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अयोध्या, आम आदमी और बुद्धिजीवी

Wed, 13 Nov 2019 05:54 AM IST
sudheesh pachauri सुधीश पचौरी
Updated Wed, 13 Nov 2019 05:54 AM IST
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Ayodhya, common man and intellectual
सुधीश पचौरी, वरिष्ठ साहित्यकार

अयोध्या पर फैसला आने की सुबह के साढ़े सात बजे पड़ोस में सब्जी बेचने वाले एक युवक ने अचानक पूछ लिया कि बाबूजी! आज क्या होने वाला है? मैंने कहा कि हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट मंदिर की समस्या को निपटा दे। मंदिर बनवा दे। वह बोला मस्जिद का क्या होगा? मैंने कहा कि हो सकता है कि अदालत मस्जिद के लिए भी कोई व्यवस्था कर दे! वह तपाक से बोला यही ठीक होगा। अगले रोज सोसाइटी के गेट से निकलते ही एक बुद्धिजीवी मित्र टकरा गए। देखते ही उलाहना देने लगे कि ‘करवा दिया फैसला’! मैंने मजाक में कहा ‘हुइहै वही, जो राम रचि राखा’ तो वे उपहास में जोर से हंसे मानो मैंने कोई अपराध कर दिया हो।


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सब्जी वाले की चिंता थी कि मंदिर-मस्जिद का मामला हमेशा के लिए निपट जाए। मंदिर बने तो मस्जिद भी बन जाए! लेकिन बुद्धिजीवी जी की मंशा फैसले की हंसी उड़ाने की थी। बता दूं कि सब्जी बेचने वाला युवक मुसलमान नहीं है! न वह किसी दल का राजनीतिक कार्यकर्ता है, बल्कि अपनी सब्जी बेच कर रोजी-रोटी कमाने से मतलब रखने वाला आम आदमी है। साधारण मनुष्य सरलता से सोचता समझता है, जबकि पढ़े-लिख बुद्धिजीवी वर्ग का काम सरल को भी ‘असरल’ बनाने का होता है। और इन दिनों बुद्धिजीवी कोई ‘मनीषी’ नहीं होते, वे या तो एनजीओ छाप होते हैं या एडवोकेसी समूह के प्रवक्ता होते हैं, जो किसी भी ‘विवाद’ के बने रहने में ही अपना करिअर समझते हैं।  

कहने की जरूरत नहीं कि अयोध्या में मंदिर-मस्जिद संबंधी फैसले के आने के बाद ऐसे ही तत्व सबसे अधिक ‘चिंतित’ नजर आते हैं। वे सोचते हैं कि अगर मंदिर-मस्जिद विवाद निपट गया, तो वे बेरोजगार हो जाएंगे! साधारण जीवन जीने वाला आदमी भी किसी जटिल समस्या को अपनी सहजानुभूति और सहज बुद्धि से सीधे तरीके से समझता है जबकि बुद्धिजीवी तर्क-वितर्क की ‘गांठ’ लगाकर समझता है। इस मामले में बाबरी की जगह पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे द्वारा की जाती ‘खुदाई’ पर लगाई जाती राजनीतिक ‘गांठों’ को देखा जा सकता है कि किस तरह बाबरी के नीचे दबे ‘गैर इस्लामिक’ अवशेषों पर तरह-तरह की शंकाएं और प्रश्न उठाए गए और अब जब अदालत ने उस सर्वे की रिपोर्ट पर मुहर लगा दी, तो सारे विशेषज्ञ अचानक बहस से बाहर हो गए। और, यह तो इतिहास सिद्ध है कि मध्यकाल में जो इस्लामी आक्रांता आते थे, तो वे ‘प्रसाद’ बांटने नहीं आते थे, बल्कि अपनी ‘विजयी धर्मध्वजा’ भी फहराने आते थे और यह भी सच है कि कई इस्लामी आक्रांता तो ‘गजवा ए हिंद’ का इरादा लेकर भी आए थे। यह एक कटु-सत्य है। तब, क्या पता बाबरी ‘गजवा ए हिंद’ का ही एक-निशान’ हो!

