{"_id":"5b951fe1867a557f220f8b51","slug":"and-how-much-will-fall-rupee","type":"story","status":"publish","title_hn":"और कितना गिरेगा रुपया","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया","slug":"opinion"}}
और कितना गिरेगा रुपया
मधुरेन्द्र सिन्हा
Updated Sun, 09 Sep 2018 06:58 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
रुपया
भारतीय मुद्रा रुपया इस समय भारी दबाव में है और डॉलर के मुकाबले लगातार गिरती जा रही है। एक डॉलर की कीमत 72 रुपये हो गई थी, अब भी यह 71 रुपये से ज्यादा है। इस साल अब तक रुपया नौ प्रतिशत तक गिर चुका है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
रुपये की इस अभूतपूर्व गिरावट ने विपक्ष को केंद्र की भाजपा सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है। इस गिरावट का असर अब दिखने भी लगा है। आयातित सामान की कीमतें बढ़ गई हैं और वे सामान महंगे हो गए हैं, जिन्हें विभिन्न कंपनियां अपने उत्पादों के लिए इस्तेमाल करती हैं। इससे उनका बजट गड़बड़ाने लगा है। डॉलर के लगातार महंगा होते जाने से हमारा आयात बिल भी अधिक होने लगा है। कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में वैसे ही ज्यादा हैं, रुपये में गिरावट से वह और भी महंगा हो गया है।
भारत उन देशों में है, जो बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करते हैं और उसके लिए डॉलर से भुगतान करते हैं। पिछले एक वर्ष से कच्चे तेल की कीमत में भारी बढ़ोतरी हुई और हमारा आयात बिल काफी बढ़ गया। कच्चे तेल की कीमतें जहां 30 डॉलर प्रति बैरल से भी कम थीं, वह बढ़कर 80 डॉलर तक जा पहुंचीं। इससे हमारा व्यापार घाटा और बढ़ गया। सिर्फ जुलाई महीने में ही हमारा घाटा 18.02 अरब डॉलर का था, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इसका मुख्य कारण कच्चे तेल की कीमत में भारी बढ़ोतरी रहा। गौरतलब है कि भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरतों का दो तिहाई विदेशों, खासकर सऊदी अरब और ईरान से मंगाता है। इस कारण से हमारे आयात का बड़ा हिस्सा यानी 57.41 प्रतिशत सिर्फ कच्चे तेल का है। हमने 12.35 अरब डॉलर यानी 84,828 करोड़ रुपये कच्चे तेल के आयात पर खर्च किए। यह बहुत बड़ी राशि है और यह चिंता का विषय भी है। इस समय कच्चा तेल तीन महीने के अधिकतम स्तर पर है और तुरंत इसके दाम घटने के आसार नहीं हैं, क्योंकि ईरान पर अमेरिका ने सख्त प्रतिबंध लगाया है और वहां से तेल मंगाने में भारत को आगे दिक्कतें आएंगी। इस असंतुलन ने न केवल व्यापार घाटा बढ़ा दिया है, बल्कि रुपये की ताकत भी घटा दी और वह लुढ़क गया।
लेकिन कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय घटनाएं भी रुपये में आई गिरावट के पीछे रहीं। अमेरिका ने तुर्की और ईरान पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाकर उनकी अर्थव्यवस्थाओं को चोट पहुंचाई है। इससे दोनों की मुद्राएं चारों खाने चित्त हो गईं। तुर्की का लीरा तो 50 प्रतिशत नीचे चला गया। इसके अलावा अर्जेंटीना का पेसो भी लुढ़क गया और कई अन्य देशों की मुद्राएं भी दबाव में आ गईं। चीनी मुद्रा युआन पर भी दबाव पड़ रहा है और वह भी गिर रही है। उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर डॉलर का दबाव साफ दिख रहा है। दरअसल अमेरिकी अर्थव्यवस्था में इस समय तेजी दिखने लगी है। पिछले कुछ महीनों के आंकड़े बता रहे हैं कि उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। इससे