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जिनपिंग की पटकथा में एशिया

Wed, 17 Sep 2014 07:57 PM IST
मनोज जोशी
मनोज जोशी Updated Wed, 17 Sep 2014 07:57 PM IST
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Asia in xi Jinping's script

इस तरह की ढेरों खबरें हैं कि चीन के सर्वोच्च शासक शी जिनपिंग भारत को सौ अरब डॉलर के निवेश का प्रस्ताव देकर जापान को पीछे छोड़ने की योजना बना रहे हैं, क्योंकि जापान के निवेश का प्रस्ताव इसके आधे से भी कम है। शी की कुछ अन्य योजनाओं के बारे में भी खबरें हैं, मसलन, वह न्यू सिल्क रोड के रूप में की जा रही अपनी पहल में भारत को शामिल करना चाहते हैं और भारत के शंघाई सहयोग संगठन का पूर्ण सदस्य बनने के आवेदन का समर्थन कर सकते हैं। लेकिन चीन के साथ सीमा विवाद और पाकिस्तान को भारत के खिलाफ सहयोग देने जैसी हमारी राजनीतिक समस्याओं के अलावा शी जिनपिंग की पृष्ठभूमि ऐसी है, जिस पर भारत को चीन की उदारता से लाभ लेने की इच्छा के बावजूद सावधानीपूर्वक विचार करने की जरूरत है। वह एक ऐसे नेता हैं, जिन्होंने चीन की सेना को दुनिया का बेजोड़ सैन्य संगठन बना दिया है। हो सकता है कि उनकी नजर जापान और अमेरिका पर हो, लेकिन क्षमता तो क्षमता है। उन क्षमताओं का हम पर भी प्रभाव पड़ता है।

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एकदम शुरू में, जब वह पार्टी प्रमुख नियुक्त हुए थे और नवंबर, 2012 में केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) के चेयरमैन बने थे, तो उन्होंने संकेत दिया था कि पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) उनकी नीतियों को आगे बढ़ाने की प्रमुख वाहक बनेगी। उसके बाद वह अपने प्रसिद्ध नारे द चाइना ड्रीम के साथ आए। शी के 'चीनी स्वप्न' की अवधारणा चीनी राष्ट्र के 'कायाकल्प' पर आधारित है, लेकिन उनकी नीतियों और बयानों से स्पष्ट है कि सैन्य शक्ति उनकी इस पुनरुद्धार योजना का महत्वपूर्ण घटक है।
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जैसे ही शी देश की कमान संभालने के लिए तैयार हुए, उन्होंने पीएलए को अपने करीब रखने के लिए एक विशेष अभियान चलाया। सत्ता संभालने के सौ दिनों के भीतर ही शी ने सेना, वायु सेना, अंतरिक्ष कार्यक्रम एवं मिसाइल कमांड केंद्रों का दौरा किया और सीएमसी के चेयरमैन के रूप में चार सामान्य विभागों और सात सैन्य क्षेत्रों में वरिष्ठ कर्मचारियों का बड़े पैमाने पर तबादला किया। उनका पहला महत्वपूर्ण दौरा दक्षिण चीन सागर में ग्वांगझू सैन्य क्षेत्र का था, जहां उन्होंने घोषणा की कि वह पीएलए को बेहतर प्रशिक्षण, उपकरण और पुनर्गठन के जरिये एक आधुनिक लड़ाकू बनाना चाहते हैं।
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यह एक नए नेता की बयानबाजी भर नहीं थी। पिछले वर्ष पार्टी की एक महत्वपूर्ण मीटिंग हुई, जिसमें मुख्य रूप से यह फैसला लिया गया कि शी के नेतृत्व में चीन का संचालन कैसे होगा। उसी बैठक में चीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के गठन की घोषणा की। शी की अध्यक्षता में चलने वाली इस संस्था की स्थापना राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित सभी गतिविधियों में तालमेल बिठाने और चीन की घरेलू एवं विदेशी सुरक्षा चिंताओं को जोड़ने के लिए की गई। बैठक में मुख्यतः तीन क्षेत्रों में सुधार की बात की गई- पीएलए के नेतृत्व तंत्र में सुधार, बलों के आकार एवं संरचना को अनुकूल बनाना और वरिष्ठ सैन्य कर्मियों के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार करना।

