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बहुत दिनों बाद होता है कोई नामवर पैदा

Wed, 20 Feb 2019 07:54 PM IST
Raman Singh विश्वनाथ त्रिपाठी
विश्वनाथ त्रिपाठी Published by: Raman Singh Updated Wed, 20 Feb 2019 07:54 PM IST
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Bahut Dino Bad hota hai koi Namvar Paida
फाइल फोटो

मैंने उन्हें पहली बार काशी में देखा। 1953 की जुलाई में जब मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमए हिंदी की पढ़ाई करने आया, तो पहली बार मैंने नामवर जी को देखा। वह वहां विश्वविद्यालय में शोध छात्र थे। लेकिन आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उनको एमए की कक्षाएं भी पढ़ाने को दे दी थीं और वह इस मायने में विशिष्ट थे कि शोध छात्र होते हुए भी वह एमए के छात्रों को पढ़ाते थे। तब उनकी उम्र 27 साल रही होगी। वह देखने में ऐसे लगते थे, जैसे कोई किसान खेत में कुदाल चलाकर आया हो। खद्दर के कुर्ते-धोती में उनका शरीर बिल्कुल तना हुआ था, जैसे श्रम से गठा हुआ हो। उसी समय प्रबुद्ध छात्र के रूप में उनकी ख्याति चारों ओर फैल चुकी थी। शीघ्र ही वह लोकप्रिय अध्यापक के रूप में भी प्रसिद्ध हो गए। उनकी प्रसिद्धि सुनकर मैं उनसे मिलने को उत्सुक हो उठा और समय लेकर उनके घर मिलने गया था। वह घर पर नहीं थे, उनके भाई काशीनाथ सिंह थे। तीन घंटे प्रतीक्षा करने के बाद मैं लौट चला। लौटते हुए मैंने देखा कि वह यूनिवर्सिटी से बस में अपने घर की तरफ लौट रहे हैं। बस फिर क्या था, मैं भी लौट पड़ा। जब वह घर पर मिले, तो बोले कि मैंने आपको तीन घंटे प्रतीक्षा कराया, इसलिए मैं आपको तीन वचन देना चाहता हूं, जिसका मैं जीवन भर पालन करूंगा। वह बड़े विनोदी थे, बातचीत से मन मोह लेते थे। तबसे उनसे जो संबंध बना, आजीवन उन्होंने उस संबंध का निर्वाह किया।


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काशी में रहते ही मैं उनके यहां बहुत आने-जाने लगा। केदारनाथ सिंह मेरे सहपाठी थे। हम दोनों उनके घर आते-जाते रहते थे। नामवर जी जो कुछ पढ़ते थे, वह हम लोगों को बताते थे। इस तरह से आधुनिकता के संस्कार और आधुनिक साहित्य का पाठ उन्होंने हम लोगों को पढ़ाया। सच्ची बात यह है कि उस समय जो संस्कार मेरे ऊपर पड़ा, वह संस्कार मेरे जीवन भर की पूंजी बन गया। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी तो प्रेरणा देते थे, पर लेखक या साहित्य का पाठक मैं नामवर जी की संगत के कारण बना।

मैं बहुत साधनहीन विद्यार्थी था। सच्ची बात तो यह है कि मेरे खाने-पीने और रहने का कोई ठिकाना नहीं था। नामवर जी भी उन दिनों आर्थिक दृष्टि से बहुत अभावग्रस्त थे, फिर भी उन्होंने मेरी सहायता की। फिर मैं नौकरी करते हुए दिल्ली आ गया। नामवर जी ने वहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा, हार गए। काशी विश्वविद्यालय से उनकी नौकरी भी चली गई। फिर सागर में नौकरी मिली, वह भी छूट गई। फिर उन्होंने सोचा कि चलते हैं काशी, द्विवेदी जी से मिलकर करते हैं कुछ इंतजाम, क्योंकि द्विवेदी जी का बहुत सहारा था उन्हें। लेकिन पता चला कि उन्हें भी नौकरी से हटा दिया गया है। फिर छह-सात साल उनकी आय का कोई निश्चित स्रोत नहीं था, वह उनके जीवन के बहुत बुरे दिन थे। लेकिन नामवर जी का जो तेज था, जो स्वाभिमान था, वह किसी प्रकार आहत नहीं हुआ। बल्कि उन्हीं दिनों उन्होंने कहानी ः नई कहानी, छायावाद जैसी महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। इस तरीके से उन्होंने जीवन में संघर्ष करना शुरू से सीखा, और नामवर जी के जीवन का सबसे सक्रिय और सार्थक क्षण वही था, जो उन्होंने ऐसी स्थिति में काशी में बिताए।
 
