भारत की कहानी में बिहार कहां है?
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आज बिहार उम्मीदों और निराशा के दोराहे पर खड़ा है। पिछले कई दशकों से अगर बिहार दुर्दशा झेल रहा है, तो इसकी वजह सिर्फ मंडल, कमंडल और जंगल राज नहीं है। इसकी असल वजह 'राजनीति' है, जिसमें 'राज' कुछ ज्यादा, तो 'नीति' जरूरत से काफी कम रही है। भारत में शासन को लेकर एक बेहद प्रचलित उक्ति है कि यहां वह सब कुछ जो गलत हो सकता है, वह लगातार गलत ही होता जाता है। बिहार में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। चार दशकों तक इसके पीछे कांग्रेस थी। 1990 में जनता दल ने एक ऐसे चुनाव में कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखाया, जिसमें उसके 103 प्रत्याशियों की तो जमानत ही जब्त हो गई। इसके बाद 25 वर्षों से बिहार कांग्रेस मुक्त रहा है। और इन पचीस वर्षों के दौरान बिहार में शासन की बागडोर पहले लालू परिवार और फिर नीतीश कुमार के हाथों में रही है। इसमें नीतीश पहले भाजपा के साथ और फिर भाजपा के बगैर सत्ता में रहे। साफ है कि बिहार की दुर्दशा में हर पार्टी का हाथ रहा है।
बिहार की अर्थव्यवस्था के ढांचे को देखते हुए निस्संदेह यह समझा जा सकता है कि यहां संसाधनों का गंभीर अभाव है और इसे मुश्किलों से निकालने के लिए लगातार सहायता देने की जरूरत है। जाहिर है कि सारा मामला पैसों का है, मगर इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि यह पैसा खर्च किस तरह किया जा रहा है। यानी आखिरकार पूरा मुद्दा आकर टिकता है 'शासन' पर। अफसोस की बात है कि जिनके हाथ में सत्ता आती है, वे पूरी व्यवस्था पर कब्जा कर लेते हैं। बिहार की प्रमुख समस्या यह है कि यहां बेहद व्यवस्थित ढंग से कानून को व्यवस्था से अलग कर दिया गया है। व्यवस्था को हितों के अनुकूल बनाया गया है। वहीं, कानून का शासन यहां इस पर निर्भर है कि शासन कौन कर रहा है। सत्ताधारियों को अपने चुनावी हितों की फिक्र रहती है और इसी आधार पर संसाधनों का भी आवंटन होता है। जन सशक्तिकरण के कार्यक्रम अपने वोट बैंक के विकास तक सीमित रह गए हैं।
इससे इन्कार नहीं कि बिहार को अपने इतिहास के बोझ से भी जूझना पड़ रहा है। राज्य के विभाजन के बाद संसाधन समृद्ध क्षेत्रों के झारखंड के हिस्से चले जाने से भी औद्योगिक राज्य बनने की संभावनाओं से इसे हाथ धोना पड़ा। सरकारी उपकरणों के ऐतिहासिक राजनीतिकरण के चलते राज्य में वंचन और निर्धनता की समस्या विकराल बनती गई। भारत में सामाजिक-आर्थिक बाधाओं पर अपने एक अध्ययन में सबसे बुरी हालत वाले 100 जिलों की सूची पर नजर दौड़ाने पर मैंने पाया कि बिहार के 38 जिलों में से 26 इस सूची में शामिल थे। 94,163 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र में फैले इस राज्य में 2015 तक के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्या तकरीबन 11 करोड़ चालीस लाख है। 36,143 रुपये के साथ इसकी प्रति व्यक्ति आय सभी राज्यों में सबसे कम है। जरा इस मोटे अनुमान पर गौर कर के देखिये, भारत की तकरीबन 10 फीसदी आबादी राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम प्रति व्यक्ति आय पर जिंदगी बिताने पर मजबूर है।
इन आंकड़ों को थोड़ा और गहराई से परखते हैं। पटना में प्रति व्यक्ति आय 63,063 रुपये है, जबकि मधेपुरा (8069 रुपये), सुपौल (8492 रुपये) और श्योहर (7092 रुपये)जैसे अति पिछड़े जिलों में प्रति व्यक्ति आय पटना के दसवें हिस्से से भी कम है। ऐसे में जाहिर है कि बिहार का हर तीसरा व्यक्ति गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रहा है। प्रतिष्ठित नालंदा यूनिवर्सिटी के साथ कभी शिक्षा का केंद्र रहे बिहार की साक्षरता दर आज 61.80 फीसदी है, जो 2001 में भारत के राष्ट्रीय औसत से कम है और मॉरिटोनिया जैसे देश से भी नीचे है। लिंग विभाजन ने शिक्षा को लेकर राज्य में और बुरी स्थिति पैदा कर दी है। 71.2 फीसदी पुरुष और 51.5 फीसदी महिला साक्षरता के साथ आलम यह है कि बिहार में हर दस में से तीन पुरुष और हर दूसरी महिला निरक्षर है। यही नहीं, संसद की स्थायी समिति की 2015 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में स्कूल छोड़ने वाला हर पांचवां बच्चा बिहार का है। इसके अलावा शिशु मृत्यु दर, कुपोषण और मातृ मृत्यु दर के मामले बिहार की स्थिति उप सहारा अफ्रीकी देशों जैसी है।
नगरीकरण के मामले में भी बिहार की हालत खराब है। यहां की महज 11.29 फीसदी आबादी तथाकथित शहरों में रहती है, जबकि 88.71 फीसदी लोग गांवों में ही गुजर-बसर कर रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक जनगणना के हालिया आंकड़े बताते हैं कि 65 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास अपनी जमीन नहीं है। बगैर जमीन वाला यहां का हर दूसरा शख्स छुट-पुट मजदूरी करने पर मजबूर है। हर दस में से छह लोग कच्चे मकानों में रहते हैं। महज छह फीसदी परिवार ही ऐसे हैं, जहां कोई नौकरी कर रहा हो। 71 फीसदी परिवारों की कुल मासिक आय पांच हजार रुपये से कम है। हर सौ लोगों में से दो ही ऐसे हैं, जो टैक्स देते हैं। बिहार हर मायने में वंचन के नए रिकॉर्ड कायम कर रहा है।
बिहार का सारा राजनीतिक संवाद शख्सियतों और चुनाव में जीतने या हारने वालों पर फोकस हो गया है। सवाल यह है कि क्या मोदी यहां अपना जादू बरकरार रख पाएंगे? सवाल नीतीश कुमार के खुद को बचा पाने का भी है। सवाल लालू की विरासत पर भी हैं। ये सवाल निस्संदेह बिहार चुनाव को बड़ा बना रहे हैं। मगर इसकी और वजहे भी हैं। बिहार को देखकर यह पता चलता है कि जनांकिकीय लाभांश का 'फीलगुड' कैसे बेहद आसानी से जनांकिकीय आपदा में बदल सकता है। राज्य का अति पिछड़ापन उनके लिए दुस्वप्न सरीखा हो सकता है, जो भारत के भविष्य को दुबारा लिखना चाह रहे हैं। ऐसे में बिहार में चल रही बहस को लच्छेदार बातों से आगे बढ़ना होगा। यहां सिर्फ सत्ता नहीं, व्यवस्था परिवर्तन जरूरी है। इसके लिए राज्य के राजनीतिक तौर पर कमजोर हो चले संस्थानों को मजबूत बनाना होगा। यह एक सच्चाई है कि भारत की कहानी बिहार की कहानी के बगैर
पूरी नहीं हो सकती।