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जामिया में एक शाम
मरिआना बाबर
Updated Sat, 25 Apr 2015 05:54 PM IST
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इस हफ्ते नई दिल्ली एक कूटनीतिक दांव का गवाह बना, जब अफगानिस्तान की प्रथम महिला श्रीमती रूला घनी ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में ऐलान किया, 'भारत हमारे सबसे करीबी सहयोगियों में से है।'
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इस प्रतिष्ठित संस्थान में उन्हें आमंत्रित करने के पीछे दो महिलाओं की अथक कोशिशे थीं। इनमें पहली हैं, साउथ एशिया वीमन्स नेटवर्क (स्वान) की संस्थापक व संयोजक प्रोफेसर वीना सीकरी, और दूसरी हैं, जामिया मिल्लिया में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सबीहा हुसैन।
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जामिया में दलितों व अल्पसंख्यकों के लिए डॉ के आर नारायणन सेंटर में संपन्न इस अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में ये दोनों महिलाएं संयोजक की भूमिका में थीं। स्वान की सहभागिता के साथ दो दिन तक चली इस कॉन्फ्रेंस में क्षेत्र की महिलाओं ने 'जेंडर, कम्युनिटी एंड वॉयलेंसः चेंजिंग माइंडसेट फॉर इम्पॉवरिंग वीमन ऑफ साउथ एशिया' विषय पर चर्चा की।
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कॉन्फ्रेंस के आखिरी दिन की पूर्व संध्या पर निजामी मुर्ग बिरयानी और खूबानी भरे कोफ्ते की खुशबू के बीच जवाहरलाल नेहरू भवन के डाइनिंग हॉल में हमारी मेजबान बनीं भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज। रूला घनी से, जिनके सम्मान में यह डिनर आयोजित किया गया था, मुखातिब होते हुए सुषमा बोलीं, 'अफगानिस्तान का पहला रणनीतिक सहयोगी बनना भारत के लिए गौरव की बात है।
महिलाओं के लिए आपका नेतृत्व अभूतपूर्व है। आप हम सभी के लिए एक प्रेरणा हैं।' इस अभिनंदन के जवाब में रूला घनी ने कहा, 'भारत हमारे सबसे करीबी साथियों में है।' दक्षिण एशियाई महिलाओं का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि लोगों का नजरिया बदलने के लिए वर्षों तक अनवरत सक्रियता, निस्वार्थ त्याग और कड़े धैर्य के साथ असीम उत्साह की जरूरत होगी, ताकि अवसर मिलने पर उसे भुनाने में तनिक भी देर न हो।
शाम के उस आलम में मंत्री महोदया काफी सहज दिख रही थीं, और एक पाकिस्तानी पत्रकार के तौर पर यह बेहतरीन मौका था, जब उनकी हालिया विदेश यात्राओं पर उनसे कुछ गुफ्तगू की जाए। गौरतलब है कि उनकी यात्राओं पर पाकिस्तान की भी नजर रहती है, खासकर तब और भी ज्यादा, जब प्रधानमंत्री मोदी भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अपने हाथ आजमा रहे हैं।
मैंने उन्हें बताया कि पूरा विदेशी मीडिया भारत के बेहतरीन राजनयिक और उनके मंत्रालय के प्रवक्ता सैय्यद अकबरुद्दीन की कमी महसूस करेगा। उन्होंने नए प्रवक्ता, जो खुद भी लेखक हैं, विकास स्वरूप की तारीफ करते हुए उम्मीद जताई कि वे निराश नहीं करेंगे।
जामिया एक ऐसा शिक्षा संस्थान है, जिसके बारे में हम बचपन से सुनते-पढ़ते आ रहे हैं। वहां समय बिताना और फैकल्टी व विद्यार्थियों से बातचीत करना, मेरे लिए वाकई बेहद सम्मान और सपना पूरा होने सरीखी बात थी। हालांकि मेरे परिवार के पुरुष सदस्यों ने अविभाजित भारत में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और देहरादून के प्रिंस ऑफ वेल्स स्कूल में पढ़ाई की है, मगर जामिया जाने का मौका किसी को नहीं मिला।
हैरत की बात है कि जामिया को अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला हुआ है, जबकि यह केंद्र सरकार के अधीन है और तमाम गैर-मुस्लिम विद्यार्थी भी इसकी शोभा बढ़ाते हैं।
नेहरू गेस्ट हाउस में ठहरने के दौरान मुझे जवाहरलाल नेहरू की तमाम ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें देखने का मौका मिला। उनके राजनीतिक इतिहास को दर्शाती दीवार पर टंगी इन तस्वीरों में कुछ तो वाकई दुर्लभ थीं। जामिया जिन परंपराओं की रक्षा की कोशिश कर रहा है, उन पर नेहरू को भी गर्व होता, खासकर ऐसे माहौल में जबकि भारत के इतिहास को बदलने की कोशिश पर बहसें छिड़ी हुई हों।
गौरतलब है कि पाकिस्तान में भी इतिहास की किताबों से सच को बेदखल करने की कोशिश हुई। वहां बांग्लादेश के बनने के पीछे के सच को विद्यार्थियों से छिपाने के प्रयास किए गए। मगर इनमें कामयाबी नहीं मिली। हैरत की बात है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में लिखित दस्तावेजों को बदलने की ऐसी कोशिशें हो रही हैं, जबकि पाकिस्तान में सत्ता पर निरंकुश मार्शल लॉ के हावी होने के समय भी यह कोशिशें नाकाम हुई थीं।
पाकिस्तान में आज दक्षिणपंथी मुल्ला स्कूलों में धार्मिक शिक्षा को जोड़ने की आवाज उठा रहे हैं, मगर पाकिस्तान के आम आदमी की आवाज हमेशा धर्म को राजनीति और शैक्षिक संस्थानों से अलग रखने के पक्ष में रही है।
कॉन्फ्रेंस के दौरान वक्ता दर वक्ता विभिन्न क्षेत्रों की ऐसी कहानियां सुनने को मिलीं, जो शायद अनसुनी रह जाती, क्योंकि न तो प्रिंट और न ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इनके लिए कोई जगह है। कॉन्फ्रेंस के थीम की तारीफ जामिया के कुलपति प्रोफेसर तलत अहमद ने भी की। उन्होंने कॉन्फ्रेंस में कहा, 'महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण क्षेत्र में गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। उम्मीद है कि इस कॉन्फ्रेंस से दक्षिण एशिया में महिलाओं के हितों में नीतिगत बदलाव लाने में मदद मिलेगी।'
रूला सवाल उठाती हैं, 'पुरुषों के साथ अपनी आवाज उठाने और समाज के भविष्य को तय करने के बारे में फैसला करने से महिलाओं को रोकना अपमानजनक है। यह कुछ ऐसा है कि मैं कहूं कि मेरी दो बांहें या दो पैर हैं, मगर मैं एक का ही उपयोग करूंगी। एक पैर या एक हाथ से आप आखिर क्या उम्मीद कर सकते हैं?'
उनका मानना था कि आर्थिक और सामाजिक तौर पर कमजोर होने से आप अपने आसपास के लोगों की दया पर जीने को मजबूर हो जाती हैं। उन्होंने कहा, 'इन हालात में आपके जीवन में सम्मान जैसी कोई भावना नहीं रह जाती। आप एक वस्तु जैसे हो जाते हैं, जिसके साथ्ा मनचाहा दुर्व्यवहार किया जा सकता है। हिंसा आपकी नियति बन जाती है।