फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   America stuk in voilent atrocities

हिंसक अत्याचार के कुचक्र में अमेरिका

Tue, 12 Jul 2016 02:57 PM IST
चार्ल्स एम ब्लो
चार्ल्स एम ब्लो Updated Tue, 12 Jul 2016 02:57 PM IST
विज्ञापन
America stuk in voilent atrocities
चार्ल्स एम ब्लो

पिछला हफ्ता ऐसा था, जिसने अमेरिका के सामाजिक ताने-बाने को भारी नुकसान पहुंचाया। पुलिस अधिकारियों द्वारा दो अश्वेत लोगों की जघन्य हत्या के वीडियो सामने आने के बाद एक अश्वेत व्यक्ति ने एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान कायरतापूर्ण हमला कर पांच पुलिस अधिकारियों को मार डाला और नौ अन्य लोगों को घायल कर दिया। लगता है, हम किसी आसान रास्ते, शांति की मुखर आवाज, हिंसा में कमी के उपायों और संतुष्ट करने वाले संकल्पों के बिना बढ़ते अत्याचार के कुचक्र में फंस गए हैं। लोगों में काफी दर्द और नुकसान की भावना है। ऐसे कई परिवार हैं, जिनके अपनों की जान बेवजह ले ली गई, जिनसे वे फिर गले नहीं मिल सकते। काफी लोगों का भरोसा टूटा है और उनमें दुश्मनी की भावना पैदा हो गई है। बहुत से अमेरिकी इस आतंकी परिवेश में रह रहे हैं कि कोई उन्हें कभी भी निशाना बना सकता है।

विज्ञापन


डलास की गोलीबारी के बाद शुक्रवार की सुबह कॉलेज में पढ़ने वाली मेरी बेटी अपने ग्रीष्मकालीन काम पर जाने से पहले मेरे कमरे में आई और मुझे गले लगाते हुए कहा, डैड, मुझे डर लग रहा है, क्या आप भी डरे हुए हैं? हमने पिछले दिन की घटना के बारे में बातें की और मैंने उसके डर और उसकी चिंताओं को दूर करने की कोशिश की। ऐसे सवालों का कोई पिता कैसे जवाब दे सकता है! मुझे नहीं लगता कि मैं उसे सही तरीके से आश्वस्त कर पाया। सच तो यह है कि मैं खुद डरा हूं। अपने लिए उतना ज्यादा नहीं, जितना अपने प्यारे राष्ट्र के लिए। ऐसा तनाव और दबाव कोई सभ्य समाज लंबे समय तक सहन नहीं कर सकता। मैं स्वयं को हतप्रभ, दुखी और टूटा हुआ महसूस करता हूं। हम ऐसे हालात में रातोंरात नहीं पहुंचे हैं और इससे बाहर भी रातोंरात नहीं निकल पाएंगे।
विज्ञापन


अमेरिकी नीति, संस्कृति और जनजातीयता को सदियों से इस तरह पेश किया गया, जैसे वह पीछे रह गए संत जीवन के इतिहास का फेनिल ज्वार हो। हमारी अमेरिकी बस्तियों का निर्माण नीति और डिजाइन के आधार पर किया गया। गरीबी वाले ये इलाके अपराध और हिंसा के लिए उर्वर जमीन बन गए। इस हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए नगरपालिकाओं ने भारी पुलिस बल का प्रयोग किया। कई बार आक्रामक पुलिस कार्रवाई दमनकारी महसूस हुई। नतीजतन समुदायों एवं पुलिस के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हो गए। मुट्ठी भर अपराधियों के कारण जिस तरह पुलिस में समुदायों की छवि खराब हुई, उसी तरह कुछ बेईमान और संवेदनहीन पुलिस अधिकारियों के कारण समुदायों के बीच समूचे पुलिस बल के बारे में गलत धारणा बन गई। इससे अक्सर अकल्पनीय घटनाएं घटती हैं और कोई न कोई पुलिस के हाथों मारा जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह एक ऐसा समय है, जब समुदायों, संस्थाओं, आंदोलनों, यहां तक देशों की भी परीक्षा ली जा रही है। क्या पुलिस की गोलीबारी से हुई हत्या पर सड़कों पर हुए आंदोलन और पुलिस बलों की हत्या पर हुए आंदोलन को देखने वाले लोग उन लोगों के स्तर से खुद को ऊपर उठाएंगे, जिन्होंने अत्याचारों की इस होड़ में राजनीतिक संभावनाएं तलाश ली हैं? ये बेहद गंभीर सवाल हैं, राष्ट्र की आत्मा से जुड़े हुए, जिनकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते। हम देख सकते हैं कि हमारा असली लक्ष्य सद्भाव है, नफरत नहीं, समाधान ढूंढना है, प्रतिकार नहीं। तो यह हमारे लिए एक मौका है कि हम आगे की तरफ देखें। पर इसके लिए हमें यहीं से और अभी इसकी शुरुआत करनी होगी कि हम लोगों को पूरे मानवीय सम्मान की नजर से देखें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed