इतने दलों के बीच विकल्प की तलाश

अरुण नेहरू Updated Fri, 19 Oct 2012 09:12 PM IST
article of arun nehru on 2014 lok sabha election
एक बार फिर मैं दोहरा रहा हूं कि इन दिनों राजनीतिक हलके में काफी कुछ हो रहा है, क्योंकि बढ़ती अनिश्चितता और नकारात्मकता को रोजमर्रा के स्तर पर पेश किया जा रहा है। इनमें से ज्यादातर इसलिए हो रहा है, क्योंकि राजनीतिक दल एक-दूसरे को फंसाना चाहते हैं और इसमें परिवार के लोगों को भी शामिल करना चाहते हैं।

ज्यादातर लोग समझते हैं कि दूसरे को फंसाकर वे अपनी राजनीतिक स्थिति सुनिश्चित कर सकते हैं। बेशक ज्यादा समर्थन नहीं है, लेकिन अब अरविंद केजरीवाल की भी अपनी पार्टी है। हम देख ही सकते हैं कि 'करो या मरो' जैसे संदेश सोशल नेटवर्किंग साइटों पर डाले जा रहे हैं।

हालांकि वह कई सूत्रों से जानकारियां हासिल कर रहे हैं, लेकिन देखिए कि कैसे हर चीज को टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज की तरह पेश किया जा रहा है। अदालतों में जाने से परहेज किया जा रहा है, क्योंकि आरोपों की पुष्टि के लिए सुबूत नहीं हैं, लेकिन टीवी चैनल सब कुछ परोसने के लिए तैयार हैं।

ऐसे प्रतिस्पर्द्धी माहौल में टीवी चैनल तब तक ऐसा करते रहेंगे, जब तक वे स्वयं किसी स्टिंग का शिकार नहीं हो जाते। जाहिर है, राजनीतिक माहौल में अस्थिरता है। हिमाचल प्रदेश एवं गुजरात में अभी शांतिपूर्वक चुनाव प्रचार हो रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी शांत हैं और व्यक्तिगत हमलों से परहेज कर रहे हैं, क्योंकि सोनिया गांधी पर व्यक्तिगत हमले करने का नतीजा अच्छा नहीं रहा।

मेरे आकलन के मुताबिक, अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 150 (2009 की 206 सीटों से कम),भाजपा भी 150 (2009 की 116 से ज्यादा) और अन्य दलों, जिनमें तीसरे और चौथे मोरचे शामिल हैं, की 240 से 250 सीटें (2009 की 220 सीटों से ज्यादा) जीतने की संभावना है।    

सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एकजुट है, गुजरात चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा भी एकजुट हो सकती है, पर 40 विभिन्न क्षेत्रीय दलों को कौन एकजुट करेगा? ये 40 क्षेत्रीय पार्टियां लोकसभा चुनाव के आने तक 60 भी हो सकती हैं। सभी राज्यों में पार्टियां क्षेत्र एवं जाति समूहों में बंट रही हैं।

बेशक हम उन्हें नकार सकते हैं, पर तभी हमें यह सुनने को मिलता है कि जंगीपुर लोकसभा के उपचुनाव में छोटे अल्पसंख्यक समूहों ने 66,000 मत हासिल किए। अब यह खबर आ रही है कि ओडिशा में तीन राजनीतिक दल बनने वाले हैं। करीब दर्जन भर छोटे समूह मिलकर 'ओडिशा जन सम्मुख्य' नामक पार्टी बनाने वाले हैं और फिर 'बीजू स्वाभिमान दल' एवं 'भुवनेश्वर ऑटो रिक्शा फेडरेशन' भी है।

अभी लोकसभा चुनाव में एक वर्ष से ज्यादा का समय बाकी है, इस दौरान राज्य में काफी कुछ बदल सकता है। कमोबेश सभी राज्यों में ऐसा होगा। सवाल है कि संगठित होने के बजाय राजनीतिक दल बिखर क्यों रहे हैं। अब जरा आंध्र प्रदेश (42 सीट), महाराष्ट्र (48 सीट) और तमिलनाडु (39 सीट) को देखिए और वहां दलों की गिनती कीजिए। राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय, दोनों तरह के राजनीतिक दलों में बगावत है, ऐसे में सोचिए कि किस तरह वोट बटेंगे?

टीवी चैनल टेब्लॉइड अखबारों के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं। कई ऐसे मामले हैं, जिनमें सच एवं झूठ में अंतर करना मुश्किल है। कोई नहीं कह सकता कि यह व्यक्तिगत खुन्नस, गंदी चालों के जरिये किया गया राजनीतिक हमला है या टीवी चैनल का टीआरपी बढ़ाने का सामान्य नुसखा।

हमने देखा ही कि किस तरह कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी पर उन दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाए गए, जिनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। उन्होंने उस टीवी चैनल को चुनौती देकर सही किया है। अरविंद केजरीवाल ने खुद को उस स्टिंग से अलग कर लिया और अपना आंदोलन स्थगित कर दिया। साफ है कि उन्हें उस रिपोर्ट की प्रामाणिकता पर विश्वास नहीं था।

मैं सलमान खुर्शीद और उनके परिवार को पिछले तीन दशक से जानता हूं। लगभग इतने ही समय से मैं अरुण पुरी और उनकी पत्नी रेखा को भी जानता हूं। मुझे नहीं लगता कि दोनों में से कोई गलत कर सकते हैं। दोनों परिवारों ने समाज में सकारात्मक योगदान किया है। यह एक मूर्खतापूर्ण मुकदमेबाजी होगी, जिसे कुछ दिनों के बाद लोग भूल जाएंगे। ऐसे में समाधान के लिए जरूरी है कि दोनों पक्ष यह महसूस करें कि दीर्घकालीन लिहाज से कोई भी विजेता नहीं होगा।

अब हरियाणा के ही प्रकरण को ले लीजिए, जहां डीएलएफ और रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए एक आईएएस अधिकारी की ईमानदारी की प्रशंसा की जा रही है। टीवी चैनल कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक हो गए हैं और उस आईएएस अधिकारी की सराहना कर रहे हैं, पर क्या किसी ने उसके करियर के बारे में जानकारी हासिल की है? उसके 20 वर्षों के कार्यकाल में 43 बार उसका तबादला किया गया, क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि विभिन्न सरकारों के शासनकाल में ऐसा क्यों हुआ?

किसी को भी महात्मा घोषित करने से पहले हमें उसके बारे में सावधानीपूर्वक पड़ताल करनी चाहिए। हमने देखा ही कि साल भर में ही अन्ना हजारे हीरो से जीरो हो गए। अगर हम कानून के राज और अदालतों की उपेक्षा करके न्याय के लिए टीवी चैनलों पर आश्रित हो जाएंगे, तो निश्चय ही हम 'बनाना रिपब्लिक' से भी गई-गुजरी स्थिति में होंगे।

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