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उड्डयन: हवाई किराया आसमान पर, जरूरी है विमानन कंपनियों में प्रतिस्पर्धा को बनाए रखना
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विस्तार
पिछले कुछ समय से घरेलू उड़ान सेवा में किराये लगातार बढ़ते जा रहे हैं। दिल्ली-मुंबई का अधिकतम हवाई किराया 20,000 रुपये तक पहुंच गया, जो पहले मात्र 7,000 रुपये ही होता था। शेष मार्गों पर भी किराये में वृद्धि के संकेत मिल रहे हैं, जिससे यात्रियों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद किरायों में कुछ कमी देखने को तो मिल रही है, पर अब भी हवाई किराया काफी अधिक हैं। कोविड के बाद यात्रियों की आवाजाही में वृद्धि हुई है। विगत 30 अप्रैल को 4.56 लाख यात्रियों द्वारा अंतर्देशीय हवाई यात्रा का रिकार्ड बना। हवाई यात्रियों की मासिक संख्या 1.2 से 1.3 करोड़ बनी हुई है।
पिछले दो दशकों में हवाई किराये में खासी कमी के चलते रेल में सफर करने वाले अनेक यात्री हवाई यात्रा करने लगे हैं। दिल्ली-मुंबई का एसी प्रथम दर्जे का राजधानी गाड़ी में रेल किराया 4,730 रुपये है, जबकि समय पर बुकिंग करने पर हवाई किराया सामान्यतः उससे कम ही बैठता था। लिहाजा अनेक लोग रेल के बजाय हवाई यात्रा को प्राथमिकता देने लगे थे। पर किराया बढ़ने से बहुत लोग फिर रेल यात्रा को प्राथमिकता दे सकते हैं। इससे नागरिक उड्डयन क्षेत्र का विकास बाधित हो सकता है।
एअरपोर्ट काउंसिल इंटरनेशनल (एशिया पेसिफिक) की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय हवाई किराये में भी 50 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हवाई किराये में सर्वाधिक वृद्धि 41 प्रतिशत थी, जबकि संयुक्त अरब अमीरात में यह वृद्धि 34 प्रतिशत, सिंगापुर में 30 फीसदी और ऑस्ट्रेलिया में 23 प्रतिशत रही।
विमान किराये में वृद्धि के दो प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं-पहला, ईंधन की कीमत बढ़ना, और दूसरा, महंगाई दर में वृद्धि। वर्ष 2019 से अब तक ईंधन की कीमत में 76 फीसदी वृद्धि हो चुकी है, जबकि विमानन कंपनियों की अन्य लागतें 10 प्रतिशत महंगाई की दर से बढ़ रही हैं। हालांकि एअरपोर्ट काउंसिल इंटरनेशनल का मानना है कि विमानन कंपनिया सीट उपलब्धता सीमित रख कीमतें ऊंची रखने का प्रयास कर रही हैं। कंपनियों का यह कृत्य विमानन उद्योग में वृद्धि को प्रभावित कर सकता है।
भारत में घरेलू विमानन क्षेत्र में कई कंपनियां हैं। फरवरी, 2023 में 55.9 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ पहले स्थान पर इंडिगो, जबकि दूसरे और तीसरे स्थान पर टाटा समूह की एअर इंडिया और विस्तारा थीं, जिनकी बाजार में हिस्सेदारी क्रमश: 8.9 प्रतिशत और 8.7 फीसदी थी। हालांकि एअर इंडिया और विस्तारा जल्दी ही मिलकर एक इकाई बनने वाली हैं, उसके बावजूद वे मिलकर इंडिगो के लगभग एक तिहाई से थोड़ा अधिक हो पाएंगी। चौथे और पांचवें स्थान पर क्रमशः गो फर्स्ट और स्पाइसजेट दो एयरलाइन्स हैं, जिनकी बाजार में हिस्सेदारी 8.0 प्रतिशत और 7.1 प्रतिशत रही। पर इन दोनों को चुनौतियों का सामना कर पड़ रहा है।
