अमेरिका का चुनावी नतीजा और काबुल, क्या नीति में आएगा बदलाव?
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मैं इस हफ्ते पाकिस्तानी चिड़ियाघरों के बारे में लिखने जा रही थी, क्योंकि सरकार द्वारा जानवरों को पिंजरों के अंदर रखने के बजाय खुली जगहों पर भेजने और चिड़ियाघरों को बंद करने की कोशिश की जा रही है। आज के दौर में चिड़ियाघरों को पसंद नहीं किया जाता, फिर पाकिस्तान जैसे मुल्कों के पास तो जंगली जानवरों को उनके प्राकृतिक आवासों में रखने के संसाधन तक नहीं हैं। इस्लामाबाद चिड़ियाघर में इसकी शुरुआत कावन हाथी से हुई, जो पैंतीस वर्षों से यहां रह रहा था और अपने मादा साथी की मौत के बाद अवसाद में चला गया। कोई यकीन नहीं कर सकता कि वह इंसान की तरह रोता है, यहां तक कि आंसू बहाता है। उसकी स्थिति ऐसी थी कि फोर पॉज ऑर्गेनाइजेशन जैसे विदेशी पशुप्रेमी संगठन ने पाक सरकार के सामने प्रस्ताव रखा कि वह उसे कंबोडिया ले जाएगा, ताकि वह शेष जीवन बेहतर ढंग से जी सके। इस संगठन के प्रमुख डॉ आमिर खलील ने कहा कि 'जब मैं पहली बार यहां आया, तो मैंने महसूस किया कि उसके एनक्लेव में चल रहे निर्माण कार्यों की वजह से उसे दूर ले जाने की जरूरत थी। उसके पास बैठकर मैंने उसके आंसू देखे। तीस साल के मेरे पेशेवर जीवन में ऐसा पहली बार हुआ।'
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पर जब अमेरिका में मतों की गणना चल रही है, तब पाठकों की दिलचस्पी हाथी में नहीं होगी। अमेरिकी चुनाव ऐसा है कि दुनिया के हर मुल्क की उस पर नजर रहती है, क्योंकि सभी देशों पर उसका सीधा असर पड़ता है। पाकिस्तान को इस समय वाशिंगटन को यह संदेश देना चाहिए कि वह उसे अफगानिस्तान के कारण सिर्फ सुरक्षा के लिहाज से न देखे, बल्कि पाकिस्तान को संभावनाओं वाले एक देश के रूप में देखे। पाक विदेश मंत्रालय ने अमेरिकियों को शुभकामनाएं दी हैं, क्योंकि वे युग-निर्धारक चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं कि अगले चार वर्षों तक व्हाइट हाउस में कौन रहेगा-वर्तमान रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या उनके डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंद्वी तथा पूर्व उप-राष्ट्रपति जो बिडेन। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जाहिद चौधरी ने बताया कि 'चाहे जो भी जीते, पाकिस्तान उसके साथ काम करने को उत्सुक है।'
उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति चुनाव अमेरिका का अंदरूनी मामला है। अमेरिका का राष्ट्रपति जो भी बने, अफगानिस्तान में जल्दी कोई अंदरूनी बदलाव नहीं होने वाला। अफगान तालिबान पर पाकिस्तान की पकड़ अब उतनी मजबूत नहीं रह गई है, लिहाजा अब तालिबान लड़ाकों को प्रशिक्षण नहीं मिलना चाहिए और उन्हें फंडिंग के अपने स्रोत विकसित करने होंगे।
पाक-अमेरिकी नीति को नियंत्रित करने वाली पाकिस्तानी सेना ने हमेशा सैन्य और हार्डवेयर खरीद को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है और पाक-अफगान नीति पूरी तरह सुरक्षा से जुड़ी हुई है। लेकिन वाशिंगटन को यह समझाना बहुत मुश्किल है कि पाकिस्तान के पास व्यापारिक सहयोग जैसे अन्य मुद्दे भी हैं। सीनेटर शेरी रहमान कहती हैं कि 'पाकिस्तान को उम्मीद करनी चाहिए कि बहुपक्षवाद की व्यवस्था को आगे बढ़ाना अगले अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकता में होगा, और उस व्यवस्था में पाकिस्तान को अपनी ताकत, जनसंख्या और भू-राजनीतिक स्थिति की वजह से एक प्रगतिशील देश के तौर पर जगह मिलेगी।'
लेकिन यह मुश्किल लगता है, क्योंकि अमेरिका की नजर केवल अफगानिस्तान पर ही है। वाशिंगटन दरअसल काबुल में एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था बनाने की हड़बड़ी में है, जिससे कि अमेरिकी सैनिक क्रिसमस से पहले घर लौट सकें। अफगान-अमेरिकी राजनयिक जलमय खलीलजाद ने, जो विदेश मंत्रालय में अफगान सुलह के लिए विशेष प्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं, पिछले कुछ महीनों में रावलपिंडी का कई बार दौरा किया। हालांकि वह सिर्फ सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा और आईएसआई प्रमुख से ही मिले। उन्होंने विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को फोन करने तक की जहमत नहीं उठाई और न ही खुद विदेश मंत्री सेना मुख्यालय की बैठकों में मौजूद थे। पाकिस्तान में कुछ लोगों का कहना है कि अमेरिका में चाहे जो भी जीते, उसकी अफगान नीति वही रहेगी और उसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।
जलमय खलीलजाद का पाकिस्तान में बैठकों का इकलौता एजेंडा यह है कि पाकिस्तान अफगान तालिबान पर आतंकी हमले रोकने और बातचीत की मेज पर बैठने के लिए दबाव बनाए। पर यह असंभव लगता है, क्योंकि किसी से निर्देश लेना अफगानों के स्वभाव में ही नहीं है। फिर आज तो वे अच्छी तरह प्रशिक्षित हैं, सशस्त्र हैं और सभी पश्चिमी मुल्क उनके साथ सीधा संपर्क कर सकते हैं। अफगानिस्तान में ताजा आतंकी हमले ने दोहा शांति प्रक्रिया को मजाक बना दिया है। अफगानिस्तान के भीतर इस्लामिक स्टेट भी मजबूत हो गया है और उसने काबुल विश्वविद्यालय पर हमले की जिम्मेदारी ली है, जिसमें दर्जनों छात्र मारे गए।
पाक तालिबान का नेतृत्व भी अफगानिस्तान के भीतर है, जहां से वह पाकिस्तान पर हमला करता है, और उनमें से कुछ को वजीरिस्तान में भी देखा गया है, जिससे वहां के स्थानीय लोग चिंतित हैं। ऐसे माहौल में यह आशंका है कि अगर हजारों की संख्या में शेष बचे अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से चले गए, तो तालिबान को वहां और ज्यादा बर्बादी करने से रोकने वाला कोई नहीं होगा। अस्थिर अफगानिस्तान पाकिस्तान के अंदरूनी हालात को सीधे प्रभावित करेगा, इसलिए पाकिस्तानी सरकार ने वाशिंगटन से कई बार कहा है कि वह जल्दबाजी में सैनिकों की वापसी जैसे कदम न उठाए। सोवियत संघ के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद पाकिस्तान में लाखों अफगान शरणार्थियों ने पनाह ली थी और वहीं से हेरोइन और क्लाशिन्कोव की संस्कृति शुरू हुई। वाशिंगटन में चाहे जो भी जीते, पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण यह होगा कि वह अमेरिकी सरकार को इस बात के लिए मनाए कि वह जल्दबाजी में अपने सैनिकों को वापस बुलाकर अफगानिस्तान को उथल-पुथल में न छोड़े। एक बात साफ है कि अफगानिस्तान की जंग में कोई जीत नहीं सकता।