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दीदी के रास्ते नहीं जाएंगी बहनजी

अवधेश कुमार Updated Mon, 15 Oct 2012 09:09 PM IST
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article of avdhesh kumar

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बीते दिनों जब बसपा प्रमुख मायावती ने गर्जना की कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में संप्रग सरकार को समर्थन जारी रखने और न रखने पर फैसला होगा, तब लगा था कि ममता बनर्जी के बाद सरकार को दूसरा झटका मिलने वाला है। तृणमूल के सरकार से अलग होने के बाद बसपा के 21 सांसद सरकार के अस्तित्व के लिए कितना मायने रखते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। मायावती ने इसके साथ लोकसभा चुनाव समय पूर्व होने की बात कहकर चुनावी तैयारी का भी आह्वान कर दिया था। इसके बाद तो पूरे देश की नजर अगले दिन होने वाली बसपा कार्यकारिणी की ओर लगनी ही थी। लेकिन कार्यकारिणी के बाद मायावती का तेवर वैसा नहीं था। उनकी इस अबूझ प्रतीत होती राजनीतिक भंगिमा का अर्थ और संदेश क्या है?
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यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मायावती के पास कांशीराम का वह सूत्र है कि जितनी जल्दी-जल्दी चुनाव होंगे, उसे उतना ही राजनीतिक फायदा मिलेगा। बार-बार चुनाव हो, यह उनकी नीति में शामिल रहा है। कार्यकारिणी के बाद मायावती केंद्र सरकार पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने तथा गलत नीतियां अपनाने का आरोप लगा रही हैं। वह यह भी कह रही हैं कि सरकार ने जनता के लिए परेशानियां पैदा की हैं। उनके नेतृत्व में कार्यकारिणी ने देश भर में केंद्र एवं अखिलेश सरकार के विरुद्ध रैली, सभा आदि करने का भी निश्चय किया है। यह जल्दी चुनाव कराने की पूर्व नीति के अनुकूल नहीं है। आखिर बसपा ने अपनी रणनीति क्यों बदली? दरअसल लखनऊ रैली के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने बसपा सुप्रीमो मायावती की आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई एवं केंद्र सरकार को जो नोटिस जारी किया, उसी के दबाव में उनके तेवर नरम हो गए। आखिर एक समय उनके खिलाफ मामला खत्म हुआ मान लिया गया था। यह उनके और उनके रणनीतिकारों के लिए बड़ा झटका है।


किंतु ऐसा भी नहीं है कि अगर शीर्ष अदालत का नोटिस जारी नहीं होता, तो मायावती ने केंद्र सरकार को झटका दे दिया होता। अगर समाजवादी पार्टी का साथ सरकार को बना रहे, तो केवल बसपा की समर्थन वापसी से केंद्र सरकार गिरने वाली नहीं। इसलिए मायावती वैसा अवसर चाहेंगी, जिसमें सपा भी समर्थन वापस लेने को विवश हो जाए, या ऐसा न करने पर उसे कठघरे में खड़ा करने का मौका मिले। बसपा की मुख्य आधारभूमि उत्तर प्रदेश है और यहां की राजनीतिक जमीन इस समय सपा के ज्यादा अनुकूल है। सरकार से हालांकि लोग निराश हो रहे हैं, अपराध में भी वृद्धि हुई है, लेकिन ऐसा माहौल नहीं बना है, जिसमें विधानसभा चुनाव में प्राप्त उसका मत बहुत ज्यादा खिसक जाए। मायावती को इसका आभास है। इसलिए वह जान-बूझकर इतना बड़ा जोखिम नहीं उठा सकती थीं। सच तो यह है कि विधानसभा में पराजय के धक्के से अभी बसपा पूरी तरह उबर नहीं पाई है। उसके शासनकाल में मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के मामले खुल रहे हैं। कार्यकर्ता, नेता और समर्थक, तीनों अभी पराजय की निराशा के दौर में ही हैं। संकल्प रैली के साथ मायावती ने इन सबको फिर से खड़ा करने की शुरुआत की है। आगे रैलियों के जरिये केंद्र एवं प्रदेश सरकार पर एक साथ हमला होगा, जिससे उनके अंदर संघर्ष के तेवर पैदा हों।

वैसे भी मायावती की नीतियां अन्य दलों से भिन्न हैं। जहां तक रिटेल में एफडीआई का मामला है, बसपा की वैचारिक पृष्ठभूमि इसके समर्थन की है। आखिर मायावती ने ही अपने कार्यकाल में ठेके पर खेती की पहल की थी, जिसे विरोध के कारण स्थगित कर दिया गया। अपनी पार्टी रैली के बाद उन्होंने कहा भी कि अगर उन्हें लगेगा कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश किसानों के हित में नहीं, तो वह इसका विरोध कर सकती हैं। भ्रष्टाचार और महंगाई जैसा मुद्दा उनके लिए मुफीद है, किंतु फिलहाल वह कोई जोखिम नहीं उठा सकतीं। दरअसल बसपा के लिए नैतिकता-अनैतिकता का मुद्दा उतना महत्व नहीं रखता। परिस्थितियां अगर बदलती दिखीं, तभी वह केंद्र से समर्थन वापस ले सकती है। इस नाते संप्रग सरकार के लिए खतरा निश्चय ही थोड़ा बढ़ गया है।

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