डॉलर महंगा होने लगा है और विदेशी संस्थागत निवेशक भारत जैसे देशों से अपना पैसा निकाल रहे हैं। यह पैसा बांड और शेयरों में लगा हुआ था। पिछले चार महीनों में औसतन हर महीने डेढ़ अरब डॉलर की निकासी हुई है। भारत में जब विदेशी निवेशक पूंजी लाते हैं, तो वह डॉलर में होता है और इससे रुपये की कीमत बढ़ती है। लेकिन इस समय ऐसा नहीं हो रहा। अमेरिका के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरें बढ़ाकर वहां का माहौल आकर्षक बना दिया है। वहां यह उम्मीद की जा रही है कि आगे भी ब्याज दरें बढ़ेंगी, जिससे डॉलर में निवेश करना फायदे का सौदा हो गया है। इसका विपरीत असर भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है, जहां विदेशी निवेशक अभी पूंजी लगाने से कतरा रहे हैं।
एक और कारण जो सरकार की ओर से बताया जा रहा है, वह यह है कि भारत ने 2013 में विदेशी बाजारों से जो पैसा उठाया था, उसे अब चुकाना पड़ा, जिससे भारतीय मुद्रा गिर गई। भारत ने उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजारों से 32-34 अरब डॉलर पांच वर्षों के लिए लिया था, जिसे पिछले दिनों उसे लौटाना पड़ा। सरकार का कहना है कि भारतीय मुद्रा की ताकत आज भी उतनी ही है, जितनी 2013 में थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि वह यूरो तथा पाउंड के मुकाबले अब भी उसी स्तर पर है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 400 अरब डॉलर का है, जिससे अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का संकेत मिलता है। इतना बड़ा भंडार होने के कारण सरकार को आगे के लिए विश्वास है कि रुपया और नहीं गिरेगा। अब यह सोचना, कि रुपया फिर से पुराने स्तर पर जाएगा, बेमानी होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले एक-दो वर्षों तक यह डॉलर के मुकाबले 68-69 पर रहेगा।
ऐसा नहीं है कि रुपये के गिरने से निर्यातकों को लाभ हो रहा है। सच तो है कि इससे महज 20 प्रतिशत निर्यातकों को लाभ हुआ है और शेष घाटे में हैं। इसके अलावा निर्यातकों को अपने सौदे करने में काफी कठिनाई हो रही है, क्योंकि यह अंदाजा नहीं लग पा रहा है कि डॉलर कितने पर जाकर ठहरेगा। इस कारण वे भविष्य के सौदे की कीमत तय नहीं कर पा रहे। इसके अलावा विदेशी आयातक रुपये की घटी कीमत के मद्देनज़र कम दाम पर भारतीय निर्यातकों से सामान खरीदना चाहते हैं। रुपये की इस गिरावट ने कार निर्माता कंपनियों तथा अन्य कंपनियों को अपने दाम बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है। इसके अलावा भारत जैसे आयातक देश में इसके गिरने से मुद्रास्फीति बढ़ेगी। पेट्रोल-डीजल के दाम अभी आसमान छू रहे हैं, जिसका असर माल ढुलाई तथा ट्रांसपोर्ट पर पड़ रहा है।
रुपये का इस तरह से गिरना अर्थव्यवस्था के लिए किसी भी रूप में अच्छा नहीं है। उसकी स्थिरता महत्वपूर्ण है। चीन जैसे पूर्ण निर्यातक देशों के लिए अपनी मुद्रा का गिरना अच्छी बात है और वह अवमूल्यन करता रहता है। लेकिन भारत के लिए एक सीमा से ज्यादा गिरावट हानिकारक है। रिजर्व बैंक ने पहले रुपये को गिरने से रोकने के लिए बाजार में हस्तक्षेप किया था, लेकिन अब वह चुप्पी साधकर बैठा है और उसका कहना है कि रुपये की सही कीमत यही है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि डॉलर की सही कीमत 68-69 रुपये से ज्यादा नहीं है। फिलहाल रुपये में उतार-चढ़ाव से कारोबारियों को परेशानी हो रही है और महंगाई बढ़ रही है।