फिर नामवर जी भी 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की साप्ताहिक पत्रिका जनयुग में काम करने आ गए। वह इसके साथ ही राजकमल प्रकाशन में भी काम करते थे। दिल्ली में नामवर जी के यश का और विस्तार हुआ। उनके आने के बाद दिल्ली में साहित्यिक गतिविधियां बढ़ गईं और वह उसके केंद्र में रहे। नामवर जी के बिना पूरे भारत में कोई साहित्यिक गोष्ठी सफल और सार्थक नहीं मानी जाती थी। नामवर जी के यश विस्तार में उनके लेखन का तो हाथ है ही, उनके वक्तृत्व कला का भी खासा योगदान है। नामवर जी कवि भी बहुत अच्छे थे। उन्होंने बकलम खुद में कुछ अच्छे ललित निबंध भी लिखे। लेकिन वास्तव में वह बड़े आलोचक थे। आलोचक के रूप में उनका मुख्य योगदान यह है कि उन्होंने पाठकों को साहित्य पढ़ने का एक नया तरीका दिया, साहित्य के नए किस्म के पाठक तैयार किए, साहित्य का नया पाठ तैयार किया। जैसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने एक नया तुलसी और नया जायसी प्रस्तुत किया, उसी तरह से नामवर जी की अपने समकालीन लेखन पर अचूक पकड़ थी। यह नामवर जी का बहुत बड़ा योगदान है। हिंदी समाज ने उनका सम्मान भी बहुत किया। निर्मल वर्मा, धूमिल जैसे कई रचनाकार हैं, जो उनकी आलोचना का स्पर्श पाकर उजागर हो गए। बहुत से लोग मानते हैं, कि हिंदी की दुनिया, खासकर हिंदी अध्यापकों की दुनिया जड़ है, ढकी-मुंदी दुनिया है, लेकिन नामवर जी ने अध्यापक के रूप में आधुनिक दृष्टि से नया पाठ्यक्रम तैयार किया, जो उनका बहुत बड़ा योगदान है।

नामवर सिंह का देहांत हिंदी साहित्य के एक युग का अंत है। वह हिंदी साहित्य के प्रतिनिधि व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपने लेखन, अध्यापन और भाषणों से लेखकों और पाठकों की पीढ़ियां तैयार कीं, साहित्य की नई पाठ-विधि प्रस्तुत की। उन्होंने हिंदी की एकाधिक पीढ़ियों को साहित्य पढ़ने, लिखने और समझने के रास्ते बताए। नामवर सिंह हमारे दौर के साहित्यिक गुणवत्ता के मानक थे। उनकी उपस्थिति के बिना साहित्य के मुद्दे, विवाद, प्रश्न सार्थक नहीं होते थे। वह आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ. रामविलास शर्मा की परंपरा की ऐतिहासिक कड़ी थे। डॉ. नामवर सिंह ऐसे वामपंथी चिंतक और आलोचक थे, जो सभी खेमों में मान्य थे और सबको एकत्र करने वाले व्यक्ति ही नहीं, मंच भी थे। वह प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पथ-प्रदर्शक थे। उनके जाने से निर्जनता और शून्यता का एहसास हो रहा है। उन्होंने मुझे लिखना-पढ़ना सिखाया, विविध प्रकार से मेरी सहायता की। वह मेरे गुरु और सतीर्थ (गुरुभाई) थे। उनके जाने से मेरे लिए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का देहांत अब हो गया है।

अगर मैं लेखक या आलोचक हूं, तो मेरा मानना है कि हम उनकी जेब से निकले हुए आलोचक हैं। बहुत दिनों के बाद नामवर जैसा व्यक्तित्व पैदा होता है और हिंदी साहित्य को शायद बहुत दिनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी नामवर जी जैसा दूसरा व्यक्ति देखने के लिए। 

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