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व्यथित हैं, निराश नहीं

Mon, 01 Jun 2020 07:03 AM IST
Alok Mehta Alok Mehta
Updated Mon, 01 Jun 2020 07:03 AM IST
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Alok mehta editorial on corona Upset but not disappointed
कोरोना वायरस - फोटो : PTI

हजारों श्रमिक भाई गांवों की तरफ जा रहे हैं, कोरोना अब गांवों को अधिक तकलीफ में तो नहीं डाल देगा? एक समझदार मित्र की इस चिंता पर तत्काल मेरा उत्तर था, कतई नहीं। देश के विभिन्न हिस्सों से गांव जा रहे अधिकांश लोगबीमारी लेकर नहीं जा रहे और वैसे भी उनके कुछ दिन गांवों के आसपास रहने का इंतजाम है। इंतजाम से अधिक घर-परिजन के नजदीक पहुंचने से उनकी थकान, पीड़ा लगभग खत्म हो जाएगी। दूसरी महत्वपूर्ण ध्यान देने योग्य बात यह है कि महानगरों में रहने वाले इन लोगों ने तीस-चालीस दिन धैर्य रखा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर पहले एक दिन स्वयं कर्फ्यू लगाया और बाद में भी घर बैठे रहे।


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रोजी-रोटी, छत की कठिनाई, दिन-रात खाली रहने की पीड़ा झेली। वे गांवों की तरफ मुड़ने के बजाय यदि प्रधानमंत्री के दफ्तर-निवास, राष्ट्रपति भवन, संसद या किसी शीर्ष नेता, मुंबई में मुख्यमंत्री निवास या राजभवन की ओर मार्च करते और वहीं कहीं डेरा डाल देते, तो कौन-सी पुलिस या सुरक्षा कर्मी उन्हें हटा पाते! उनकी पीड़ा में विद्रोह नहीं, अपने घर में थोड़ा विश्राम और अपनों के बीच रहने से स्वस्थ-खुश रह सकने का विश्वास है। वे वहां अधिक आराम नहीं करेंगे, खेत-खलिहान में काम निकालेंगे या फिर हालत सुधरने पर देश-दुनिया में जहां काम मिल रहा होगा, रवाना हो जाएंगे।

अपने हाथ और साहस पर उन्हें शहर वालों के मुकाबले अधिक भरोसा है। महात्मा गांधी यही तो चाहते थे कि भारतवासी किसी पर निर्भर न हो। पिछले वर्षों में मोदी सरकार ने गांवों में बिजली, पानी, शौचालय, छोटा-मोटा अपना घर, रसोई गैस पहुंचाने का व्यापक अभियान चलाकर उनका आत्मविश्वास बढ़ा दिया है। इसमें शक नहीं कि कोरोना महामारी तथा अनिश्चितता के कारण घर जाने के लिए बैचैन हुए लाखों श्रमिकों के दर्द को भारतीय और पूर्वाग्रही विदेशी मीडिया ने अधिकाधिक दिखाया, लिखा, छापा, सत्ता या प्रतिपक्ष के नेताओं ने चिंताएं व्यक्त कीं, केंद्र और अधिकांश राज्य सरकारों ने यथासंभव सहायता एवं रियायतों के कदम उठाए।

संभवतः यही कारण है कि हाल के अंतरराष्ट्रीय सर्व में विश्व के संपन्न महाशक्तिशाली देशों, अमेरिका और रूस केराष्ट्रपतियों-डोनाल्ड ट्रंप एवं ब्लादिमीर पुतिन की तुलना में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अधिक लोकप्रिय पाए गए हैं। यह सर्वे अमेरिका की मॉर्निंग कंसल्ट कंपनी का है। कंपनी का सर्वे यह कहता है कि पिछले महीनों में मोदी की अति स्वीकार्यता ( हाई अप्रूवल रेटिंग ) 80 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। ट्रंप साहब को तो आने वाले महीनों में होने जा रहे चुनाव में पराजय का खतरा हो गया है और दुनिया ही नहीं, उनके देश में भी चीन के साथ उन्हें बहुत कोसा जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ अनेक देशों ने खुलकर भारत द्वारा महामारी से निपटने के लिए उठाए गए कदमों की सराहना की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को अपने कार्यकारी बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया है। भारतीयों को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि कोरोना के जीवाणु से बचाव के लिए अमेरिका, ब्रिटेन में वैक्सीन तैयार करने की कोशिशों में लगे विशेषज्ञों व डॉक्टरों की टीम में एक न एक भारतीय जरूर है। इसी तरह ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के अस्पतालों में भारतीय डॉक्टर कोरोना के मरीजों की जान बचाने में लगे हुए हैं। कुछ की जान तक चली गई है।

