ए भाई जरा देख के चलो: किसी भी सख्त कानून का स्वागत होना चाहिए
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मौत का कुआं बन रही सड़कों पर हजारों निर्दोष लोगों की जान यदि बच सके, तो किसी भी सख्त कानून का स्वागत होना चाहिए। जुर्माने को बीस गुना तक बढ़ाने और गजब चालान की घटनाओं से घबराई अनेक राज्य सरकारों ने कानून में किए गए 66 बदलावों को लागू करने के लिए अभी तक सरकारी अधिसूचना (नोटिफिकेशन) जारी नहीं की है। केंद्र सरकार ने नए कानून बनाने के उद्देश्यों के बारे में सुप्रीम कोर्ट के 1987 के फैसले का जिक्र किया है। परंतु 30 साल पुराने उस फैसले को तो 1988 के मोटर व्हीकल कानून में पहले ही शामिल कर लिया गया था। सख्त कानूनों को तर्कसंगत बताते हुए सड़क दुर्घटना में मृत और घायल लाखों लोगों के राष्ट्रीय आंकड़ों का जिक्र किया गया है, पर उनका स्थानीय विश्लेषण नहीं दिया जा रहा।
खबरों की मानें, तो हाई-वे और एक्सप्रेस-वे पर ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं। महानगरों में रात के समय शराब के नशे में तेज गति से गाड़ी चलाने से ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं। कस्बों में जुगाड़ वाहनों और ओवरलोडिंग की वजह से ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं। दुर्घटनाओं पर सही अर्थों में लगाम लगाने के लिए विशिष्ट नियमन और संवेदनशील क्रियान्वयन के बजाय पूरी जनता को लपेटे में लेने से लोगों का गुस्सा स्वाभाविक है।
सीएएससी नामक थिंक टैंक द्वारा अन्य कानूनों के तहत जुर्माने की व्यवस्था के अध्ययन से पता चला है कि अधिकांश कानूनों के तहत जुर्माने की पुरानी व्यवस्था चल रही है, जिसके तहत 10 रुपये से लेकर हजार रुपये तक का ही जुर्माना लगाया जा रहा है। रजिस्ट्रेशन, बीमा, प्रदूषण, ड्राइविंग लाइसेंस के कागजात नहीं होना और साथ नहीं रखना, दो अलग-अलग मामले हैं। यदि कोई वाहन चालक कागज लाकर दिखा देता है, तो उसके ऊपर कोई भी जुर्माना या अदालत जाने का बंधन क्यों होना चाहिए? सख्त नियमों का मकसद दुर्घटना रोकना है, न कि सरकार और पुलिस विभाग की आमदनी बढ़ाना।
देश की राजधानी दिल्ली की ही बात करें, तो इस साल अगस्त तक लगभग 67 लाख ट्रैफिक चालान किए गए, जिनमें से 40 लाख मामले सीमा से अधिक गति से वाहन चलाने के थे। एक्सप्रेस-वे के विज्ञापन में सरकार छह घंटे में दिल्ली से चित्रकूट पहुंचने का दावा करती है, तो फिर शहरी इलाकों में भी व्यावहारिक नियमन क्यों नहीं होना चाहिए? रात नौ बजे से सुबह नौ बजे तक ज्यादा स्पीड की अनुमति का नियम बन जाए, तो बहेलियों की तरह किए जा रहे पुलिसिया चालान के मामलों में भारी कमी आ सकती है। शहरों से दूर ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में अभी तक प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था नहीं बन पाई है, तो क्या वहां सड़कों पर पूरा यातायात ही बंद हो जाएगा?
