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गिरफ्तारी से कत्ल तक

Thu, 21 Aug 2014 07:51 PM IST
रवि सोमैया एवं क्रिस्टीन हॉगने
रवि सोमैया एवं क्रिस्टीन हॉगने Updated Thu, 21 Aug 2014 07:51 PM IST
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arrest to murder

इराक में इस्लामी चरमपंथी लड़ाकों ने स्वतंत्र पत्रकार जेम्स फॉली को अपने आंदोलन की प्रचार सामग्री पढ़ने के लिए मजबूर किया, फिर उनका सिर काट डाला। उन्होंने चेतावनी दी है कि दूसरे अमेरिकी पत्रकार के साथ भी यही सुलूक किया जाएगा। जुलाई के आखिर में द वाशिंगटन पोस्ट के एक पत्रकार जैसन रेजैन को ईरान में एक व्यक्ति ने गिरफ्तारी वारंट दिखाकर अगवा कर लिया था। तब से उनका कोई पता नहीं है।

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द न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार मैथ्यू रोजेनबर्ग को अफगानिस्तान छोड़ने का आदेश इसलिए दिया गया, क्योंकि सरकारी अधिकारियों को उनकी रिपोर्टिंग पसंद नहीं थी। अमेरिका में मिसौरी के फर्ग्यूसन शहर में विरोध प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकारों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए और कारण बताए बिना पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। न्यायिक विभाग में अभियोजन पक्ष ने पत्रकारों के खिलाफ जानकारियां लीक करने का मुकदमा न सिर्फ दायर किया, बल्कि उनकी गोपनीय बातचीत को भी रिकॉर्ड कर लिया, जिससे पत्रकार और उनके सूचना-स्रोतों के बीच संबंध खराब हो गए।
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चालीस वर्षीय फॉली ने पश्चिम एशिया के सबसे खतरनाक युद्धक्षेत्र से ग्लोबल पोस्ट, एजेंसी फ्रांस-प्रेसे और दूसरे अखबारों के लिए रिपोर्टिंग की थी। इससे पहले लीबिया में भी उनका अपहरण किया गया था। लीबिया में रहते हुए एक वीडियो में उन्होंने अपनी तरफ आते कुछ सैनिकों के बारे में बताया था। उसमें उन्होंने कहा था, मैं भगोड़ा नहीं होना चाहता। 22 नवंबर, 2012 को सीरिया से कुछ अन्य अमेरिकियों के साथ उन्हें अगवा किया गया था। फॉली के हत्यारे चरमपंथी लड़ाकों ने वीडियो में दूसरे अमेरिकी स्वतंत्र पत्रकार स्टीवन साटलॉफ की हत्या करने की भी धमकी दी है, जिनकी रिपोर्टें टाइम मैगजीन समेत दूसरी पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं।
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पत्रकारों, संपादकों और प्रेस की स्वतंत्रता पर नजर रखने रखने वाले लोगों ने घरेलू और विदेशी भूमि पर पत्रकारों के लिए कठिन होते वातावरण के बारे में साक्षात्कारों के जरिये यह बताया है कि पत्रकारों के कामकाज के तरीके में बदलाव के चलते स्थितियां किस तरह जटिल हुई हैं और उनके कामकाज के प्रति सरकारों एवं आम लोगों के नजरिये में क्या परिवर्तन आया है।

द वाशिंगटन पोस्ट के कार्यकारी संपादक मार्टिन बेरॉन कहते हैं, पत्रकारिता हालांकि हमेशा से चुनौतीपूर्ण एवं एक हद तक खतरनाक पेशा रही है, लेकिन आज के दौर का सच यह है कि सत्ता से जुड़े लोग नहीं चाहते कि पत्रकार उनके गलत कामकाज के बारे में जानें। अगर रिपोर्टिंग का अपना काम करते हुए पत्रकारों को कारावास या मौत का सामना करना पड़े, तो ऐसा काम करना मुश्किल है।

