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नई केंद्र सरकार में रहेगा आंध्र प्रदेश का दबदबा

Wed, 10 Apr 2019 12:01 PM IST
Raman Singh आर. राजगोपालन
आर. राजगोपालन Published by: Raman Singh Updated Wed, 10 Apr 2019 12:01 PM IST
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Andhra will dominate in center
आंध्रप्रदेश और तेलंगाना का नक्शा - फोटो : Income Tax India Website

इन दिनों पूरे देश में लोकसभा चुनाव की तैयारियां और प्रचार अभियान की गहमागहमी तेज है। सात चरणों में होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के लिए आज प्रचार अभियान का शोर थम जाएगा। उत्तर भारत में आम तौर पर कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इस बार केंद्र में नई सरकार के गठन में दक्षिण के राज्यों की भी अहम भूमिका रहेगी। और उसमें भी आंध्र प्रदेश की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।


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इन दिनों पूरे देश में लोकसभा चुनाव की तैयारियां और प्रचार अभियान की गहमागहमी तेज है। सात चरणों में होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के लिए आज प्रचार अभियान का शोर थम जाएगा। उत्तर भारत में आम तौर पर कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इस बार केंद्र में नई सरकार के गठन में दक्षिण के राज्यों की भी अहम भूमिका रहेगी। और उसमें भी आंध्र प्रदेश की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

आंध्र प्रदेश की राजनीति आजकल बहुत गर्म है और दिलचस्प भी। यहां 11 अप्रैल को 25 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों और 195 विधानसभा क्षेत्रों के लिए मतदान होगा। यहां के दो प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी जगन मोहन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू की रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही है। पर जगन मोहन रेड्डी के साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाता उनके साथ हैं।

जगन रेड्डी आंध्र प्रदेश के लिए विशेष राज्य के दर्जे का आश्वासन चाहते हैं। अगर नरेंद्र मोदी ने इसके प्रति सहमति जताई, तो वाईएसआर कांग्रेस राजग को समर्थन करेगी। जबकि तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) के चंद्रबाबू नायडू से चोट खाए एनडीए के लिए वह कतई स्वीकार्य नहीं हो सकते। तेलुगू देशम पार्टी को सत्ता-विरोधी रुझान का सामना करना पड़ रहा है। इसके नेता चंद्रबाबू नायडू को राज्य में सत्ता विरोधी लहर से निपटने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। जबकि जगन मोहन रेड्डी की वहां लहर चल रही है।

हालांकि आंध्र प्रदेश में राजनीति के अन्य खिलाड़ी भी हाथ आजमा रहे हैं। पहली बार यहां मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने पवन कल्याण की जन सेना पार्टी (जसपा) के साथ गठबंधन किया है। जसपा जगन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू, दोनों के वोट काटेगी। इसलिए मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है। दुर्भाग्य से आंध्र प्रदेश में राष्ट्रीय पार्टियों की मौजूदगी उतनी मजबूत नहीं है। भाजपा और कांग्रेस, दोनों यहां बहुत कमजोर हैं।

बेशक इस बार अब तक राज्य में कोई बड़ी हिंसक घटना नहीं हुई है, लेकिन चुनाव आयोग वोट के लिए पैसों के लेन-देन पर अंकुश नहीं लगा पाया है। आंध्र प्रदेश में एक वोट की कीमत पांच हजार रुपये है। बैंकों में दो हजार रुपये के नोटों की कमी पड़ गई है, क्योंकि मतदान के दिन बांटने के लिए राजनीतिक पार्टियां इन्हें जमा कर लेती हैं। राज्य में लोकसभा सीट का हर प्रत्याशी मोटे तौर पर चुनाव के दौरान पैंतीस से पचास करोड़ रुपये खर्च करता है, जबकि विधानसभा सीट का प्रत्येक प्रत्याशी पंद्रह से बीस करोड़ रुपये खर्च करता है।