 ‘नव्य इतिहासशास्त्र’ कहता है कि किसी भी काल का सिर्फ ‘एक इतिहास’ नहीं होता, बल्कि ‘अनेक इतिहास’ होते हैं। इस तरह एक तो होता है 'ऑफिशियल इतिहास’ जिसे विजेता लिखते हैं और एक होती है ‘लोकस्मृति’; पब्लिक मेमरी, जिसे ‘विजित’ अपनी ‘लोकस्मृति’ ; पब्लिक मेमरी से अपना समांतर इतिहास लिखा करती है। इसलिए इतिहास में जो हुआ, उसे छिपाने दबाने से वे बातें दबती नहीं जो दबाई जाती हैं। वे ‘पराजित का क्षुब्ध नेरेटिव’ बनकर ‘लोकस्मृति’ में पड़ी रहती हैं और अनुकूल समय पाकर जग जाती हैं और फिर वे ‘अपने तरीके से’ और कई बार ‘विद वेंजिएंस’ (प्रतिशोध के साथ) इतिहास को सीधा करने लगती हैं। हमें समझना होगा कि इतिहास सिर्फ ‘प्रख्यात इतिहासकार’ नहीं लिखा करते, इतिहास में रहने वाली जनता अपनी लोककथाओं में, किस्सों में, अपना इतिहास लिखा करती है और कई बार वह अपने क्षोभ का इतिहास भी लिखा करती है। अगर अदालत ने ‘रामलला’ को मंदिर की जमीन का ‘कानूनी स्वामी’ माना है, तो शायद इसीलिए कि ‘रामलला’ लोकस्मृति में ‘विद्यमान’ हैं। इसके बरक्स, सेकुलर इतिहासकार जब रामकथा को ‘कोरी कल्पना’ या ‘मिथक’ मानते हैं, तो वे वस्तुतः ‘लोकस्मृति’ की ‘अवमानना’ ही करते हैं।

याद रखें, ‘मंदिर आंदोलन’ के जरिये सिर्फ विश्व हिंदू परिषद-आडवाणी इतिहास नहीं लिख रहे थे, बल्कि अनंत राम भक्त भी अपनी स्मृति से इतिहास सिर्फ रच ही नहीं रहे थे, उसमें रह भी रहे थे। इसे ‘नव्य इतिहासशास्त्र’ के नजरिए से ही समझा जा सकता है। समकालीन ‘पंच परमेश्वरों’ का फैसला इस मानी में ‘चमत्कारी’; एकाध तत्ववादी समूह को छोड़ बाकी सभी दलों और आम जनता ने इसका तहेदिल से स्वागत किया है और शांति और भाईचारा बनाए रखने की अपील की है। इस प्रसंग में सबसे अधिक समझदारी व्यापकतम मुस्लिम समाज ने दिखाई है। वह फैसले से ‘संतुष्ट’ नजर आता है कि चलो बवाल कटा! फिर भी, कुछ बुद्धिजीवी बाल की खाल निकालने में अब भी लगे हैं। यों वे ऊपर से फैसले का स्वागत करते हैं, फिर किंतु-परंतु लगा कर कहते हैं कि यह ‘बहुमत; यानी हिंदू का विजयवाद’ है, जबकि राम ‘करुणावतार’ हैं और एक ‘संतप्त’ नायक हैं। अगर यह ‘बहुमत का विजयवाद’ ही होता, तो मस्जिद को पांच एकड़ जमीन देने की बात पर क्या कथित ‘बहुमतवादी विलयवादी’ चुप रहते।

अपने बुद्धिजीवियों की समस्या यही है कि राम के नाम पर उन्हें वाल्मीकि-भवभूति तो याद आते हैं, तुलसीदास की ‘रामचरित मानस’ भूले से भी याद नहीं आती। इसीलिए उनके लिए राम सिर्फ ‘करुणाकर’ हैं, जबकि आम आदमी के लिए राम ‘करुणा के सागर’ तो हैं ही, वे उसके ‘परम पूज्य’ और ‘आराध्य देव’ भी हैं। तुलसी के अनुसार कलियुग में मुक्ति के लिए उनका ‘नाम स्मरण’ ही काफी है। वे भगवान विष्णु के अवतार है। इस तरह, राम सिर्फ एक मूर्ति या मंदिर का नाम नहीं, बल्कि सामान्य से सामान्य हिंदू की आस्था के प्रतीक और केंद्र हैं।

न्यायविद् बराबर बता रहे हैं कि यह फैसला ‘आस्था’ पर नहीं, ‘प्रमाणों’ पर आधारित है। फिर भी कुछ बुद्धिजीवी इसे ‘श्रद्धा और आस्था’ का फैसला मानकर अस्मिताओं और आस्थाओं के भावी द्वंद्वों को ‘खोलने’ वाला समझते हैं, तो उनको यह भी समझ लेना चाहिए कि अगर  समाज में ‘अस्मिताएं’ हैं; जो कि हैं, तो वे ‘झगड़े’ की जगह बनेंगी ही। इसके बावजूद, आज अगर अदालत और कथित ‘बहुमतवादी’ अस्मिता कहती है कि ‘बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुध लेहु’ तब भी क्या आप उसका विश्वास नहीं करेंगे? अगर आप उस पर विश्वास नहीं करेंगे, तो आप पर कौन करेगा?  

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