और सीएए की बात हुई थी, तब वहां के कुछ नेताओं ने भारत के खिलाफ बयानबाजी की थी। इसके अलावा, बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं के साथ प्रताड़ना की खबरें यदा-कदा आती रही हैं और इसमें भी कोई शक नहीं है कि वहां रहने वाले हिंदू दबे-दबे रहते हैं। लेकिन जैसा कि अपनी घरेलू राजनीति की मजबूरी के तहत पार्टियों को तोड़ना, प्रभावशाली नेताओं को अपने खेमे में लाना, अपने मतदाताओं को खुश करने के लिए लोकलुभाव घोषणाएं करना, चुनाव जीतने वाले प्रत्याशियों को जेल से रिहा कराना जैसी घटनाएं दक्षिण एशियाई देशों में लगभग हर जगह होती हैं, यह सब बांग्लादेश में भी हो रहा है।
इसके अलावा, बांग्लादेश के चुनावों में भारत से संबंध एक प्रमुख मुद्दा होता है। हर बार चुनाव में यह मुद्दा होता है कि भारत के साथ कैसे संबंध होंगे। शेख हसीना सरकार के संबंध भारत के साथ आम तौर पर अच्छे रहे हैं, क्योंकि शेख हसीना के पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में चले मुक्ति आंदोलन में भारत ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। इसलिए वहां की विपक्षी पार्टियां यह सोचती हैं कि भारत के साथ अवामी लीग के संबंध राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंध बनाए रखने का पक्षधर है।
बीएनपी और जातीय पार्टी भारत का विरोध करती हैं, लेकिन शेख हसीना की अवामी लीग के साथ मुक्ति युद्ध के कारण भावनात्मक रिश्ते रहे हैं। हालांकि बांग्लादेश इस वक्त संतुलन बनाकर चल रहा है। शेख हसीना की सरकार चीन और भारत के साथ बराबर रिश्ते बनाकर चल रही है, क्योंकि वह जानती है कि अगर किसी एक देश पर निर्भर रहे, तो श्रीलंका जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए मुझे यह लगता है कि अगर दूसरी पार्टियां चुनाव जीतकर आती हैं, तो वह भारत के लिए अच्छा नहीं होगा। स्वाभाविक रूप से शेख हसीना की पार्टी अगर सत्ता में आती है, तो भारत और बांग्लादेश, दोनों के लिए अच्छा रहेगा।
बांग्लादेश सरकार और वहां का निर्वाचन आयोग संभवतः अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को आमंत्रित करने पर विचार कर सकते हैं, ताकि चुनाव परिणामों को बड़े पैमाने पर वैधता और स्वीकृति मिल सके। अगर अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक बोलेंगे कि चुनाव स्वतंत्र एवं निष्पक्ष हुए हैं, तो उसकी वैधता बन सकती है। फिलहाल वहां चुनावी हलचल बहुत तेज है और सात जनवरी को ही पता चल पाएगा कि चुनाव कितने शांतिपूर्ण और निष्पक्ष हो रहे हैं।