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अभिमत: रोजमर्रा की चुनौतियों पर भी बात हो, शक्तिशाली नेतृत्व और सियासत में छूट न जाएं वायु प्रदूषण जैसे मुद्दे

Tue, 20 Feb 2024 07:14 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Tue, 20 Feb 2024 07:14 AM IST
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सार
विभिन्न सर्वे बताते हैं कि मोदी सरकार को तीसरा कार्यकाल मिलना तय है। शक्तिशाली नेतृत्व में काम कर रही पार्टी के पिछले कुछ वर्षों का  प्रदर्शन देखें, तो इसमें कोई संदेह भी नहीं होता। लेकिन वायु प्रदूषण जैसे कुछ मुद्दे इन चर्चाओं में पीछे न छूटें यह भी जरूरी है।
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air pollution issue in political discourse vital deliberation on daily challenges important
दमघोंटू हवा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए हैं और राजनीतिक पंडितों के लिए संभवतः आनंद के दिन हैं। ज्यादातर राजनीतिक पंडितों की राय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीसरा कार्यकाल मिलने के साथ भाजपा की स्थिति शानदार रहेगी। इसकी मुख्य वजह मोदी सरकार के कामकाज को बताया जा रहा है। जी-20 की अध्यक्षता, राम मंदिर का निर्माण, आतंकी घटनाओं पर अंकुश, अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ता दबदबा, महिला आरक्षण विधेयक को मंजूरी आदि ऐसे विषय हैं, जिनके कारण सरकार की साख बढ़ी है। पिछले दस वर्षों में 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं, यह मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि है।


शक्तिशाली नेतृत्व में काम कर रही पार्टी के पिछले कुछ वर्षों का प्रदर्शन देखें, तो इसमें कोई संदेह भी नहीं होता। एक प्रमुख व्यावसायिक अखबार, यूगोव इंडिया और दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सहयोग से किए गए एक हालिया सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं से पूछा गया कि वे विशिष्ट क्षेत्रों में सरकार द्वारा किए गए काम से कितने संतुष्ट हैं। अखबार ने बताया कि ‘करीब 70 फीसदी लोगों ने सितंबर, 2023 में सरकार द्वारा जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी पर संतुष्टि व्यक्त की, लगभग उतने ही लोग आतंकवादी हमलों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार से संतुष्ट थे। दो-तिहाई लोगों ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की सराहना की। 63 फीसदी लोग संसद और विधानसभाओं में लंबे समय से लटके महिला आरक्षण विधेयक पारित होने से संतुष्ट थे, और 60 फीसदी लोगों ने चीन के साथ सीमा विवादों से निपटने पर संतुष्टि जाहिर की।’


इस ऑनलाइन सर्वेक्षण में 200 से अधिक शहरों और कस्बों से 12 हजार से अधिक उत्तरदाता शामिल हुए थे। लगभग 44 फीसदी उत्तरदाताओं का जन्म 1996 के बाद हुआ था, और 40 फीसदी का जन्म 1981 से 1996 के बीच हुआ था।

टेलीविजन चर्चाएं भी भाजपा और उसके सहयोगियों की बढ़त और मौजूदा रणनीतिक चालों पर केंद्रित होती हैं, जो चुनावी मौसम का अभिन्न अंग हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये चर्चाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन प्रमुख चर्चा से ऐसे कई मुद्दे गायब हैं, जो आम भारतीयों के लिए बेहद चिंता का विषय हैं और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को छोड़कर सभी के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करते हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि केवल रेटिंग एजेंसी या आर्थिक सलाहकार ही यह तय नहीं करते कि अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में है या नहीं। यह तय करने में जनता की भी राय होनी चाहिए। जो भी व्यक्ति देश में घूमता है, वह इन समस्याओं का अनुभव करेगा। उनके पास अपने जीवंत अनुभव होंगे और अगर वे अपनी आंखें खुली रखें, तो देख सकते हैं कि उनके आसपास क्या हो रहा है।

