फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   America, China and India are paying attention to the elections in Sri Lanka

मंथन: श्रीलंका में चुनाव और दक्षिण एशियाई संतुलन, अमेरिका-चीन और भारत की नजर

Fri, 13 Sep 2024 06:11 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Fri, 13 Sep 2024 06:11 AM IST
विज्ञापन
सार
श्रीलंका में 21 सितंबर को होने वाले चुनाव पर खासकर अमेरिका, चीन और भारत तीनों की नजर है, क्योंकि इससे यह पता चलेगा कि कौन-सा विजेता किस देश को फायदा पहुंचा सकता है। हालांकि जीते कोई भी, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना पहली चुनौती होगी।
 
loader
America, China and India are paying attention to the elections in Sri Lanka
श्रीलंका। - फोटो : Freepik

विस्तार

श्रीलंका की अर्थव्यवस्था ने वहां राजनीति को पीछे छोड़ दिया है। हालांकि वर्ष 2022 की आर्थिक मंदी से कुछ हद तक उबरने के बाद श्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी चल रही है। 21 सितंबर को होने वाले मतदान से एक व्यापक धारणा सामने आ सकती है कि कौन-सा विजेता किस देश को फायदा पहुंचा सकता है। दक्षिण एशियाई क्षेत्र में भारत, अमेरिका और चीन जैसे तीन बड़े खिलाड़ी सक्रिय हैं। श्रीलंका के 1.7 करोड़ योग्य मतदाताओं के सामने सवाल यह है कि क्या वे अपने पुराने नेतृत्व को चुनेंगे, जो मुख्य रूप से आर्थिक संकट के लिए जिम्मेदार था या बदलाव के लिए किसी नए नेता को चुनेंगे। चूंकि मैदान में 38 उम्मीदवार हैं, इसलिए आकलन करना कठिन हो गया है।



श्रीलंका ने अप्रैल, 2022 में 83 अरब डॉलर के कर्ज के साथ दिवालिया होने की घोषणा की थी। उसके ऊपर आधे से ज्यादा कर्ज विदेशी कर्जदाताओं का था। श्रीलंका अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से भी 2.9 अरब डॉलर की राहत की मांग कर रहा है। राहत पैकेज की शर्तों को लेकर भी चुनाव में चर्चा हो रही है। पिछले साल 2.3 प्रतिशत की गिरावट के बाद 2024 में अर्थव्यवस्था के तीन प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है।


छह बार प्रधानमंत्री रह चुके मौजूदा राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे अपनी पार्टी यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) में विभाजन के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। उनके दो साल के शासन में देश की अर्थव्यवस्था में आंशिक सुधार हुआ है। चूंकि महंगाई और वस्तुओं की कमी बनी हुई है, इसलिए चुनाव को उनके शासन के जनमत संग्रह के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन वह नुकसान में हैं, क्योंकि वह उन पुराने नेताओं से जुड़े रहे हैं, जिन्हें श्रीलंका के लोग आर्थिक पतन के लिए दोषी मानते हैं। उन्हें संसद में विपक्ष के नेता से कड़ी चुनौती मिल रही है। इसके अलावा, उन्हें एक शक्तिशाली गठबंधन वाले वामपंथी नेता से भी चुनौती मिल रही है, जो युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। उनके दो सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी समागी जन बालावेगया (एसजेबी) पार्टी के सजित प्रेमदासा और अनुरा कुमार दिसानायके हैं। नेशनल पीपुल्स पावर (एनपीपी) नामक मार्क्सवादी नेतृत्व वाले गठबंधन के नेता दिसानायके, विक्रमसिंघे के लिए प्रमुख चुनौती के रूप में तेजी से उभर रहे हैं। उन्हें 2022 के विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने वाले कुछ लोगों का समर्थन भी मिल रहा है। पूर्व वामपंथी दिसानायके अब आर्थिक स्वतंत्रता और मजदूर वर्गों के लिए कल्याणकारी उपायों का वादा करते हैं। राजनीतिक विश्लेषक उन्हें मजबूत दावेदार मानते हैं क्योंकि उनका संबंध उन व्यापारिक और राजनीतिक अभिजात वर्ग से नहीं है, जिन्होंने अतीत में देश को चलाया था।

