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ऐतिहासिक मोड़ पर अमेरिका-चीन
थॉमस एल फ्रीडमैन
Updated Thu, 03 May 2018 06:34 PM IST
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चीन अमेरिका ट्रेड वार
इस सप्ताह कारोबार से संबंधित शीर्ष अमेरिकी वार्ताकारों के बीजिंग पहुंचने की खबर पर आप शायद मान रहे हों कि अमेरिका और चीन व्यापार युद्ध से बचने के लिए बातचीत करने जा रहे हैं और यह बिजनेस पेज की खबर है। इस पर दोबारा विचार कीजिए। यह इतिहास की किताब की खबर है।
बीजिंग में चीनी, अमेरिकी और यूरोपीय सरकारी अधिकारियों तथा व्यापारिक नेताओं की पांच दिन की बैठक से है कि यह जो कुछ हो रहा है, वह दुनिया के प्राचीनतम और नवीनतम सुपर पावर्स-यानी अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक नियमों और सत्ता समीकरणों को पुनर्परिभाषित करने का संघर्ष है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम की सोच है : इससे पहले कि देर हो जाए और चीन बहुत बड़ा हो जाए, हमें लड़ाई छेड़ देनी चाहिए। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सोच है : यह लड़ाई दमदार है, क्योंकि पहले ही विलंब हो चुका है और चीन बहुत बड़ा है।
शिंघुआ यूनिवर्सिटी में व्यापार पर हुए संवाद में एक चीनी विशेषज्ञ ने कहा था, 'अब चीन को कोई दबा नहीं सकता।' चीनियों के आत्मविश्वास को साफ तौर पर सुना जा सकता है : हमारी एक पार्टी प्रणाली और एकीकृत समाज व्यापार युद्ध के दर्द को अमेरिकियों की तुलना में ज्यादा समय तक झेलने की क्षमता रखते हैं। और आज एक किस्म का व्यापार असंतुलन बन गया है, क्योंकि हम चीनी अपने भविष्य के लिए निवेश कर रहे हैं, जबकि आप अमेरिकी अपने निवेश को खत्म कर रहे हैं। चीनी कहानी इस तरह है : पहले अमेरिका और चीन तत्कालीन सोवियत संघ के खिलाफ एकजुट थे। यह सिलसिला 1970 के दशक के आखिर तक चला। फिर दूसरा चरण शुरू हुआ : चीन ने खुद को पूंजीवाद की तरफ मोड़ा, वह एक विशाल फैक्टरी और विशाल बाजार बना-और इस तरह 30 साल बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।
ऐसा चीनी लोगों की कार्यसंस्कृति, उनके नेताओं की दूरगामी सोच तथा बुनियादी ढांचे और शिक्षा पर सरकार के भारी निवेश के कारण संभव हो पाया। ऐसा विश्व व्यापार संगठन के नियमों को तोड़ने-मरोड़ने के मामले में चीनियों की क्षमता और धोखाधड़ी के कारण भी संभव हुआ। चीन ने औद्योगिक जासूसी के जरिये पश्चिमी नवाचारों को चुराया।
2001 में विश्व व्यापार संगठन से जुड़ते समय उसने खुद को विकासशील देश बताया। नतीजतन अमेरिका में अपने निर्यात पर उसे बहुत कम शुल्क देना पड़ा। दूसरी तरफ अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों से अपने उभरते उद्योगों को बचाने के लिए उसने अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी देशों के आयात पर भारी शुल्क लगाया। सहमति बनी थी कि जैसे ही चीन विकास करेगा और विश्व व्यापार संगठन एक नए चरण में पहुंचेगा, चीन अपने भारी-भरकम शुल्क में कटौती करेगा। पर चूंकि विश्व व्यापार संगठन नया चरण पूरा नहीं कर पाया, ऐसे में चीन ने शुल्क कटौती से इन्कार कर दिया।
चीन ने एक ऐसी औद्योगिक नीति विकसित की, जिसके तहत गाहे-बगाहे विश्व व्यापार संगठन के नियमों को तोड़ा-मरोड़ा गया। सरकार ने नए उद्योगों को सस्ती जमीन तो दी ही, सरकारी बैंकों ने उन्हें सस्ते कर्ज भी मुहैया कराए, पर चीनी बाजार में प्रवेश की इच्छा रखने वाली विदेशी कंपनियों को चीनी साझेदार ढूंढने और अपनी उन्नत टेक्नोलॉजी उन्हें हस्तांतरित करने के लिए कहा गया।
एक समय के बाद बीजिंग बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर यह दबाव बनाने में सफल हो गया कि वे अपनी सप्लाई चेन चीन को सौंपें और खुद चीनी कंपनियों के प्रतिद्वंद्वियों के तौर पर काम करें। जब अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन में विरोध जताया, तब भी चीन अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने के 17 साल पुराने वायदे से पीछे हट गया। तब तक यूनियन पे जैसी चीनी कंपनियां चीनी क्रेडिट कार्ड बाजार में इतनी ताकतवर हो गई थीं कि वीजा जैसी अमेरिकी कंपनियों को चीन के बाजार से निकलने पर मजबूर होना पड़ा।
