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ताकतवरों की चौकड़ी और भारत

Mon, 31 Mar 2025 07:39 AM IST
SPrasannarajan प्रसन्नराजन एस प्रसन्नराजन
Updated Mon, 31 Mar 2025 07:39 AM IST
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सार
अंतरराष्ट्रीय जगत के चार ताकतवर देश या समूह- अमेरिका, यूरोप, रूस और चीन अपने-अपने मोर्चों पर अलग संघर्षों में व्यस्त हैं और भारत को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। यह स्थिति भारत को अपनी कूटनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विश्वास के साथ प्रयोग करने का दुर्लभ विशेषाधिकार प्रदान करती है।
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America, Europe, Russia and China are attracting India towards themselves
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा में पश्चिम सुसंस्कृत सांस्कृतिक एकजुटता और स्वतंत्रता की भावना के पक्ष में खड़ा है, जो लोकतंत्र की भावना को ही सुनिश्चित करने का प्रयास है। अगर द्वितीय विश्वयुद्ध ने जाति और भाग्य के बीच संतुलन बनाने के मनुष्य के उन्मादी प्रयास की बहस को सुलझा दिया और राजनीतिक बातचीत में बुराई को वापस ला दिया, तो शीतयुद्ध ने स्वतंत्रता के विभाजन को स्पष्ट कर दिया। साम्यवाद के खिलाफ अभियान में शामिल होने वाले देशों ने एक नैतिक दृष्टिकोण साझा किया, जिसमें मानवीय गरिमा को अब तक व्यवहार में लाई गई सबसे महत्वाकांक्षी विचारधारा पर वरीयता दी गई। शीतयुद्ध के अंत में निर्गुट दुनिया की नाटकीयता खत्म हो गई। यह केवल 9/11 तक ही चला, जब एक नए दुश्मन ने प्रवेश किया और इस सुखद माहौल को तहस-नहस कर दिया।  विचारधारा का स्थान आस्था ने ले लिया। इसके बाद आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध ने भय को पश्चिम में एक एकीकृत शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया, जिसने अंततः कट्टरपंथी इस्लाम द्वारा प्रस्तुत विकल्प के विरुद्ध तर्क में विजय प्राप्त की। यूक्रेन पर रूसी आक्रमण और गाजा में युद्ध ने संभवतः पश्चिम को उन मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित किया है, जिन्होंने उसे एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में आकार दिया। मतभेदों के कारण अलग-अलग विचारधारा के लोगों का साथ रहना संभव नहीं हो पाया। पीछे मुड़कर देखें, तो इतने लंबे समय तक राष्ट्रीय हित की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बने रिश्ते को खत्म करने के लिए कोई एक बड़ा कारण नहीं था। फिर ट्रंप दोबारा सत्ता में आए।



आज पश्चिम एकल सांस्कृतिक दृष्टिकोण नहीं अपना सकता। ट्रंप ने यह कैसे हासिल किया? एक राष्ट्रपति खुद को उन परंपराओं से ज्यादा बुद्धिमान क्यों मानता है, जिन्होंने अमेरिका को आधुनिक राष्ट्रों के इतिहास में सबसे प्रभावशाली और प्रशंसनीय बनाए रखा? यह केवल कुछ लोगों की इस धारणा को सही साबित करता है कि इतिहास को मानव मस्तिष्क के अत्यंत अनियंत्रित प्रभाव द्वारा चरम सीमा तक ले जाया जाता है। ट्रंप ने आर्मागेडन (न्याय से पहले अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष) के मार्ग का नेतृत्व नहीं किया है, लेकिन वह वास्तव में मानते हैं कि यूक्रेन या गाजा में कगार से पीछे हटना तब तक संभव नहीं है, जब तक कि दुनिया, विशेषकर पश्चिम, उनसे मार्गदर्शन न ले।


एक अमेरिकी राष्ट्रपति का रूसी तानाशाह के आगे झुकना और यूक्रेन पर शांति समझौते को थोपना, स्वतंत्रता के उस इतिहास के उलट है, जिसमें अमेरिका और यूरोप भागीदार थे। डोनाल्ड ट्रंप की नजर में यूरोप का कोई महत्व नहीं है। यह अब अमेरिका का सहयोगी बनने के योग्य नहीं है। यूरोप का प्रभाव, चाहे बाल्कन युद्धों के दौरान हो या किसी भी संघर्ष के दौरान, जिसमें महाद्वीप की सामूहिक शक्ति दांव पर लगी हो, न्यूनतम था। यह अमेरिका ही था, जिसने बड़ा अंतर पैदा किया। यूरोप की हरकतें कभी भी उसके दिखावे से मेल नहीं खाती थीं। ये वही दिखावे हैं, जिन्हें रक्षा विभाग के लीक हुए ग्रुप चैट में ट्रंप के एक वफादार ने 'दयनीय' बताया है।