शी के पद संभालने से पहले ही चीन की सेना के आधुनिकीकरण का काम शुरू हो गया था। लेकिन उनके संक्षिप्त कार्यकाल में ही अब तक हुए नए हार्डवेयर के त्वरित विकास और विस्तारवादी लक्ष्यों के लिए आक्रामक तेवर के साथ उन उपकरणों की तैनाती से दुनिया हैरान है। उदाहरण के लिए, नौसेना को ही लें। चीन एक साथ सात प्रकार की पनडुब्बियों और जमीनी युद्धपोतों का निर्माण और विकास कर रहा है। एक दशक बाद उसकी आधुनिक पनडुब्बियों की संख्या चार गुना हो जाएगी, जिसमें परमाणु हथियारों से लैस बैलिस्टिक मिसाइलों को ले जाने के लिए बनाई गई परमाणु पनडुब्बियां भी हैं। उसने बड़े पैमाने पर लड़ाकू जलपोत, पोत, जल-थल पर चलने वाले जहाज और विध्वंसक पोतों का उत्पादन बढ़ाया है। सितंबर, 2013 में चीन ने अपना पहला विमानवाहक जलावतरित किया था, लेकिन अब खबरें हैं कि 2030 तक वह इस बेड़े में छह विमानवाहक शामिल करने का इरादा रखता है। इसी तरह, विमानन के क्षेत्र में उसने अमेरिकी रक्षा मिसाइलों की पकड़ से बचने के लिए हाइपरसोनिक बूस्ट ग्लाइडक्राफ्ट का दो परीक्षण करके पश्चिमी खुफिया समुदाय को चकित कर दिया है और ऐसी खबरें भी हैं कि वह हाइपरसोनिक मिसाइल भी विकसित कर रहा है।

कहा जा सकता है कि चीन की ये रक्षा तैयारियां भारत को ध्यान में रखकर नहीं की गई हैं, पर नौसैनिक एवं हाइपरसोनिक मिसाइलों का हम पर सीधा प्रभाव हो सकता है। चीन खुद को अमेरिका के खिलाफ तैयार कर रहा है, पर सैन्य मामलों में क्षमताओं और इरादों के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। क्षमता यह है कि वह क्या कर सकता है और इरादा यह है कि वह क्या करना चाहता है। क्षमता को निर्धारित करना आसान है, पर इरादे भांपना बहुत कठिन।
चाहे चीन हो या अमेरिका, सच तो यह है कि आम तौर पर सभी सैन्य सुधार राजनीतिक व्यवस्था से जन्म लेते हैं। दुर्भाग्य से यहीं पर भारत की कमजोरी निहित है। आधुनिकीकरण की योजना पर काफी खर्च करने के बावजूद भारत की सेना एक साथ काम करने में सक्षम नहीं है, क्योंकि राजनेताओं ने सुधार की अपरिहार्य जरूरत पर ध्यान देने से इन्कार कर दिया है।


मार्च, 2013 में राष्ट्रपति बनने के बाद अपने पहले विदेशी दौर पर रूस गए शी जिनपिंग ने घोषणा की थी कि उनका व्यक्तित्व पुतिन की तरह है। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनका आशय क्या था- यानी जब घरेलू और विदेशी मामलों से निपटने की बारी आएगी, तो वह एक मजबूत नेता के रूप में काम करेंगे। तब से पुतिन ने यूरोप की भू-राजनीतिक पटकथा का पुनर्लेखन कर दुनिया को हैरान कर दिया है। शी जिनपिंग भी एशिया में ऐसा कर सकते हैं।

(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली के प्रतिष्ठित फेलो हैं)

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