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चेहरा बदलने की मजबूरी

Tue, 23 Oct 2012 07:30 PM IST
मनीषा प्रियम सहाय
मनीषा प्रियम सहाय Updated Tue, 23 Oct 2012 07:30 PM IST
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article of Manisha priyam sahay on politics

अरविंद केजरीवाल और उनके संगठन इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने जो खुलासे किए हैं, वे राजनीतिक विमर्श की नई जमीन तैयार कर रहे हैं। सबसे पहले उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ कंपनी के बीच हुए जमीन सौदे का मुद्दा उठाया, फिर कानून मंत्री सलमान खुर्शीद पर विकलांगों के साथ धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया और उसके बाद नितिन गडकरी पर खुलासा करते हुए कहा है कि किसानों की लाश पर भाजपा अध्यक्ष ने अपना 'बिजनेस एंपायर' खड़ा किया है।

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कानूनविदों की नजर में ये खुलासे भले ही कम महत्व के हों और अदालतों में साबित भी न हो पाएं, पर इन खुलासों ने सार्वजनिक जीवन जीने वाले इन नेताओं की छवि निश्चय ही खराब की है। इसके साथ ही अरविंद की रणनीति से हम सहमत हों या न हों, उन्होंने साझेदारी की चुप्पी तोड़ने की पहल भी की है। वह सियासी दलों के बीच की आपसी समझ को बेनकाब कर रहे हैं। जो आरोप आज रॉबर्ट वाड्रा के बहाने कांग्रेस पर लग रहे हैं, ऐसे ही कुछ आरोप पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में उनके दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य को लेकर भाजपा पर भी लगते रहे थे।  
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असल में, अरविंद ने ऐसे मुद्दे उठाए हैं, जो अपने-आप में व्यापक महत्व के हैं। जमीन का 'लैंड यूज' बदलकर उसका निजी हितों में किस तरह इस्तेमाल हो रहा है, यह इन खुलासों से जाना जा सकता है। दिक्कत यही है कि जमीन के ऐसे करार न तो किसानों को फायदा पहुंचाते हैं और न ही कंपनियों का हित साधते हैं। किसान इसलिए ठगा महसूस करता है, क्योंकि उसकी कृषि भूमि औने-पौने दाम पर ले ली जाती है, जबकि कंपनियां इसलिए खाली हाथ रह जाती हैं, क्योंकि वे इसका इस्तेमाल नहीं कर पातीं। कुल मिलाकर, मिलीभगत के साथ और लचीले कानूनों का फायदा उठाकर लोगों को ठगने का प्रयास किया जाता है।
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अब अगर देश की औद्योगिक नीति इसी आधार पर आगे बढ़ी, तो विकास की असल अवधारणा खंडित हो सकती है। ऐसे में आम लोगों का रोष में पत्थर उठाना या क्रांति का बिगुल बजाना स्वाभाविक ही है। हमें समझना होगा कि अगर सकल घरेलू उत्पाद में वास्तविक लोक-भागीदारी नहीं होगी, तो आम लोगों का प्रतिरोध बढ़ेगा ही। इन सबके इतर इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने वर्तमान राजनीतिक आचरण को भी प्रभावित किया है। अब कमोबेश सभी राजनीतिक पार्टियां आंदोलनात्मक कार्रवाई की ओर उन्मुख होती दिख रही हैं। कोलगेट प्रकरण को ही सामने लाने में भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी नहीं, बल्कि हंसराज गंगाराम अहीर जैसे सांसद सफल हुए।

इसी तरह गुजरात में भी कांग्रेस की स्थानीय इकाई राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुलासा करने में लगी हुई है। देखा जाए, तो अरविंद की राजनीति ने सभी राजनीतिक दलों को अपनी नीति बदलने के लिए बाध्य किया है। अब हमारे पारंपरिक दल यह समझ रहे हैं कि चुनावों में आम जनता के सामने महज एक व्यापक दृष्टिकोण रखने या खाऊ-पकाऊ राजनीति करने से सत्ता नहीं मिलने वाली, उन्हें अपना आचरण बदलना होगा। लिहाजा वे भी राजनीतिक कार्यकर्ता या खोजी कार्यकर्ता की तरह अपने स्वरूप का पुनर्सृजन कर रहे हैं।

भले ही हमारा राजनीतिक इतिहास लोहिया या कांशीराम का उदाहरण देकर यह कहता हो कि देश में विरोध की राजनीति को सफल होने में वक्त लगता है और अरविंद को भी लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा, पर अरविंद ऐसा दबाव समूह जरूर बन गए हैं, जो राजनीतिक दलों को आईना दिखा रहा है। अब लड़ाई अरविंद बनाम देश के सभी प्रमुख और छोटे दलों के बीच सिमटती दिख रही है, जिसमें अरविंद राजनीतिक दलों के आचरण में परिवर्तन के स्रोत साबित हो रहे हैं।  

हालांकि ऐसा नहीं है कि अरविंद या उनकी वर्तमान राजनीतिक लहर का हर पक्ष धवल ही है। नितिन गडकरी के ही खुलासे को अरविंद स्थापित करते नहीं दिखे। ऐसे में मात्र आरोप लगा देने से परिदृश्य बदल जाएगा, ऐसा नहीं है। बेशक आज अपने कृत्यों की वजह से राजनेताओं की नकारात्मक छवि आम लोगों के मन में है, पर यह जानते हुए भी कि उनका जनप्रतिनिधि पाक-साफ नहीं है, लोगों को उन्हीं भ्रष्ट नेताओं में से किसी को चुनना पड़ता है। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ हालिया आंदोलनों से आम लोगों में समझदारी बढ़ेगी, उनका रोष भी बढ़ेगा, पर राजनीतिक विकल्प उभरने की संभावना कम ही है।

आगामी हिमाचल प्रदेश के चुनाव में ही वीरभद्र सिंह या प्रेम कुमार धूमल में से किसी एक को चुनने का विकल्प लोगों के पास होगा, जबकि दोनों पर गंभीर आरोप हैं। यानी चुनावी लड़ाई सांपनाथ बनाम नागनाथ की ही रहेगी। बहरहाल, मुद्दे पर आंदोलन करना, सक्रियता दिखाना और राजनीतिक सफलता प्राप्त करना, तीनों अलग बातें हैं। देश में जयप्रकाश आंदोलन जैसा संघर्ष विरल ही हुआ है।


उस नवनिर्माण आंदोलन में गुजरात में चिमन भाई पटेल को सत्ता गंवानी पड़ी थी, क्योंकि उनके राज्य में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, लूट-खसोट आदि का साम्राज्य था, पर उस मजबूत आंदोलन की परिणति भी सांपनाथ बनाम नागनाथ की तरह ही रही। इसलिए अगर इंडिया अगेंस्ट करप्शन यह स्थापित करने में सफल होती है कि राजनीति स्वच्छ तरीके से की जा सकती है, तो अरविंद का आंदोलन सफल माना जाएगा, नहीं तो हालिया खुलासे आंदोलनात्मक कार्रवाई तक ही सिमट कर रह जाएंगे।

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