दूसरा पहलू: गांधी की प्रेरणा और बीजोत्सव का आयोजन, मकसद... भोगवादी संस्कृति पर लगाम लगाना
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विस्तार
हाल ही में गांधी जी की कर्मस्थली सेवाग्राम में अनूठे बीजोत्सव का आयोजन हुआ, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से जैविक खेती करने वाले किसान शामिल हुए। इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में देसी बीजों की खेती, जलवायु परिवर्तन, बीजों के कानून और नई खेती पद्धतियों पर विचार-विमर्श हुआ। महाराष्ट्र के वर्धा शहर से आठ किलोमीटर दूरी पर स्थित सेवाग्राम में मिट्टी के घर, लकड़ी और छतों पर खपरैल से बने हैं। प्राकृतिक खेती, नई तालीम का स्कूल, खादी व चरखा और सादा रसोईघर है। हरे-भरे पेड़-पौधे, रंग-बिरंगे फूल व लताओं से सजे परिसर की पहचान सादगी व सुघड़ता है। यहां प्रकृति की अपनी लय है। गांधी जी इसी लय को समाज में उचित स्थान दिलाना चाहते थे।बीजोत्सव भी गांधी की प्रेरणा की एक मिसाल है। यह खेती के गहरे संकट से जुड़ा है। इसकी शुरुआत करीब एक दशक पहले कपास के किसानों की खुदकुशी से चिंतित होकर किसानों की मदद के लिए की गई थी। बीजोत्सव में सुरक्षित व पौष्टिक खान-पान पर जोर दिया जाता है। देसी बीजों से रसायन मुक्त जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाता है। इसमें खेती को पशुपालन से जोड़ने की सोच है, ताकि मिट्टी को गोबर व केंचुआ खाद से उर्वर बनाया जाए और भोजन में पौष्टिकता भी बढ़े। बीजोत्सव का आयोजन किसानों को उचित जानकारी, एक-दूसरे से सीखने का अवसर, नई तकनीक, वैज्ञानिक जानकारी और परंपरागत बीजों का आदान-प्रदान के उद्देश्य से किया जाता है। इस कार्यक्रम में आसपास के गांवों की महिलाएं बड़ी संख्या में शामिल हुईं। महिलाओं ने अपने जैविक उत्पादों के स्टॉल भी लगाए थे। जैविक उत्पाद बेचते हुए उनकी आंखों में आत्मविश्वास की चमक दिखी।
इस कार्यक्रम में मिट्टी की उर्वरता बचाने पर जोर देते हुए कहा गया कि फसलों के अवशेष जलाने के बजाय उनसे जैविक खाद बनाई जाए। खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाए जाएं, जिससे खेतों में नमी बनी रहे, उनकी पत्तियों से जैव खाद भी बने। जलवायु परिवर्तन के दौर में पेड़ लगाना और भी जरूरी हो गया है। बीजोत्सव एक ऐसा मौका होता है, जब किसान और उपभोक्ता आपस में जुड़ते हैं। बीजोत्सव जैसे कार्यक्रम हमें जैविक खेती का मार्ग तो दिखाते ही हैं, नई तकनीकों की जानकारी भी देते हैं। बीजोत्सव का उद्देश्य खेती को स्वावलंबी, प्राकृतिक, विविधतापूर्ण, रसायनमुक्त, कम ऊर्जा व पूंजी एवं कम जोखिम वाली बनाना है। साथ ही इसका मकसद भोगवादी संस्कृति पर भी लगाम लगाना है, ताकि हम खेती, पर्यावरण संरक्षण के साथ बेहतर जीवन जी पाएं।सेवाग्राम में मिट्टी के घर, लकड़ी और छत खपरैल से बने हैं। वहां प्राकृतिक खेती, नई तालीम का स्कूल, खादी, चरखा और सादा रसोईघर है। कार्यक्रम में मिट्टी की उर्वरता बचाने पर जोर देते हुए कहा गया कि खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाएं जाएं, जिससे खेतों में नमी बने रहे, उनकी पत्तियों से जैव खाद भी बने। जलवायु बदलाव के दौर में पेड़ लगाना और भी जरूरी हो गया है।
---बाबा मायाराम