हाल के वर्षों में युद्ध के बदलते स्वरूप, अनिश्चित युद्धक्षेत्र, बदलते गठजोड़ और राष्ट्रों का कानून और उनकी सीमाएं न मानने वाले अलगाववादियों का सच सामने लाने के लिए फॉली जैसे अनेक पत्रकार आए हैं, जो पारंपरिक समाचार संगठनों से जुड़े हुए नहीं हैं। ग्लोबल पोस्ट, जिसने फॉली की कई खबरें छापी हैं, के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी फिलिप एस बलबोनी के मुताबिक, 2010 के लीबिया युद्ध के साथ युद्ध की रिपोर्टिंग लगातार खतरनाक होती चली गई। लीबिया युद्ध की तरह उसके बाद सीरिया और इराक की लड़ाइयों में भी न तो कोई तय मोर्चा था और न ही स्थापित खिलाड़ी। गेटी इमेज के अनुभवी युद्ध फोटोग्राफर क्रिस होन्ड्रोस और वैनिटी फेयर के टिम हेथरिंगटन वहां मारे गए लोगों में थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने फॉली के हत्यारों की निंदा करने के साथ इंसाफ का भी वायदा किया है। उनकी टिप्पणी थी कि यह पृथ्वी फॉली जैसे लोगों के कारण ही आकार ले पाई है। पत्रकारों का संरक्षण करने वाली कमेटी के मुताबिक, इस साल फॉली समेत 32 पत्रकार मारे गए हैं, जबकि 2013 में 70 और 2012 में 72 पत्रकार मारे गए थे। कमेटी के उप निदेशक रॉबर्ट मैहोने के मुताबिक, पिछले साल करीब 65 पत्रकार लापता हो गए थे, जो विगत दो वर्षों के संयुक्त आंकड़े के दोगुने से भी अधिक हैं। अनेक पत्रकार जेल में भी हैं। मसलन, मिस्र में 13 पत्रकार जेल में हैं। सीरिया में विदेशी पत्रकारों का शुरू में स्वागत किया गया, पर शीघ्र ही स्थिति बदल गई और उन्हें निशाना बनाया जाने लगा। कमेटी के मुताबिक, 2011 में अरब क्रांति शुरू होने के बाद से वहां रिपोर्टिंग करते हुए लगभग 69 अन्य पत्रकार मारे गए, 80 से ज्यादा पत्रकारों का अपहरण किया गया और 20 अब भी बंधक हैं।

साफ है कि पत्रकारों के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार किया जाता है, खासकर आईएसआईएल द्वारा। पश्चिम एशिया में इस्लाम के राजनीतिकरण का जो पत्रकार विरोध करते हैं, उनकी बहुत कम सुरक्षा है। मार्टिन बेरॉन के अनुसार, चूंकि द वाशिंगटन पोस्ट केवल स्वतंत्र पत्रकारों से ठेके पर काम करवाता है, इसलिए वह उन्हें वही उपकरण, सुरक्षा और संचार साधन उपलब्ध करा सकता है, जो वह अपने स्टाफ रिपोर्टरों को मुहैया कराता है।


द वाशिंगटन पोस्ट के पूर्व प्रबंध निदेशक और कोलंबिया जर्नलिज्म स्कूल के डीन स्टीव कॉल कहते हैं कि आतंकी और अलगाववादी समूहों को अब अपने बारे में रिपोर्टें प्रकाशित कराने के लिए पत्रकारों की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे अपने पाठकों तक ऑनलाइन पहुंच सकते हैं। उन तालिबान के पास भी अब अपने वीडियो प्रोडक्शन स्टूडियो हैं, जिन्होंने कैमरे के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया था। फर्ग्यूसन में वरिष्ठ पत्रकारों तक के साथ जिस तरह का सुलूक हुआ, उससे यह चिंता है कि अमेरिका में भी मीडिया की स्वतंत्रता और उसकी गरिमा खतरे में है।

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