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बदनाम होने में क्या बुराई है
अंशुमाली रस्तोगी
Updated Mon, 15 Jul 2013 09:07 PM IST
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मेरे मोहल्ले वाले मुझे पसंद नहीं करते। न मुझे अपने घर बुलाते हैं, न मेरे घर आते हैं। कई दफा नौबत मेरा हुक्का-पानी बंद करने की भी आ चुकी है, पर किसी न किसी बहाने बात टल जाती है।
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मोहल्ले वालों की नजर में मैं एक ‘बदनाम लेखक’ हूं। बदनाम लोगों के साथ रहता, बदनामी की जिंदगी जीता, बदनाम साहित्य पढ़ता और बदनामी भरा लेखन करता हूं। अजीब-सी बात है। मुझसे जुड़ी बदनामियां मेरी हैं, इससे मोहल्ले वालों को क्यों एतराज होना चाहिए? बदनाम होना इत्ता बुरा भी नहीं कि बंदे से हट-बचकर चला जाए। बदनामी आज का ‘स्टेटस सिंबल’ है। बदनामी में वह ताकत है, जिसके आगे दुनिया झुकती है। बदनाम की पहचान सहज-सरल-सुलभ होती है। लेखक होकर बदनाम होना सचमुच किला जीतने के बराबर होता है। लेकिन मोहल्ले वाले बदनामी के मायने समझते ही नहीं। न जाने किस दुनिया में रहते हैं!
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बदनामी में नाम बहुत होता है। जगह-जगह लोग चर्चा करते हैं। अब देखिए न, पिछले कित्ते दिनों से रुपया बिंदास बदनाम हो रहा है। टमाटर महंगा होने पर बदनाम हो रहा है। सेंसेक्स गिरने पर बदनाम हो रहा है। पेट्रोल कीमत बढ़ने पर बदनाम हो रहा है। एक उम्रदराज मंत्रीजी अपनी यौनिकता पर बदनाम हुए हैं। सरकार एवं मंत्री घपले-घोटालों के सहारे बदनाम हो रहे हैं। मोदी खुद को ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ बताकर बदनाम हो रहे हैं। सपा-भाजपा-बसपा-कांग्रेस जैसे दल किसी न किसी बहाने बदनाम हो ही रहे हैं। लेकिन बदनामी के साथ नाम भी तो खूब हो रहा है, जिसे वे अपने हिसाब से जनता के बीच भुना रहे हैं। बढ़ता हुआ कद भला किसे बुरा लगता है, चाहे बदनामी से क्यों न हो।
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ऐसे में यदि मैं भी थोड़ा-बहुत बदनाम हो लेता हूं, तो क्या गलत करता हूं। कम से कम लोग मेरा नाम तो जान-पहचान जाते हैं। मत भूलिए, मंटो अपने समय का सबसे बदनाम लेखक था। जो लोग बदनामी से डरते हैं, उनका कुछ नहीं हो सकता। वे सिर्फ दूसरे की बदनामी देखकर जल-भून सकते हैं। बदनामी में छिपी महानता को वे क्या जानें!
बहरहाल, मेरे बारे में मोहल्ले वाले जो भी राय कायम करें, मुझे उसकी चिंता नहीं। मुझे तो और बदनाम होना है। मैं चाहता हूं कि गिनीज बुक में मेरा नाम ‘सबसे बदनाम लेखक’ के तौर पर दर्ज हो। दुआ कीजिए, मेरी बदनामियों का ग्राफ बढ़ता रहे और मेरा नाम प्रसिद्धि के शिखर पर जा पहुंचे।