दिल्ली जैसे शहरों में बॉडी कैमरे से भ्रष्टाचार पर भले ही रोक लग जाए, लेकिन छोटी जगहों पर पुलिस वालों की स्थिति गीता के अर्जुन की तरह हो जाएगी। जीतने पर मलाई और हारने पर केस दर्ज करने की स्थिति में मुकदमे का लक्ष्य पूरा हो जाएगा।
खस्ताहाल सड़क, अतिक्रमण, गैरकानूनी स्पीडब्रेकर की वजह से भी बहुत सी दुर्घटनाएं होती हैं। सड़कों के इस्तेमाल के लिए सरकार वाहनों से भारी टैक्स लेती है, तो फिर सरकारी विभागों और नगर निगमों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। पुलिस अधिकारियों द्वारा नियम तोड़ने पर दोगुने जुर्माने और नाबालिग के मामलों में माता-पिता की जवाबदेही के कानून से वीआइपी लोग कैसे बच निकलते हैं? नियमों को ठेंगा दिखाकर छुटभैये नेता वाहनों पर अपना बायोडाटा ही लिखवा देते हैं। चुनावों के दौरान आयोजित रोड शो, बाइक रैली, चुनावी रथ, और जुलूसों में इतने नियम टूटते हैं कि यदि उन पर दोगुना जुर्माना लगे, तो सरकार का बजट घाटा ही कम हो जाए!
इन दिनों ऐप आधारित टैक्सियां भी चल रही हैं, जिन्हें टैक्सी परमिट लेनी की छूट है। इन कंपनियों का भारत में कोई दफ्तर नहीं है इसलिए हादसा होने पर इन कंपनियों की कोई संस्थागत जवाबदेही तय नहीं हो पाती। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि संसद द्वारा कानून बनने के साथ नौकरशाही द्वारा नियम भी बना देना चाहिए। आईटी ऐक्ट के अनुसार, सिर्फ केंद्र सरकार ही ऐसे ऐप्स या एग्रीग्रेटर पर कारवाई कर सकती है, इसके बावजूद नए मोटर व्हीकल कानून में केंद्र सरकार ने इस बारे में कोई नियम नहीं बनाए हैं। ऐसी विसंगतियों की ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। जिस तेजी से केंद्र सरकार ने आम जनता के लिए ये नियम बनाए हैं और राज्यों ने उस पर अमल शुरू कर दिया है, उतनी ही फुर्ती से एग्रीग्रेटर कंपनियों के खिलाफ भी कानून का पालन क्यों नहीं होता?
नियमन और कानून व्यवस्था को सुधारने और बेहतर बनाने के लिए होते हैं, लिहाजा इन पर अमल की जिम्मेदारी जिन संस्थाओं पर होती है, उन्हें जवाबदेह और संवेदनशील होना चाहिए। लेकिन ऐसे भी वाकये हुए हैं, जब कानून की सख्ती का निहित स्वार्थों ने फायदा उठाया, जैसा कि दिल्ली में सीलिंग के कहर के दौरान देखा गया था। कुछ जगहों से मोटर व्हीकल ऐक्ट के तहत किए गए भारी जुर्मानों से शायद कुछ लोग डर के कारण वाहन लेकर निकलने में हिचकेंगे। लेकिन ध्यान रहे, ऐसी अनेक रिपोर्ट्स और शोध मौजूद हैं, जिनसे पता चलता है कि हेलमेट न लगाने या फिर ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने के कारण कितने लोगों की जानें चली गईं।
शराब पीकर बड़ी एसयूवी गाड़ियों में चलने वाले रईसजादे सड़क के लोगों पर चलने वाले आम लोगों की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते। सलमान खान मामले से यह भी जाहिर है कि अदालती व्यवस्था से दंडित होने में उन्हें खासा वक्त लगता है। बड़े शहरों में बाइक और कार की रेसिंग का भी फैशन बढ़ गया है। ऐसे लोगों पर लगाम लगाने के लिए कठोर जुर्माने की व्यवस्था को सही माना जा सकता है।दिक्कत यह है कि रईस लोगों को बढ़े हुए जुर्माने की रकम देने में कोई फर्क नहीं पड़ेगा।