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अब चीन के आर्थिक विकास पर ग्रहण

Fri, 19 Oct 2012 06:25 PM IST
रहीस सिंह
रहीस सिंह Updated Fri, 19 Oct 2012 06:25 PM IST
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artilcle of rahees singh on China
चीनी लोक गणराज्य ने इस महीने अपना 63वां राष्ट्रीय दिवस मनाया। इस अवसर पर चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने तीन बातों पर जोर दिया। चीन ने तेज विकास दर बरकरार रखी, लोगों की जिंदगी सुधरी, और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के प्रभाव में भी मजबूती आई है। इसमें संदेह नहीं कि आर्थिक मामले में दुनिया का सिरमौर बनकर चीन ने एक मिसाल पेश की, जिसे देखते हुए दुनिया के अर्थशास्त्रियों और वैश्विक संस्थाओं ने उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था का भावी नेता कहना शुरू कर दिया। लेकिन इसके अलावा भी कई सच हैं, जिन्हें चीन बाहर नहीं आने देता।
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मसलन, चीन जिस विकास दर पर इतरा रहा था, वह उसी के मुताबिक वर्ष 2012 के लिए 7.5 प्रतिशत रह गई। अर्थव्यवस्था की विकास दर का यह अनुमान पिछले आठ साल में सबसे कम है। विगत अगस्त में उत्पादन मूल्य सूचकांक में गिरावट दर्ज की गई और कॉरपोरेट लाभ अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। अब अगर वहां की सरकार अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कदम उठाती है, तो महंगाई का खतरा और बढ़ जाएगा, जिसका दबाव चीन पहले से ही झेल रहा है। इसी तरह रियल स्टेट की कीमतों में राष्ट्रव्यापी गिरावट के चलते वहां भी बुलबुला फूटने की स्थिति बन गई है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था की साख को बट्टा लग सकता है।
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वस्तुतः दुनिया की सर्वाधिक आबादी को समेटने के बावजूद चीन प्रतिभा की कमी से जूझ रहा है। प्राइस वाटरहाउस कूपर की रिपोर्ट बताती है कि चीन के 60 फीसदी प्रमुख कार्याधिकारियों को अपनी कंपनियों में प्रशिक्षित लोगों को भरती करने में दिक्कत आ रही है, क्योंकि योग्य- प्रशिक्षित लोग उपलब्ध नहीं हैं। यानी चीन ‘श्रेष्ठ मानव पूंजी’ के मामले में समृद्ध नहीं है। ऐसे में वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में उसका आगे निकल पाना कैसे संभव है?
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दरअसल हुआ यह कि पिछले दो दशकों में चीन में टैलेंट स्ट्रेटजी के नाम पर केवल एनरोलमेंट बढ़ाने और मानव संसाधनों के विकास पर ज्यादा जोर दिया गया, ताकि सस्ते श्रम के जरिये वह अपने उत्पादों द्वारा दुनिया के बाजारों को पाट सके। अब उसके सामने चुनौती उसके ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग से आगे बढ़कर ‘ग्लोबल इनोवेशन हब’ के रूप में उभरने की है। उसे अब बूढ़ा होने का डर भी सताने लगा है। ‘एक बच्चे की नीति’ के चलते अब वहां बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। चेतावनी दी जा रही है कि 2050 तक चीन ऐसा देश होगा, जो धनी होने से पहले बूढ़ा हो जाएगा।

इसके अलावा चीन को उन प्रतिरोधों का भी सामने करना होगा, जिनका लाभ उठाकर कभी माओ त्से तुंग कम्युनिस्ट क्रांति पूरी करने में सफल रहे थे। डेंग श्यांग पिंग ने माओ की 'सांस्कृतिक क्रांति’ को त्याग कर खुलेपन की नीति पर जोर देना शुरू कर दिया। इसके बाद क्रमशः खुलेपन की कड़ियां जुड़ती गईं और पूंजीवाद का रास्ता साफ होता गया। 1995 में सरकार ने नियोजन पर आधारित परंपरावादी अर्थव्यवस्था को समाजवादी बाजार अर्थव्यवस्था में रूपांतरित करने का निर्णय लिया।

जुलाई 1997 में जब ब्रिटिश उपनिवेश हांगकांग चीन को मिला, तो चीन ने इस वैश्विक वित्तीय केंद्र को स्वायत्तता देकर और एक राष्ट्र-दो व्यवस्था की नीति अपनाकर उच्च पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को बनाए रखा। परिणाम यह हुआ कि मार्च, 1999 में निजी क्षेत्र आधारित अर्थव्यवस्था को समाजवादी बाजार अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा मान लिया गया। इसके बाद चीनी अर्थव्यवस्था ने औसतन 10 प्रतिशत की रफ्तार से वृद्धि दर्ज कराई और पीपीपी के आधार पर उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्था बन गई।


लेकिन इस प्रगति ने बहुत से असंतुलनों को जन्म दिया, जो चीन की साम्यवादी निरंकुशता के कारण अभी तक अपनी ताकत प्रदर्शित नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन भविष्य में भी ये उभार दबे रहेंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता। चीन ने आर्थिक पावरहाउस बनने के दौरान अपने रूपांतरण को ‘सोशलिज्म विद चाइनीज कैरेक्टिक्स’ के जरिये उचित ठहराने की कोशिश की। लेकिन सच यह है कि यह बहुसंख्यक हितों को संरक्षण देने में नाकामयाब रहा। इसने युवाओं को केवल इतना सिखाया कि प्रसिद्धि पाने के लिए धनी बनो।
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