गो फर्स्ट सिर्फ वित्तीय कठिनाइयों से ही नहीं गुजर रही, उसकी दिवालिया प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। हालांकि उसकी कठिनाइयों के पीछे वित्तीय कारणों से ज्यादा तकनीकी कारण हैं, जिसके लिए इंजन आपूर्ति करने वाली कंपनी प्रैट ऐंड विटनी इंजन्स जिम्मेदार है। एअरबस ए-320 नियो हवाई जहाज के लिए यह कंपनी इंजनों की आपूर्ति करती है। पिछले कुछ समय से इस कंपनी द्वारा दिए गए इंजनों की खराबी के कारण गो-फर्स्ट को अपने कई हवाई जहाज हटा लेने पड़े। इससे कंपनी भारी नुकसान में चली गई। विगत तीन मई से गो फर्स्ट ने अपनी सभी उड़ानें स्थगित कर दिवालिया होने का आवेदन जमा किया है।
स्पाइसजेट कंपनी भी आर्थिक मुश्किलों से गुजर रही है। यह एअरलाइन जहाजों में कई तकनीकी गड़बड़ियों से जूझ रही है और इसके लिए नागरिक उड्डयन महाप्रबंधक ने कंपनी को अपने 10 बोइंग-737 मैक्स जहाजों को उड़ानों से हटा लेने का निर्देश दिया है। पिछले वित्त वर्ष (2022-23) की पहली तिमाही से इस कंपनी का नुकसान में जाना शुरू हो चुका था। ईंधन की बढ़ती लागत, मुद्रास्फीति और रुपये के अवमूल्यन से यह कंपनी लगातार घाटे से जूझ रही है और इसकी सेवाएं बाधित हो रही हैं।
इंडिगो और टाटा समूह की एअर इंडिया, विस्तारा और एअर एशिया सरीखी बड़ी कंपनियों को स्पाइसजेट और गो फर्स्ट टक्कर देती थीं। पर इन कंपनियों के मुश्किल में पड़ने से इंडिगो व टाटा समूह की कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा घट गई है, ऐसे में, ये अनाप-शनाप रूप से हवाई किराया बढ़ा रही हैं।
नागरिक विमानन क्षेत्र में निजी क्षेत्र के प्रवेश के बाद हवाई किरायों का निर्णय विमानन कंपनियों पर छोड़ा गया, ताकि वे बाजार के अनुसार कीमतें तय करें, उन्हें बेवजह घाटा न सहना पड़े और विमानन क्षेत्र का स्वस्थ विकास हो। एक समय विमानन कंपनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते हवाई किराये किफायती बने रहे और नागरिक उड्डयन क्षेत्र का स्वस्थ विकास हुआ। हाल ही में एअर इंडिया द्वारा 550 नए विमानों सहित भारतीय विमानन कंपनियों द्वारा 1,000 विमानों के ऑर्डर ने दुनिया को अचंभित कर दिया था। यह हमारे नागरिक उड्डयन क्षेत्र की विकास गाथा के बारे में बताता है।
पर दो प्रमुख विमानन कंपनियों की आर्थिक कठिनाइयों से नागरिक उड्डयन क्षेत्र में संकट आया है। पिछले काफी समय से सरकार द्वारा आर्थिक संकट में फंसी कंपनियों के प्रमोटरों को जल्द निजात दिलाने के लिए दिवालिया कानून में बड़े बदलाव करते हुए इस प्रक्रिया को आसान बना दिया गया है। पर विमानन क्षेत्र की स्थिति अलग है। यदि गो फर्स्ट और स्पाइसजेट दिवालिया होती हैं, तो विमानन क्षेत्र में इंडिगो और टाटा समूह का एकाधिकार हो जाएगा। ऐसे में, पिछले दो दशकों से विमानन क्षेत्र में विकास और प्रतिस्पर्धा का जो लाभ आम जन को सस्ती हवाई यात्रा के रूप में मिल रहा था, वह खत्म हो जाएगा।
पूर्व में एअर इंडिया के सावर्जनिक क्षेत्र में होने के कारण हवाई यात्रा में प्रतिस्पर्धा का लाभ जनता को मिल रहा था। अब चूंकि एअर इंडिया टाटा समूह का हिस्सा है, ऐसे में, प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए गो फर्स्ट और स्पाइसजेट को बचाना और भी जरूरी हो गया है। चूंकि ये कंपनियां बहुराष्ट्रीय विमान व इंजन निर्माताओं की कोताही के कारण संकट में हैं, ऐसे में, सरकार द्वारा इस मामले में दखल जरूरी है।