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मुद्दा: पानी में आर्सेनिक बढ़ना चिंताजनक... वर्षों से चल रहे प्रयास विफल, जहरीले तत्वों के कारण कैंसर का खतरा

Mon, 04 Nov 2024 04:46 AM IST
Suresh Bhai सुरेश भाई
Updated Mon, 04 Nov 2024 04:46 AM IST
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सार
देश में कुछ स्थानों पर पानी में आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित मानकों से 300 गुना अधिक हो गई है, जिससे कैंसर का खतरा बढ़ गया है।
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arsenic level in water alarming Efforts going on for years failed risk of cancer due to toxic elements
पीने के पानी में कई जहरीले तत्व (प्रतीकात्मक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पहले गंगाजल लंबे समय तक घर में रखने के बाद भी प्रदूषित नहीं होता था, लेकिन आज स्थिति यह है कि गंगा के पानी में आर्सेनिक की मात्रा काफी बढ़ चुकी है। यही वजह है कि हैंडपंप, पाइपलाइन आदि से पानी पीने वाले गंगा के किनारे बसे हुए गांवों के लाखों लोगों में त्वचा रोग, किडनी, लीवर, दिल की बीमारियां, न्यूरो संबंधी विकार, तनाव और कैंसर के मामले बढ़ते हुए दिख रहे हैं। गंगा के मैदानी इलाकों में पटना सहित बिहार के 20 जिले इस समय आर्सेनिक युक्त पानी पीने के दुष्प्रभाव से कैंसर का सामना कर रहे हैं, जिसमें गॉल ब्लैडर कैंसर मौत का कारण बन रहा है। यह पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में 10 प्रतिशत से अधिक तेजी से बढ़ रहा है।



कैंसर विशेषज्ञों ने पित्ताशय कैंसर से पीड़ित 152 रोगियों की जांच में पाया कि उनके पित्ताशय की थैली में औसत स्तर से अधिक आर्सेनिक की मात्रा पाई गई। यह स्थिति बिहार के बक्सर, सारन, समस्तीपुर, वैशाली, किशनगंज, भागलपुर, कटिहार, मुंगेर, पटना आदि स्थानों के गॉल ब्लैडर कैंसर रोगियों की है। यह शोध 14 मार्च, 2023 को नेचर जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है, जिससे पता चलता है कि आर्सेनिक प्रभावित आबादी की लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करके पित्ताशय थैली तक पहुंचता है। लंबे समय तक इलाज के अभाव में यह कैंसर का रूप ले लेता है, जिससे हर साल होने वाली मृत्यु दर में 33 प्रतिशत का इजाफा हो जाता है।


1980 के दशक में सबसे पहले पश्चिम बंगाल के भू-जल में भारी मात्रा में आर्सेनिक पाए जाने की बात सामने आई थी। तब मानवाधिकार आयोग ने सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित भी किया था, जिसकी अनदेखी की गई। इनर वाइस फाउंडेशन (आईवीएफ) के अनुसार, 2020 तक 10 लाख से अधिक लोगों की मौत आर्सेनिक वाला पानी पीने से हुई। आर्सेनिक औद्योगिक प्रदूषण, खनन से पैदा होता है। अकेले भारत में इससे पांच करोड़ लोगों के प्रभावित होने का अनुमान है। भारत के अलावा बांग्लादेश, नेपाल, तिब्बत के कुछ भागों में भी लोग आर्सेनिक के जहर से प्रभावित हैं। देश में कुछ स्थानों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानकों से 300 गुना अधिक आर्सेनिक पानी में बढ़ गया है। बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के अनेक जिले ऐसे हैं, जहां आर्सेनिक पानी पीने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और यहां लोगों को बचाने के प्रयास भी नहीं हो रहे हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्सेनिक तंत्रिका तंत्र और प्रजनन तंत्र को प्रभावित करता है। इससे सबसे ज्यादा बच्चे प्रभावित होते हैं। जब उनका सिस्टम आर्सेनिक जहर को बाहर निकालने की कोशिश करता है, तो उनके आंतरिक अंग बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान बच्चों के वजन में कमी, नवजात की मृत्यु छह गुना अधिक बढ़ने की आशंका है।

मनुष्य ने अपने चारों ओर इतना अधिक प्रदूषण पैदा कर दिया है कि अंधाधुंध औद्योगिक अपशिष्टों के माध्यम से भू-जल में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ रही है। ऐसे दूषित जल का प्रयोग भोजन बनाने में भी हो रहा है, जिससे खाद्य पदार्थों में आर्सेनिक विषाक्तता बढ़ती जा रही है। अधिकांश फसलों की सिंचाई भी दूषित पानी से हो रही है। फसलों पर छिड़के जाने वाले कीटनाशक भोजन के माध्यम से मनुष्यों के शरीर तक पहुंच रहे हैं। इसके अलावा, मुर्गी, चावल, फलों के रस और कुछ मछलियों में भी आर्सेनिक की मात्रा काफी होती है, जिसका खाने में उपयोग होने से मानव जीवन खतरे में पड़ गया है।

प्राकृतिक रूप से आर्सेनिक मिट्टी और चट्टानों में पाया जाता है, जो भू-जल में प्रवेश करता है। खनिजों व अयस्कों के विघटन के जरिये भी पानी में विषाक्त तत्व प्रवेश करते हैं। लेकिन विषाक्त तत्वों की मात्रा तभी बढ़ती है, जब धरती के पेट में जहरीले रसायन प्रवेश करते हैं। वैज्ञानिकों ने भोजन और भू-जल के माध्यम से आर्सेनिक विषाक्तता के बीच संबंध पाया है, जिसका संबंध कीटनाशकों के उपयोग से भी है। कह सकते हैं कि जीवन-शैली में प्रदूषणकारी तत्वों का जिस तरह से इस्तेमाल हो रहा है, उसने पानी में आर्सेनिक की मात्रा को बहुत अधिक बढ़ा दिया है।

पानी में बढ़ती आर्सेनिक की मात्रा इस बात का संकेत है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों की निर्मलता और स्वच्छता के लिए वर्षों से किए जा रहे प्रयास पानी में जहरीले तत्वों को रोकने में विफल रहे हैं। अरबों लीटर गंदा पानी गंगा में हर रोज उड़ेला जा रहा है। जब तक इसे रोकने का कोई ठोस उपाय नहीं होता है, तब तक निर्धारित मानकों से अधिक आर्सेनिक पानी में घुलता रहेगा, जिससे कैंसर जैसी घातक बीमारियों से बचना मुश्किल होगा।

-लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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