प्रदूषित हवा भी एक गंभीर मुद्दा है। हममें से अधिकांश लोग प्रदूषित हवा में सांस लेने के लिए बाध्य हैं। देश की 85 फीसदी से अधिक आबादी उन इलाकों में रहती है, जहां वायु प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से अधिक है, जिससे औसत जीवनकाल में पांच वर्ष से अधिक की कमी होती है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के जीवन में तो औसतन 11.9 साल की कमी होती है।

सरकार ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम शुरू किया, जिसका लक्ष्य 131 ‘नॉन-एटेनमेंट' शहरों (पांच वर्षों से भी ज्यादा समय से वायु गुणवत्ता के राष्ट्रीय मापदंडों पर खरे न उतर पा रहे शहर) में पांच वर्षों के भीतर पीएम 2.5 के जोखिम स्तर को 20-30 फीसदी तक कम करना है। सवाल यह है कि इस कार्यक्रम को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? हम इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं कि निचले पायदान पर रहने वाले अल्प शिक्षित लोगों के लिए यह कितना कठिन है? हम उन लोगों के लिए टूटी सड़कों, खराब शिक्षा प्रणाली की बात क्यों नहीं कर रहे हैं, जिनके पास पैसा, नागरिक सुविधाएं और जीवन की गुणवत्ता का अभाव है? हम भारत के गांवों और शहरों में रोजमर्रा की चुनौतियों के बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं? हम रोजगार की स्थिति के बारे में बात क्यों नहीं करते, जो हर संकट से निकलने में सक्षम, बेहद संपन्न और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को छोड़कर हर भारतीय के लिए चिंता का विषय है?
एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति के रूप में, मैं भूखी नहीं सोती और अपना भरण-पोषण करने के लिए गंदे और खतरनाक काम करने के लिए भी  मजबूर नहीं हूं। मैं भाग्यशाली हूं, लेकिन प्रत्येक भारतीय के पास यह विकल्प या विशेषाधिकार नहीं है।

हाल ही में एक शाम जब मैं बाजार से घर लौट रही थी, अचानक मेरी बात एक युवा से हुई, जो कचरा संग्रहण केंद्र में कूड़ा-कचरा छान रहा था। वह पूर्वी भारत से आया प्रवासी है, जिसने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की है। उसकी तीन बेटियां हैं। उसे 8,000 रुपये के मासिक वेतन पर सुरक्षा गार्ड की नौकरी करने या हर दिन कचरा इकट्ठा कर कचरा व्यापारी के पास बेचने के विकल्प के बीच चुनाव करना था। उसने बाद वाला विकल्प चुना। हालांकि इसमें जोखिम ज्यादा था, लेकिन कमाई भी अधिक थी। उसने बताया कि कभी-कभी वह पांच सौ रुपये या उससे अधिक की कमाई कर लेता है।

मैंने उसे नंगे हाथों और बिना मास्क के कचरा उठाते देखा। उसने बताया कि उसे उन सब चीजों की जरूरत नहीं है, वह काफी मजबूत है। उसकी मां की उम्र की होने के नाते मैंने उसे सलाह दी कि यदि उसे यही काम करना है, तो वह मास्क और दस्ताने पहने। वह मुस्कुरा उठा। यह दक्षिण दिल्ली की कहानी है। वह युवक भारतीय है। सीमित शिक्षा और कौशल के साथ अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उसके पास क्या विकल्प हैं? हम उसके जैसे युवाओं का जीवन स्तर ऊपर उठाने के लिए क्या कर रहे हैं? कई लोग गरीबी और अभाव से उबर चुके हैं, लेकिन कई अब भी बचे हैं।

हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि देश में बेरोजगारी में कमी आई है, लेकिन हम अब भी भारत के कई राज्यों के युवाओं के निर्माण कार्यों के लिए युद्धग्रस्त इस्राइल जाने के बारे में सुनते हैं, जहां उन्हें बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। क्या हम भारत में उनके लिए बेहतर व्यवस्था कर सकते हैं? आने वाले लोकसभा चुनावों की चर्चा में ये मुद्दे इतने गौण क्यों हैं? इन मुद्दों पर भी चर्चा होनी चाहिए।
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