विक्रमसिंघे के उपराष्ट्रपति रहे सजित प्रेमदासा अब अलग हुए यूएनपी का नेतृत्व कर रहे हैं। प्रेमदासा ने आईएमएफ कार्यक्रम को जारी रखने के साथ गरीब लोगों पर बोझ कम करने के लिए बदलाव का वादा किया है। उन्होंने तमिल समुदाय को सत्ता सौंपने का वादा करके लुभाने की कोशिश की है। देश की आबादी का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा तमिल अब भी एक विफल हिंसक आंदोलन से उबर रहा है। अतीत को भूलकर, युवा तमिलों ने 2022 के आंदोलन में भाग लिया था, जिसकी स्मृतियां अब भी ताजा हैं। युवाओं की भागीदारी वाले उस शांत आंदोलन ने गोटाबाया और शक्तिशाली राजपक्षे परिवार को सत्ता से बाहर कर दिया था, हालांकि गोटाबाया को बहुमत हासिल था।

ताकतवर राजपक्षे परिवार ने पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा के बेटे नमन को मैदान में उतारा है। नमन आर्थिक संकट के लिए अपने परिवार को नहीं, बल्कि कोविड-19 महामारी को जिम्मेदार ठहराते हैं। राजनीति में उनके प्रवेश से परिवार के प्रभाव का पता चलेगा, क्योंकि पिता महिंदा ने 2009 में तमिल सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन को कुचल दिया था।

चुनाव का नतीजा 22 सितंबर की शाम तक आ सकता है। मतदाता अपनी पसंद के तीन उम्मीदवारों का चयन कर सकते हैं। सबसे पहले पहली वरीयता की गणना की जाएगी और 50 प्रतिशत से अधिक वैध मत पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित किया जाएगा। यदि कोई स्पष्ट विजेता नहीं हुआ, तो पहले दो उम्मीदवारों को दौड़ में बनाए रखा जाएगा, और पहले नंबर के लिए अन्य उम्मीदवारों को चुनने वाले मतपत्रों की जांच की जाएगी कि शीर्ष दो दावेदारों में से कोई दूसरी या तीसरी पसंद है या नहीं। उन वोटों को शेष दो उम्मीदवारों की संख्या में जोड़ा जाएगा। सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित किया जाएगा।

अब उस बड़ी तस्वीर को देखें, जो क्षेत्रीय खिलाड़ियों की भूमिका को दर्शाती है, जैसा कि नेपाल और मालदीव में भी होता है। द डिप्लोमैट में लिखते हुए, रथिंद्र कुविता ने कहा कि कोलंबो में वामपंथी दल या राजनेता के सत्ता में होने पर चीन-श्रीलंका के संबंध मजबूत हुए हैं। उनका कहना है कि श्रीलंका के राजनीतिक हलकों को अच्छी तरह पता है कि भारत भले ही सजित प्रेमदासा को प्राथमिकता दे, लेकिन अमेरिका विक्रमसिंघे को ही अपना उम्मीदवार बनाए रखना चाहेगा। हालांकि इस पर अनिश्चितता बनी हुई है कि चीन किसे प्राथमिकता देगा और क्या वह इनमें से किसी को वित्तीय मदद दे रहा है। दिसानायके की एनपीपी की जड़ें मध्यमार्गी वामपंथी (सेंटर-लेफ्ट) राजनीतिक परंपरा में निहित हैं।

जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) एनपीपी में प्रमुख ताकत है, जो 1960 के दशक में श्रीलंका कम्युनिस्ट पार्टी की चीन समर्थक शाखा से उभरी थी। दूसरी ओर, सजित प्रेमदासा यूएनपी के परिष्कृत संस्करण का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि उनकी एसजेबी एक अलग गुट है। पूर्व राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा के बेटे सजित प्रेमदासा का संबंध उन दलों से है, जो अक्सर श्रीलंका में चीनी फंडिंग की आलोचना करते रहे हैं। कुविता कहते हैं, 'इस ऐतिहासिक संदर्भ को देखते हुए लगता है कि दिसानायके के राष्ट्रपतित्व में श्रीलंका के साथ चीन की भागीदारी बढ़ेगी, जबकि प्रेमदासा के नेतृत्व में वह अधिक सतर्क रहेगा।' हालांकि श्रीलंका में चाहे कोई भी जीते, अर्थव्यवस्था को बेहतर करते हुए बेरोजगारी कम करना महत्वपूर्ण है, जैसा कि बांग्लादेश में हाल के परिवर्तनों और पाकिस्तान में लंबे समय से चल रहे संकट से भी स्पष्ट है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed