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असम-मिजोरम सीमा विवाद: पूर्वोत्तर सीमा आयोग की जरूरत

Fri, 30 Jul 2021 06:17 AM IST
subir bhowmik सुबीर भौमिक
Updated Fri, 30 Jul 2021 06:17 AM IST
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Assam Mizoram border dispute and need of limitation committee
Assam Mizoram clash - फोटो : PTI

छब्बीस जुलाई को असम और मिजोरम के बीच सीमा संबंधी विवाद को लेकर हुई झड़प में आंशिक तौर पर दोनों राज्य सच नहीं बोल रहे हैं। असम का जोर इस बात पर है कि मिजोरम पुलिस ने लाइट मशीन गन का इस्तेमाल किया, जबकि मिजोरम का कहना है कि असम पुलिस ने उनकी सीमा में घुसकर उनकी एक चौकी ध्वस्त कर दी। इस झड़प में असम पुलिस के पांच जवानों और एक नागरिक की मौत हो गई थी और करीब साठ लोग घायल हो गए थे। तथ्य यह है कि असम पुलिस ने वैरेंगते स्थित सीआरपीएफ चौकी को पार कर भड़काने वाली कार्रवाई की, जिसके जवाब में मिजोरम पुलिस ने फायरिंग की। आखिर दोनों राज्यों के बीच टकराव की वजह क्या है? आखिर उनके मुद्दे क्या हैं?


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तथ्य यह है कि पूर्वोत्तर के प्रायः सभी राज्यों का असम के साथ सीमा विवाद चल रहा है, जिससे अलग होकर इनका निर्माण हुआ था। पिछले साल सितंबर में भाजपा की अगुआई वाले नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (एनईडीए) की गुवाहाटी में हुई बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, हम जब बांग्लादेश के साथ सीमा संबंधी विवाद सुलझा सकते हैं, तो फिर पूर्वोत्तर के राज्य अपना अंतरराज्यीय सीमा विवाद क्यों नहीं सुलझा सकते? इत्तफाक से पूर्वोत्तर के सेवन सिस्टर स्टेट्स में सत्तारूढ़ दल एनईडीए का हिस्सा हैं और शाह ने गलती से यह मान लिया था कि समान राजनीतिक पहचान जातीय समूहों की गहरी जातीय-राष्ट्रवादी और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को मिटा देगी, जो इन संघर्षों की जड़ में है।

भारत के स्वतंत्र होने के समय मौजूदा नगालैंड (तुएनसांग प्रभाग को छोड़कर, जो नेफा का हिस्सा था), मेघालय और मिजोरम असम के जिले थे। खासी, गारो और जयंतिया पहाड़ी जिलों को अलग कर मेघालय का अलग राज्य के रूप में निर्माण किया गया था। वहीं लुसाई पहाड़ी जिलों को अलग कर मिजोरम का निर्माण किया गया। अरुणाचल प्रदेश, जिसमें तुएनसांग सहित कई सीमांत प्रभाग शामिल हैं, असम के राज्यपाल द्वारा प्रशासित उत्तर-पूर्व सीमांत एजेंसी (एनईएफए) का हिस्सा था। मणिपुर और त्रिपुरा स्वतंत्र रियासतें थीं और 1949 में ही इनका पार्ट-सी राज्यों के रूप में भारत में विलय हुआ, जो आज के केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र जैसे थे।

1956 में भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के समय पूर्वोत्तर को स्पर्श नहीं किया गया था, जिससे जातीय समुदायों की आकांक्षाएं आहत हुईं। नतीजतन नगाओं सहित कुछ वर्गों ने स्वतंत्र संप्रभु राज्य के निर्माण के लिए विद्रोह कर दिया। जैसे-जैसे अलगाववादी आंदोलन नागा पहाड़ियों से क्षेत्र के अन्य हिस्सों में फैलने लगे, नए राज्यों के गठन के साथ क्षेत्र के क्रमिक प्रशासनिक पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हुई।

नगालैंड को 1963 में राज्य का दर्जा मिला और मेघालय को 1972 में। 1972 में ही मणिपुर और त्रिपुरा का दर्जा भी बढ़ाकर उन्हें पूर्ण राज्य बना दिया गया। मिजोरम को 1972 में असम से अलग कर केंद्र शासित क्षेत्र बनाया गया और फिर 1986 में पूर्ण राज्य। सेवन सिस्टर्स में से अरुणाचल सबसे आखिर में 1987 में राज्य बना। इस पुनर्गठन के पीछे विचार यह था कि नगा, मिजो, खासी, मणिपुरी, गारो और अरुणाचली तथा अन्य जातीय समूहों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा किया जा सके। मगर राज्यों की सीमाओं का परिसीमन जातीय विशेषताओं के अनुरूप नहीं रहा और न ही इसमें स्वतंत्रता पूर्व की जातीय आधार पर अंकित ऐतिहासिक सीमाओं पर विचार किया गया, जिससे कई तरह के अंतरराज्यीय विवादों ने जन्म लिया।
 
मसलन, असम स्वतंत्रता मिलने के बाद तय की गई सीमाओं पर जोर देता है। लेकिन नगालैंड और मेघालय जैसे राज्य ऐतिहासिक सीमा को अपने अधिकार क्षेत्र में मानते हैं। नगालैंड के राज्य बनने के दो साल के बाद ही 1965 में काकोडोंगा आरक्षित वन क्षेत्र को लेकर असम के साथ उसका सीमा संबंधी विवाद पैदा हो गया था। उसके बाद से दोनों राज्य एक दूसरे के क्षेत्र में कब्जे का आरोप लगाते हैं। जून, 1985 में असम के गोलाघाट जिले में दोनों राज्यों की पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें असम पुलिस के 28 जवानों सहित 41 लोगों की मौत हो गई थी। असम और नगालैंड 434 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं। असम का आरोप है कि नगालैंड ने उसकी 66,000 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा कर रखा है। दूसरी ओर नगाओं का दावा है कि ब्रिटिश ने वर्ष 1826 में जब असम पर कब्जा किया था, तब यह हिस्सा नगा हिल से स्थानांतरित कर दिया गया था।

इसी तरह, मेघालय असम के कार्बी आंगलोंग जिले के दो ब्लॉकों में उम्मत सहित 356 गांवों पर अपना दावा करते हुए कहता है कि ये 1835 में बनाई गई तत्कालीन यूनाइटेड खासी और जयंतिया हिल्स का हिस्सा थे। इसी तरह के अनेक दावे और प्रतिदावे हैं, जिन्हें लेकर सीमा पर तनाव होते रहते हैं। पिछले एक साल के दौरान इस क्षेत्र में अंतरराज्यीय सीमा संबंधी तीन बड़े विवाद हुए हैं, जिनमें असम और मिजोरम के बीच हुआ ताजा विवाद शामिल है। इस विवाद की तात्कालिक वजह थी मिजोरम सरकार द्वारा स्थापित एक कोविड सेंटर को लेकर असम की आपत्ति।

असम का दावा है कि इसे जहां स्थापित किया गया, वह उसके क्षेत्र में है। इस महीने की शुरुआत में इसे लेकर स्थानीय लोग आपस में भिड़ गए थे और कुछ झोपड़ियों और दुकानों में आग लगा दी गई थी। हालांकि, कुछ मिजो संगठनों ने सीमा संघर्ष को कमतर आंकने की कोशिश करते हुए कहा कि यह अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ लड़ाई थी, क्योंकि असम के भीतर के क्षेत्रों में बांग्ला भाषी लोगों का वर्चस्व है। वास्तव में इस विवाद की जड़ में सीमा संबंधी विवाद है, जिसमें मिजोरम और असम दोनों ही लैलापुर पर दावा करते हैं।

नगालैंड, मिजोरम और मेघालय के अलावा, असम का अरुणाचल प्रदेश के साथ भी एक लंबा सीमा संघर्ष है, जिससे पड़ोसी राज्यों के बीच संबंध गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। नई दिल्ली अब तक अस्थायी शांति कायम करने में सफल हुई है, जैसा कि असम और मिजोरम के ताजा विवाद में देखा जा सकता है। केंद्र सरकार को पूर्वोत्तर सीमा आयोग का गठन करना चाहिए, ताकि पूर्वोत्तर की सारी अंतरराज्यीय समस्या को स्थायी तौर पर सुलझाया जा सके, वर्ना चीन इसका इस्तेमाल न केवल उथल-पुथल पैदा करने के लिए, बल्कि भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करने के लिए करता रहेगा।


 

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