चीन की सरकार-निर्देशित कंपनियां और निवेश फंड्स रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उद्यमों को खरीदने के लिए देश से बाहर निकलीं और उनकी टेक्नोलॉजी को चीन में ले आने में सफल हुईं। जर्मनी की सबसे बड़ी और बेहतरीन रोबोटिक्स कंपनी कुका का इस संदर्भ में खास तौर पर जिक्र किया जाना चाहिए।
अमेरिकी और यूरोपीय उद्योगों ने यह सब बर्दाश्त किया, क्योंकि वे चीन में कमाई कर रहे थे। पर अक्तूबर, 2015 में चीन ने जब मेड इन चाइना 2025 जैसी अपनी दूरगामी योजना घोषित की, तब उनकी चिंता बढ़ी। तभी से यूरोपीय संघ के देश ऐसा कानून बनाने की कोशिश में हैं, जिससे चीन को अपने उन्नत उद्योगों को खरीदने से रोका जा सके। जबकि चीन कोशिश कर रहा है कि यूरोपीय संघ अमेरिका के पाले में न जाए।
जब हम पश्चिम द्वारा चीन के साथ अपने आर्थिक रिश्ते तय करने के ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े हैं, तब ट्रंप जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोप और कनाडा जैसे देशों के साथ व्यापार युद्ध का जोखिम उठा रहे हैं, जो चीन को सही रास्ते पर ला सकते हैं। ट्रंप मान बैठे हैं कि वह विश्व व्यापार के अगले दौर में चीन को दिशा निर्देश देने में सक्षम हैं।
ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप को खत्म करने का ट्रंप का फैसला तो और भी बदतर था। यह वह संगठन था, जिनके हित अमेरिकी हितों से मिलते-जुलते थे। यूरोप और प्रशांत में ऐसे अनेक सहयोगी थे, जिनके जरिये हम चीन को सही रास्ते पर ला सकते थे। पर ट्रंप ने उन सबको अलग-थलग कर दिया। बेशक चीन आज पच्चीस साल पहले की तुलना में बहुत खुला हुआ है, पर उतना भी खुला हुआ नहीं है, जितना पांच साल पहले था। शी ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर और कम्युनिस्ट पार्टी को नियंत्रित कर ठोस कदम उठाया। पर एक व्यक्ति की व्यवस्था कायम कर, इंटरनेट तथा खुली अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाकर तथा विश्वविद्यालयों की मुश्कें कसकर चीन को नए दौर में नहीं ले जाया जा सकता।
जैसा मैंने पहले कहा, यह पहले पेज की व्यापार से संबंधित खबर नहीं, अमेरिका-चीन संबंधों के नए अध्याय का पहला पेज है। यह जिस तरह लिखा जाएगा और जिस तरह खत्म होगा, वह न केवल ट्रंप और शी के रिश्तों को आकार देगा, बल्कि दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी इसका असर होगा।
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बीजिंग में चीनी, अमेरिकी और यूरोपीय सरकारी अधिकारियों तथा व्यापारिक नेताओं की पांच दिन की बैठक से है कि यह जो कुछ हो रहा है, वह दुनिया के प्राचीनतम और नवीनतम सुपर पावर्स-यानी अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक नियमों और सत्ता समीकरणों को पुनर्परिभाषित करने का संघर्ष है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम की सोच है : इससे पहले कि देर हो जाए और चीन बहुत बड़ा हो जाए, हमें लड़ाई छेड़ देनी चाहिए। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सोच है : यह लड़ाई दमदार है, क्योंकि पहले ही विलंब हो चुका है और चीन बहुत बड़ा है।
शिंघुआ यूनिवर्सिटी में व्यापार पर हुए संवाद में एक चीनी विशेषज्ञ ने कहा था, 'अब चीन को कोई दबा नहीं सकता।' चीनियों के आत्मविश्वास को साफ तौर पर सुना जा सकता है : हमारी एक पार्टी प्रणाली और एकीकृत समाज व्यापार युद्ध के दर्द को अमेरिकियों की तुलना में ज्यादा समय तक झेलने की क्षमता रखते हैं। और आज एक किस्म का व्यापार असंतुलन बन गया है, क्योंकि हम चीनी अपने भविष्य के लिए निवेश कर रहे हैं, जबकि आप अमेरिकी अपने निवेश को खत्म कर रहे हैं। चीनी कहानी इस तरह है : पहले अमेरिका और चीन तत्कालीन सोवियत संघ के खिलाफ एकजुट थे। यह सिलसिला 1970 के दशक के आखिर तक चला। फिर दूसरा चरण शुरू हुआ : चीन ने खुद को पूंजीवाद की तरफ मोड़ा, वह एक विशाल फैक्टरी और विशाल बाजार बना-और इस तरह 30 साल बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।
ऐसा चीनी लोगों की कार्यसंस्कृति, उनके नेताओं की दूरगामी सोच तथा बुनियादी ढांचे और शिक्षा पर सरकार के भारी निवेश के कारण संभव हो पाया। ऐसा विश्व व्यापार संगठन के नियमों को तोड़ने-मरोड़ने के मामले में चीनियों की क्षमता और धोखाधड़ी के कारण भी संभव हुआ। चीन ने औद्योगिक जासूसी के जरिये पश्चिमी नवाचारों को चुराया।
