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कुछ हंसना-गाना शुरू करो
बालकवि बैरागी
Updated Sat, 30 Aug 2014 10:01 PM IST
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कुछ तो सोचा ही होगा संसार बनाने वाले ने
वरना सोचो ये दुनिया जीने के लायक क्यों होती?
तुम रोज सवेरे उठते हो और रोज रात को सोते हो
जब भी कोई मिलता है, अपना ही रोना रोते हो
ये रोना-धोना बंद करो, कुछ हंसना-गाना शुरू करो
बेशक मरने को आए हो, पर बिना जिये तो नहीं मरो
इन पेड़ों से, इन पौधों से कुछ कला सीख लो जीने की
वरना ये हंसमुख हरियाली इतनी सुखदायक क्यों होती?
वरना सोचो ये दुनिया जीने के लायक क्यों होती?
कुछ तो सोचा ही होगा संसार बनाने वाले ने।।
निस्सार कहो, नश्वर कह दो, पर जीवन आखिर जीवन है
इसमें ही मोर, पपीहे हैं, रसरंग भरा अपनापन है
यदि सार नहीं होता ये तो क्यों निस्सार कहाता ये
इसकी, उसकी, कड़वी, मीठी, क्यों कर गाली खाता ये
धन्यवाद दो उसको जिसने यह उपहार दिया अनुपम
वरना अपनी ही जठरा इसकी संवाहक क्यों होती?
वरना सोचो ये दुनिया जीने के लायक क्यों होती?
कुछ तो सोचा ही होगा संसार बनाने वाले ने।
आप जिसे दुख कहते हैं, वह क्यों फिरता मारा-मारा
इतना शक्तिभूत होकर भी क्यों कहलाता बेचारा
वह भी अपने सुुख की खातिर आप तलक आ जाता है
मुझको मेरा सुख दे दो, कहकर झोली फैलाता है
हर दुख का भी अपना सुख है, जो छिपा आपके भीतर है
यह छम्मक छैया सुख-दुख की, अपनी सुर गायक क्यों होती?
वरना सोचो ये दुनिया जीने के लायक क्यों होती?
कुछ तो सोचा ही होगा संसार बनाने वाले ने।
इस दुनिया में इस जीवन को जी लेना एक तपस्या है
पता नहीं किसने समझाया जीवन एक समस्या है।
संसार बनाने वाला अपना शत्रु नहीं है, साथी है
जब जब भी तुम हंसते हो उसकी बांछें खिल जाती हैं
आंसू को उसने उम्र नहीं दी यह भी एक करिश्मा है
वरना खुशियों की उम्र भला इतनी उन्नायक क्यों होती?
वरना सोचो ये दुनिया जीने के लायक क्यों होती?
कुछ तो सोचा ही होगा संसार बनाने वाले ने।