उदाहरण के लिए, अगर तीन प्रमुख पार्टियां गुंटुर संसदीय सीट के लिए चुनाव लड़ रही हैं, तो उस निर्वाचन क्षेत्र का कुल खर्च 150 करोड़ रुपये होगा। आंध्र प्रदेश की बात करते हुए हमें याद रखना चाहिए कि यहां की राजनीति में तीन प्रमुख जातियों का वर्चस्व है-रेड्डी, खन्ना और कापू। राज्य में अल्पसंख्यक और सिने अभिनेताओं का भी प्रभाव है। दिवंगत एनटी रामाराव अब भी मतदाताओं पर हावी हैं। उन्हें राज्य में भगवान माना जाता है।

आंध्र में पहली बार कोई गठबंधन नहीं है। तेलुगू देशम पार्टी पहले वाम दल और भाजपा के साथ गठबंधन करती थी, लेकिन इस बार उसने गठबंधन नहीं किया है। जगन मोहन की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस का राज्य में व्यापक जनाधार है, इसलिए वह तेलुगू देशम पार्टी से सत्ता छीनना चाहती है। क्या एनडीए से रिश्ता तोड़कर तेदेपा ने भारी गलती कर दी? इसका जवाब हां भी हो सकता है और नहीं भी। लेकिन तेदेपा को महत्वपूर्ण समय पर गठबंधन सहयोगी को धोखा देने के लिए जाना जाता है। राज्य में कांग्रेस का कैडर नहीं है। राज्य विभाजन से आंध्र जहां दो हिस्सों में बंट गया, वहीं कांग्रेस पार्टी ने अपना वोट, नेता और संगठन भी खो दिया।

राजनीतिक भाषणों का भारी पतन हुआ है, जिसमें एक-दूसरे को अपशब्द कहा जा रहा है और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं। आंध्र प्रदेश में कुकुरमुत्तों की तरह उग आए टीवी न्यूज चैनल भी कहर ढा रहे हैं। सोशल मीडिया का प्रसार चरम पर है। राज्य में नौकरशाही भी तेदेपा और वाईएसआर कांग्रेस की तरह बंटी हुई है।

मतदान से ठीक एक हफ्ते पहले चुनाव आयोग ने मुख्य सचिव और शीर्ष खुफिया अधिकारियों का तबादला कर दिया, क्योंकि वे तेदेपा के पसंदीदा थे। जो भी आंध्र प्रदेश की राजनीति को देखेगा, वह समझ जाएगा कि यहां एकतरफा लहर चल रही है और यह राष्ट्रीय दृष्टिकोण को बदलने के लिए बाध्य है। आंध्र प्रदेश के इस संदेश की अनदेखी नहीं की जा सकती।

तेलंगाना की बात करें, तो यहां हाल ही में विधानसभा के चुनाव हुए हैं। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने यहां भारी बहुमत से जीत हासिल की है। आल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुसलमिन ने टीआरएस के साथ गठजोड़ किया है। टीआरएस का जन्म ही तेदेपा विरोध से हुआ है। केसीआर ने चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ नकारात्मक बयानबाजी की है। केसीआर को तेलंगाना का महात्मा समझा जाता है। उन्हीं के संघर्ष से तेलंगाना को राज्य का दर्जा मिला। राज्य का मूड केसीआर के पक्ष में है। टीआरएस 17 लोकसभा सीटों में 14 सीट जीतने की अपेक्षा रखती है। पार्टी ऐसा प्रचार कर रही है।

तेलंगाना में भी कांग्रेस कमजोर है। वहां उसका कोई संगठन नहीं है। टीआरएस ने कांग्रेस के नेताओं को तोड़ा है। हालांकि भाजपा भी राज्य में कमजोर है, पर उसके पास संगठन है। क्या ऐसा प्रत्येक संसदीय क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की एकजुटता के कारण है? प्रशासनिक क्षेत्र में टीआरएस ने अच्छा काम किया है। पिछले पांच वर्षों में राज्य में कोई प्रमुख सांप्रदायिक तनाव नहीं हुआ है।

अगर केंद्र में भाजपा बहुमत के करीब पहुंचती है, तो केसीआर की पार्टी टीआरएस नरेंद्र मोदी को समर्थन दे सकती है। हालांकि आगे क्या होगा, यह देखने वाली बात होगी। लेकिन मोदी और केसीआर के बीच अच्छा रिश्ता है। टीआरएस के 14 सांसद किसी भी गठबंधन के लिए बहुत बड़ा आंकड़ा हैं।
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