{"_id":"5e1a2b138ebc3e87cb39d60e","slug":"akbar-padamsee-used-to-spend-his-time-in-study-and-meditation","type":"story","status":"publish","title_hn":"एक चिंतक चित्रकार का जाना","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
एक चिंतक चित्रकार का जाना
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अकबर पदमसी (फाइल फोटो)
अकबर पदमसी (12 अप्रैल, 1928-6 जनवरी, 2020) उन चिंतक चित्रकारों में से थे, जो जीवन पर्यंत अपना समय अध्ययन-मनन और कला रचना में लगाते थे। नए प्रयोग भी करते थे और जिनकी रुचि, अपनी अभिव्यक्ति के लिए, एक से अधिक माध्यमों में बनी रहती थी। वह चित्रकार होने के साथ फिल्मकार भी थे। वह उन कलाकारों में से भी थे, जो अपने सामने कला के उच्चतम मानदंड रखते हैं। जीवन-यथार्थ को उलट-पुलट कर कई तरह से जांचते-परखते हैं, और सौंदर्य के नए प्रतिमान गढ़ते हैं। अत्यंत संवेदनशील अकबर हमेशा नए चित्रकारों के काम में भी गहरी दिलचस्पी लेते रहे, उन्हें प्रोत्साहित करते रहे। उनके काम संकलित भी करते रहे।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
अकबर पदमसी को आकृति-रचना में, चेहरों के अंकन-रेखांकन में विशेष रुचि रही, साथ ही वह अपने सैटों (लैंडस्केप्स) के लिए भी जाने जाते रहे-अपने चित्रकार-कथाकार मित्र रामकुमार की तरह। उनकी पीढ़ी ने आधुनिक भारतीय कला में अपना विशिष्ट योगदान किया है, इसी पीढ़ी के तो थे मकबूल फिदा हुसेन, फ्रांसिस न्यूटन सूजा, सैय्यद हैदर रजा, तैयब मेहता, बी. एस. गायतोंडे। रामकुमार का उल्लेख हम कर ही चुके हैं। इस पीढ़ी के प्रायः सभी कलाकारों को 90 वर्ष के पार की आयु मिली, और उनकी क्रियाशीलता ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। कृष्ण खन्ना भी इसी पीढ़ी के हैं।
अकबर पदमसी का अधिकतर जीवन मुंबई में बीता। 1950 में बस कला-शिक्षा के लिए पेरिस गए। यही वह समय था, जब रजा और रामकुमार भी पेरिस में रहकर कला के आधुनिकतम रूपों के बीच अपना रास्ता ढूंढ रहे थे-साथ ही अपने भारतीय परिवेश के प्रति भी सतत जागरूक बने हुए थे। यह अकारण नहीं है कि अनंतर अकबर पदमसी ने संस्कृत सीखी, उपनिषदों का अध्ययन किया, 'मेटास्केप्स' चित्रों की रचना की। उनकी रेखाओं की बारीकियां, उनके रंगों की विन्यस्त, चिंतनशीलता और उनकी कृतियों का विशिष्ट वास्तुशिल्प मन पर अपनी बहुत अच्छी छाप छोड़ने वालों में से हैं।
मेरा सौभाग्य कि उन्हें कुछ निकट से देखने-जानने का सुअवसर मिला। भारत भवन के रूपंकर संग्रहालय के लिए जब उसके निदेशक, ख्यातनाम चित्रकार, कला चिंतक जे. स्वामीनाथन लोक आदिवासी कला के संग्रह में लगे हुए थे, तो उनके साथ सप्ताह भर बस्तर आदि अंचलों में अकबर और मैं भी जीप में यात्रा कर रहे थे। अकबर का व्यक्तित्व सौम्य था। आंखें हमेशा कुछ ढूंढती हुई-सी लगती थीं। वह अपने में प्रायः डूबे हुए लगते थे, पर कला चर्चा के वक्त उनका सच्चा कला-रसिक रूप सामने आ जाता था। किसी कला-प्रश्न पर उन्हें कुछ कहते हुए सुनना एक विचारोत्तेजक अनुभव बन जाता था।
उनका एक घर-स्टूडियो मुंबई में था, दूसरा थाणे में, जहां वह शनिवार-रविवार को प्रायः चले जाया करते थे। एक बार मेरा वहां भी जाना हुआ-उनसे और उनकी दूसरी पत्नी भानुमति से मिलना भी। (उनकी पहली पत्नी फ्रेंच थीं।) जब मैं पहुंचा तो दोपहर बीत रही थी। जब वहां से उठा, तो शाम हो चुकी थी-कला चर्चा का, पुरानी स्मृतियों का एक सिलसिला बना ही रहा।
उनके न रहने पर एक बार फिर उनकी कृतियां याद आती हैं, जिन्हें भारत भवन, भोपाल, राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय आदि में देखता रहा हूं-और उन प्रदर्शनियों में भी, जो दिल्ली की आर्ट हेरिटेज आदि कला-दीर्घाओं में लगती रही हैं। ठीक ही उनके उन चित्रों की याद विशेष रूप से की जाती है, जिनमें उन्होंने प्राकृतिक उपादानों की जगहें बदल दीं-नीली जल धाराएं ऊपर दिखीं और आकाश नीचे। और उनकी चित्रित मुखाकृतियां-वे जीवन के अंतरंग, अनकहे रह जाने वाले भावों को अपने में समाहित किए हुए लगती हैं। और सोचती हुई-सी वे मुखाकृतियां हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि जीवन के रंग-रूप भला एक से कहां होते और रहते हैं।