संकट की इस घड़ी में गांधी के साथ आचार्य विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण और चंद्रशेखर का ध्यान आता है। उन नेताओं ने देश भर में कितनी पदयात्राएं कीं, हजारों लोग साथ चलते रहे। आज देश में ऐसा कोई प्रमुख नेता सामने क्यों नहीं दिखाई दिया, जो अपनी ईमानदार और सेवा भाव वाली छवि से इतना मान्य-स्वीकार्य हो, जो महानगरों से दुखी होकर पैदल, रिक्शे, साइकिल, ट्रक, टैम्पो, रेल की पटरी के किनारे-किनारे, बस, ट्रेन से भाग रहे लोगों को समझाते, उनका दर्द सहलाते, उन्हें धैर्य बंधाते, उन्हें जान जोखिम में डालने से रोक पाते या फिर गांधीवादी तरीके से सौ-पचास युवाओं को लेकर स्वयं भीड़ का नेतृत्व करने लगते?

गांवों के लोग तो पैदल चलने के अभ्यस्त होते हैं, लेकिन उन्हें कोई सही सड़क, पगडंडी पर चलाता, जिसे देखकर रास्ते में पड़ने वाले शहरी-ग्रामीण खुद रात बिताने, रूखा-सूखा ही सही, कुछ खिलाने और पानी पिलाने का इंतजाम करते। राहुल गांधी ने दिल्ली से उत्तर प्रदेश की ओर जा रहे लोगों से मिलकर अपनी बातें प्रचारित कीं और आलोचना होने पर दावा अवश्य किया कि अनुमति मिलने पर वह मजदूरों के साथ पैदल जा सकते हैं। यह भी बयान माना जाएगा।जनता
पार्टी के राज में दलित अत्याचार को लेकर इंदिरा गांधी बिहार के दुर्गम इलाके में हाथी पर बैठकर निकल गई थीं।

उन्होंने किसी की अनुमति का इंतजार नहीं किया था। वैसे सरकारों से अधिक विभिन्न स्वयंसेवी या राजनीतिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं ने जगह-जगह प्रबंध भी किए। दिल्ली के एक सामान्य से किसान ने अपने दस मजदूरों को हवाई जहाज से घर भिजवा दिया। फिल्मी हस्ती सोनू सूद ने मुंबई से मजदूरों को भेजने के लिए स्वयं अनेक बसों का इंतजाम कर दिया। इस संदर्भ में जयप्रकाश जी की एक बात ध्यान में आती है। वह 1958 में यूरोप की यात्रा पर गए थे। वहां वह गांधीवादियों से मिले और महसूस किया कि वे लोग अपने सेवा कार्य के लिए सरकारी सहायता की अपेक्षा नहीं रखते।

यात्रा से लौटने के बाद जेपी ने सांसदों की एक बैठक बुलाई और कहा, 'केवल विपक्ष के होने से लोकतंत्र को कोई गारंटी नहीं मिल जाती। लोकतंत्र को गारंटी मिलेगी लोगों के लोकतंत्र में भरोसे से, लोगों की सहभागिता और विकास से, उनकीआर्थिक प्रगति से।' उनकी यह सलाह आज भी सार्थक है। सत्ता व्यवस्था सही काम करे, प्रतिपक्ष अपना सही दायित्व निभाए, लेकिन संकट में सही ढंग से करोड़ों लोगों का आत्मविश्वास बढ़ाए। बहरहाल, हम जैसे लोग व्यथित होने के बावजूद आशावादी हैं। करोड़ों लोगों की विश्वास शक्ति ही हर संकट से निकाल कर भारत को प्रगति की राह पर तेजी से आगे ले जाएगी।

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