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क्षेत्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी

Wed, 22 Oct 2014 02:21 AM IST
जगदीश उपासने
जगदीश उपासने Updated Wed, 22 Oct 2014 02:21 AM IST
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Alarm for regional parties

महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की आश्चर्यजनक उपलब्धि की वजहें समझने के लिए इस साल हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों पर फिर से गौर करना समीचीन होगा। खास तौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा में भाजपा की दनदनाती विजय और पश्चिम बंगाल तथा तमिलनाडु में उसके दमदार प्रवेश में पार्टी की दीर्घकालीन रणनीति के संकेत साफ तौर पर देखे जा सकते थे। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के युद्धघोष को उनका अहंकार या लोकतंत्र-विरोधी रवैया कहकर कोसने वालों ने इस रणनीति के निहितार्थ को शायद ही गंभीरता से लिया होगा। ये निहितार्थ क्या हैं? नए, तेजी से मध्यवर्ग में बदलते और उम्मीदों-अरमानों से भरे युवा भारत के लिए अप्रासंगिक होती जा रही कांग्रेस से छुटकारा पाने का इस जोड़ी का रणघोष दरअसल उस विशाल मतदाता वर्ग की भावनाओं की ही अभिव्यक्ति है, जिसे भारत की कांग्रेस-आधिपत्य वाली राजनीति के घिसे-पिटे मुहावरे बहुत अपील नहीं करते। इसलिए भाजपा की चुनावी रणनीति का पहला और स्वाभाविक लक्ष्य वह दुर्ग ढहाना है, जो अपने ही बोझ तले चरमरा रहा है।

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लेकिन मोदी-शाह जोड़ी का कांग्रेस से मुक्ति का यह लक्ष्य तब तक पूरा होना संभव नहीं, जब तक फर्जी स्थानीय अस्मिताओं की भावनाओं की सवारी गांठकर राज्यों की सत्ता में काबिज होने वाली क्षेत्रीय पार्टियों से भी छुटकारा न पा लिया जाए। इनमें से कई क्षेत्रीय दलों की ताकत से कांग्रेस को न केवल केंद्र में सत्ता की संजीवनी मिलती रही, बल्कि इनमें से कुछ उसी की कोख से जन्मी हैं। केंद्रस्थान तथा उसकी परिधि, दोनों को नगण्य किए बगैर भाजपा 'सबका साथ, सबका विकास' के एजेंडे को शायद ही पूरा कर पाए। भाजपा के 'सबका साथ' में ज्यादा जोर समाज के उस हिस्से पर है, जो उसका या तो परंपरागत समर्थक नहीं है या फिर उससे दूरी रखता रहा है। लोकसभा चुनाव में बसपा के दलित वोटों और बिहार में महादलित तथा छोटी ओबीसी जाति-वर्गों का भाजपा की तरफ खिसकना उसकी अपील के असर की बानगी देता है।
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लेकिन कांग्रेस-संस्कृति से इतर उग्र क्षेत्रीय या जातीय अस्मिता वाली शिवसेना, इनेलो जैसे क्षेत्रीय दलों को नाथने के लिए पार्टी को ज्यादा आक्रामक रणनीति अपनाने की जरूरत थी। लोग भले ही महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन तोड़ने का सोचा-समझा जोखिम उठाने का श्रेय वर्तमान राज्य-केंद्र भाजपा नेताओं को देते हों, पर महाराष्ट्र भाजपा में बाला साहेब ठाकरे के जीवित रहते भी इसकी संभावनाएं राज्य तथा केंद्र के भाजपा नेता तलाशते रहे थे। आखिर भाजपा ने विदर्भ और उत्तर महाराष्ट्र में अपना आधार बाला साहेब के रहते ही मजबूत किया। लेकिन तब पार्टी के पास बहुमत की ताकत नहीं थी। केंद्र में अपने बूते बहुमत और लंबे अरसे बाद मोदी जैसा सार्वजनीन नेता आते ही भाजपा क्षेत्रीय दलों की सियासी ठेकेदारी पर लगाम लगाने में जुट गई। हरियाणा में तो पिछले 10 वर्षों से अकेले लड़ते हुए पार्टी ने 'जीटी-रोड पार्टी' की तोहमत से छुटकारा पाने के लिए सभी क्षेत्रों और सभी वर्गों में अपनी पैठ बढ़ाने पर जोर लगाया। दूसरे दलों से लिए गए प्रभावी हलकाई या जातिगत नेताओं से सजी इस सेना को मोदी जैसे किसी महारथी की ही दरकार थी।
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क्षेत्रीय और जातीय अस्मिताओं के दिखावटी तेवर समाज के हर तबके के युवा मतदाता के लिए बेमानी होते जा रहे हैं, यह बात न तो शिवसेना समझ सकी, न उसकी सहोदर मनसे। पवार और उद्धव ठाकरे को प्रचार के दौरान ही अंदाज हो गया था कि भाजपा क्षेत्रीय अस्मिता के सिक्के को खोटा साबित करने पर उतारू है। उधर मोदी हर सभा में अपनी यह टेक दोहरा रहे थे : 'न प्रांतवाद, न जातिवाद, न भाषावाद, सिर्फ विकासवाद, और विकासवाद।' यह ऐसा अस्त्र है, जिसका तोड़ पुराने खांचों तक सीमित क्षेत्रीय-प्रांतीय दलों के लिए ढूंढना मश्किल है, जिनकी सारी राजनीति कुछ जाति-वर्गों के गठजोड़ और पार्टी प्रमुख के वंश के आधार पर चलती रही है। और जिन्हें केंद्र में लूली-लंगड़ी सरकारों को समर्थन के एवज में अभयदान मिलता रहा है। पिछले तीन-साढ़े तीन दशकों से यह राजनीति खासी परवान चढ़ी, लेकिन इससे देश के प्रमुख राज्यों में सर्वांगीण विकास को ग्रहण लगा। उत्तर और दक्षिण भारत के प्रमुख क्षेत्रीय दलों के कर्ताधर्ताओं के भ्रष्टाचार के किस्सों से लोग आजिज थे।


महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की अकेले-दम सफलता से ऐसे क्षेत्रीय दलों में घबराहट फैलना लाजिमी है। झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव भाजपा का अगला निशाना होंगे, जहां पार्टी सत्ता की गंध सूंघ रही है। जम्मू-कश्मीर में इस साल के अंत में या अगले साल संभावित चुनाव में शाह संगठन को मजबूत बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहेंगे। पीडीपी का चुनावी सहयोग इसमें मददगार हो सकता है। 2016 में असम, जहां भाजपा की संभावनाएं हैं, पार्टी पूरी ताकत झोंक सकती है। इसी वर्ष तमिलनाडु, केरल तथा पुड्डुचेरी में भी चुनाव हैं। इनमें पार्टी बड़ा दांव लगाना चाहेगी। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी भाजपा के 'अप्रत्याशित उभार से अभी से हलकान हैं। भाजपा के बढ़ते प्रभाव का असर ही है कि माकपा तक सीमावर्ती जिलों में आए बांग्लादेशियों में से हिंदुओं को 'धार्मिक उन्माद' के शिकार मानकर उनके प्रति अलग रवैया अपनाने की बात कहने को विवश है। यानी क्षेत्रीय दलों के एजेंडे की पोल खोलकर भाजपा अपना एजेंडा तय कर सकती है। ऐसे में अगर प्रधानमंत्री मोदी चुनावी सभाओं में उठाए गए मुद्दों और आश्वासनों पर आधा भी अमल कर सके, तो भाजपा वंश-आधारित क्षेत्रीय दलों को हाशिये पर ले जाकर सबल और संपूर्ण राष्ट्रीय राजनीति की शुरुआत करने में सफल हो सकती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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