हमारे सामने ताकतवरों की एक चौकड़ी है: एक अंतर्मुखी अमेरिका, जो अपनी महानता बहाल करने में व्यस्त है, एक यूरोप, जो अमेरिका द्वारा स्वतंत्रता के पर्याय के रूप में अमेरिकीवाद के कमजोर होने से निराश है, एक रूस, जो अपने ऐतिहासिक दुश्मन को अपने पाले में रखने के लिए पूरी तरह आश्वस्त है, और एक चीन, जो ट्रंप के टैरिफ आतंक का सामना करने के लिए अस्थायी सहयोगियों की तलाश कर रहा है।

इंग्लैंड के कीर स्टार्मर और फ्रांस के इमैनुएल मैक्रों के नेतृत्व में यूरोप के प्रयासों ने खुद को पश्चिमी मूल्य प्रणाली के वैकल्पिक केंद्र के रूप में स्थापित किया है, जो आज अमेरिका को परेशान कर रहा है। ट्रंप की नाराजगी के कारण से कहीं ज्यादा, इस नए विवाद ने दुनिया के सबसे पुराने स्वतंत्रता के गठबंधन को तोड़ दिया है। यूक्रेन और साम्यवाद विहीन नव-स्तालिनवादी रूस के युग में, ऐसी एकजुटता की दुनिया को जरूरत है, खासकर तब, जब निरंकुशता की सराहना अब केवल पुराने वामपंथ की विशेषता नहीं रह गई है।

नया यूरोपीय दावा लंबे समय तक नहीं टिकने वाला है, क्योंकि यह उतना ही प्रभावी है, जितना इसके नेता। शुरुआती अनिश्चितता के बाद स्टार्मर अचानक स्वतंत्रता की आवाज बन गए हैं, एक आदर्शवादी, जो अगला टोनी ब्लेयर बनने की ख्वाहिश रखते हैं।

एक विवेकशील वैश्विकवादी के रूप में लेबर पार्टी का नेता परंपरा के अनुसार, ब्लेयर-क्लिंटन ब्रोमेंस की तरह अमेरिका का मित्र होता है। स्टार्मर, जिनका जनादेश या आभा पुराने ब्लेयर से मेल नहीं खाता, यूरोप केंद्रित आधुनिकता के प्रचारक मैक्रों के साथ, अमेरिकी असंवेदनशीलता के खिलाफ पश्चिमी विवेक का एक अप्रत्याशित चेहरा है। डी गॉल या मित्तेर्रैंड या थैचर या मर्केल जैसे प्रभावशाली नेता की अनुपस्थिति में, अमेरिका विरोधी यूरोपीय परियोजना अपने नेताओं के जनादेश की तरह ही नाजुक बनी रहेगी। अटलांटिक के उस पार, अमेरिका पर छाए नेता सनकियों की तरह सत्ता का इस्तेमाल कर रहे हैं। नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था एक रेखीय पटकथा को चुनौती देती है; यह ट्रंपवाद की आवेगशीलता का अनुसरण करती है।

और यही कारण है कि अमेरिका और यूरोप के बीच स्वतंत्रता के बारे में सबसे उग्र बहस स्वयं लोकतंत्र के बारे में बहस बन गई है। अमेरिका में सत्ता उस राष्ट्रपति के हाथों में होती है, जो अतीत के पुनर्निर्माण के बारे में अधिक चिंतित रहता है, न कि परंपराओं और रूढ़ियों का सम्मान करने के बारे में, जो अब भी बहुत हद तक यूरोपीय हैं। ट्रंप केवल अपने आधार को जवाब देते हैं, जो वफादार रहता है; उनके यूरोपीय विरोधियों के पैरों के नीचे ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है। चौकड़ी के दो अन्य हिस्से, रूस और चीन, गैर-स्वतंत्रता के जुड़वां टॉवर हैं, पश्चिम में विभाजन के सच्चे लाभार्थी हैं। क्या इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि वे सभी कितनी उत्सुकता से भारत को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं? समान दूरी का मतलब तटस्थता नहीं है, और यह भारत को अपनी कूटनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उस विश्वास के साथ प्रयोग करने का दुर्लभ विशेषाधिकार प्रदान करता है, जो केवल उसके लोकतांत्रिक जनादेश के आकार से ही हासिल हो सकता है।

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