2001 में विश्व व्यापार संगठन से जुड़ते समय उसने खुद को विकासशील देश बताया। नतीजतन अमेरिका में अपने निर्यात पर उसे बहुत कम शुल्क देना पड़ा। दूसरी तरफ अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों से अपने उभरते उद्योगों को बचाने के लिए उसने अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी देशों के आयात पर भारी शुल्क लगाया। सहमति बनी थी कि जैसे ही चीन विकास करेगा और विश्व व्यापार संगठन एक नए चरण में पहुंचेगा, चीन अपने भारी-भरकम शुल्क में कटौती करेगा। पर चूंकि विश्व व्यापार संगठन नया चरण पूरा नहीं कर पाया, ऐसे में चीन ने शुल्क कटौती से इन्कार कर दिया।
चीन ने एक ऐसी औद्योगिक नीति विकसित की, जिसके तहत गाहे-बगाहे विश्व व्यापार संगठन के नियमों को तोड़ा-मरोड़ा गया। सरकार ने नए उद्योगों को सस्ती जमीन तो दी ही, सरकारी बैंकों ने उन्हें सस्ते कर्ज भी मुहैया कराए, पर चीनी बाजार में प्रवेश की इच्छा रखने वाली विदेशी कंपनियों को चीनी साझेदार ढूंढने और अपनी उन्नत टेक्नोलॉजी उन्हें हस्तांतरित करने के लिए कहा गया।
एक समय के बाद बीजिंग बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर यह दबाव बनाने में सफल हो गया कि वे अपनी सप्लाई चेन चीन को सौंपें और खुद चीनी कंपनियों के प्रतिद्वंद्वियों के तौर पर काम करें। जब अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन में विरोध जताया, तब भी चीन अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने के 17 साल पुराने वायदे से पीछे हट गया। तब तक यूनियन पे जैसी चीनी कंपनियां चीनी क्रेडिट कार्ड बाजार में इतनी ताकतवर हो गई थीं कि वीजा जैसी अमेरिकी कंपनियों को चीन के बाजार से निकलने पर मजबूर होना पड़ा।
चीन की सरकार-निर्देशित कंपनियां और निवेश फंड्स रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उद्यमों को खरीदने के लिए देश से बाहर निकलीं और उनकी टेक्नोलॉजी को चीन में ले आने में सफल हुईं। जर्मनी की सबसे बड़ी और बेहतरीन रोबोटिक्स कंपनी कुका का इस संदर्भ में खास तौर पर जिक्र किया जाना चाहिए।
अमेरिकी और यूरोपीय उद्योगों ने यह सब बर्दाश्त किया, क्योंकि वे चीन में कमाई कर रहे थे। पर अक्तूबर, 2015 में चीन ने जब मेड इन चाइना 2025 जैसी अपनी दूरगामी योजना घोषित की, तब उनकी चिंता बढ़ी। तभी से यूरोपीय संघ के देश ऐसा कानून बनाने की कोशिश में हैं, जिससे चीन को अपने उन्नत उद्योगों को खरीदने से रोका जा सके। जबकि चीन कोशिश कर रहा है कि यूरोपीय संघ अमेरिका के पाले में न जाए।
जब हम पश्चिम द्वारा चीन के साथ अपने आर्थिक रिश्ते तय करने के ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े हैं, तब ट्रंप जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोप और कनाडा जैसे देशों के साथ व्यापार युद्ध का जोखिम उठा रहे हैं, जो चीन को सही रास्ते पर ला सकते हैं। ट्रंप मान बैठे हैं कि वह विश्व व्यापार के अगले दौर में चीन को दिशा निर्देश देने में सक्षम हैं।
ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप को खत्म करने का ट्रंप का फैसला तो और भी बदतर था। यह वह संगठन था, जिनके हित अमेरिकी हितों से मिलते-जुलते थे। यूरोप और प्रशांत में ऐसे अनेक सहयोगी थे, जिनके जरिये हम चीन को सही रास्ते पर ला सकते थे। पर ट्रंप ने उन सबको अलग-थलग कर दिया। बेशक चीन आज पच्चीस साल पहले की तुलना में बहुत खुला हुआ है, पर उतना भी खुला हुआ नहीं है, जितना पांच साल पहले था। शी ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर और कम्युनिस्ट पार्टी को नियंत्रित कर ठोस कदम उठाया। पर एक व्यक्ति की व्यवस्था कायम कर, इंटरनेट तथा खुली अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाकर तथा विश्वविद्यालयों की मुश्कें कसकर चीन को नए दौर में नहीं ले जाया जा सकता।
जैसा मैंने पहले कहा, यह पहले पेज की व्यापार से संबंधित खबर नहीं, अमेरिका-चीन संबंधों के नए अध्याय का पहला पेज है। यह जिस तरह लिखा जाएगा और जिस तरह खत्म होगा, वह न केवल ट्रंप और शी के रिश्तों को आकार देगा, बल्कि दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी इसका असर होगा।