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खतरे में है टापू-देशों का भविष्य

Tue, 23 Oct 2012 07:12 PM IST
मुकुल व्यास
मुकुल व्यास Updated Tue, 23 Oct 2012 07:12 PM IST
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article of mukul vyas on environment

उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों में बर्फ के पिघलने की रफ्तार अनुमान से ज्यादा है, जिसकी वजह से एक दशक के अंदर टापू-देशों को खाली कराने की नौबत आ सकती है। नवीनतम सुबूतों से पता चलता है कि ध्रुवीय बर्फ के पिघलने का अंदाजा लगाने वाले मॉडलों ने ग्रीनलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिका में बर्फ की चादरों के पिघलने की रफ्तार को बहुत कम करके आंका है।

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पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रमुख जलवायु वैज्ञानिक माइकल मान ने चेतावनी दी है कि बर्फ की चादरें बहुत तेजी से सिकुड़ रही हैं। पहले यह अनुमान लगाया गया था कि समुद्रों के बढ़ते हुए जल स्तर से निपटने के लिए टापू-देशों के सामने अभी कई दशक हैं, लेकिन अब लगता है कि इन देशों से लोगों को हटाना ही एकमात्र विकल्प होगा।
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मान की इस चेतावनी से कुछ सप्ताह पहले ही कैलिफोर्निया में बोल्डर स्थित नेशनल स्नो ऐंड आइस डेटा सेंटर ने यह चौंकाने वाली जानकारी दी थी कि इस वर्ष आर्कटिक की समुद्री बर्फ में 18 प्रतिशत की कमी आई है, जो कि एक रिकॉर्ड है। इससे पहले वर्ष 2007 में भी बर्फीली चादरों में भारी कमी आई थी। आर्कटिक की बर्फ यदि तेजी से पिघलती रही, तो इस दशक के अंत तक वहां गर्मी का मौसम बर्फ रहित होने लगेगा।
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ग्रीनलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिका की बर्फ का समुद्री जल स्तर से सीधा संबंध है। यदि यह बर्फ तेजी से पिघलेगी, तो समुद्री जल स्तर में भी वृद्धि होगी। पूर्वानुमान के मॉडल अभी तक यही कह रहे थे कि जलस्तर वृद्धि में कई दशक लग सकते हैं, पर जो आंकड़े मिल रहे हैं, उनसे साफ है कि बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। प्रशांत महासागर में अनेक टापू समुद्र के स्तर से सिर्फ 4.6 मीटर ऊंचे हैं।

इन टापुओं के जलमग्न होने का खतरा बहुत ज्यादा है। वहां समुद्र के अतिक्रमण के बाद खारा पानी स्वच्छ जल स्रोतों को नष्ट कर देगा और बड़े पैमाने पर भूस्खलन होंगे। इन टापू-देशों की हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति खतरे में है, क्योंकि इन लोगों के पास कहीं और जाने की जगह नहीं है।

जलवायु परिवर्तन का असर पूरी दुनिया में अभी से दिखाई देने लगा है। इससे सबसे ज्यादा विकासशील देश प्रभावित हो रहे हैं। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक, इन देशों में कुपोषण, गरीबी और बीमारियों से होने वाली मौतों का संबंध चरम मौसमीय घटनाओं से है। मौसमी परिवर्तनों से इन देशों में कृषि उत्पादन को भारी नुकसान हो रहा है।

दुनिया में हर साल करीब चार लाख मौतें जलवायु-परिवर्तनों से जुड़े कारणों से हो रही हैं। इसके अलावा खनिज ईंधनों के इस्तेमाल से होने वाला वायु प्रदूषण हर साल 45 लाख लोगों की मौत का कारण बन रहा है। करीब 50 वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों और नीति निर्धारकों द्वारा तैयार की गई यह अध्ययन रिपोर्ट यूरोप स्थित एक एनजीओ, दारा ग्रुप और क्लाइमेट वल्नरेबल फोरम ने जारी की है।

जलवायु परिवर्तन से चिंतित बंग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का कहना है कि तापमान में एक डिग्री सेल्सियस वृद्धि से कृषि की उत्पादकता में 10 प्रतिशत की क्षति होती है। बांग्लादेश को इससे करीब 40 लाख टन अनाज का नुकसान होगा, जिसकी कीमत करीब 2.5 अरब डॉलर बैठती है। यह देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब दो प्रतिशत है। यदि इसमें संपत्ति को होने वाली क्षति और दूसरे नुकसानों को जोड़ा जाए, तो बंग्लादेश को तीन-चार प्रतिशत जीडीपी का नुकसान होता है।


अमेरिका और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देश भी जलवायु परिवर्तनों के प्रभावों से अछूते नहीं रहेंगे। दुनिया के प्रायः हर कोने में चरम मौसमीय घटनाएं हो रही हैं। कहीं ज्यादा बारिश हो रही है, तो कहीं ज्यादा सूखा पड़ रहा है। भारत में विलंबित मानसून से किसानों को भारी नुकसान हुआ है, जबकि अमेरिका में इस साल भयंकर सूखा पड़ने से खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई है। अधिकांश सरकारें जलवायु परिवर्तन को दीर्घकालिक समस्या मानती है, लेकिन जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि यह खतरा भविष्य का नहीं, वर्तमान का है। इसके आर्थिक प्रभाव हमें अभी से दिखाई दे रहे हैं।

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