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एयर इंडिया को बेचने का लक्ष्य, क्या महाराजा के दिन फिरेंगे

Wed, 07 Apr 2021 10:13 AM IST
सतीश सिंह सतीश सिंह
सतीश सिंह Published by: सतीश सिंह Updated Wed, 07 Apr 2021 10:13 AM IST
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Air India: will Maharaja's day will change
एयर इंडिया - फोटो : Air India

सरकार ने इस साल के अंत तक एयर इंडिया को बेचने का लक्ष्य रखा है। इसके तहत अगले महीने मई में सरकार खरीदार को चुनेगी और छह महीने के भीतर एयर इंडिया के प्रबंधन को नए खरीदार को सौंप दिया जाएगा। एयर इंडिया को खरीदने के  लिए बोली लगाने के लिए टाटा समूह और स्पाइसजेट को चुना गया है। एक अनुमान के अनुसार, एयर इंडिया की बिक्री के लिए वित्तीय निविदा में शामिल होने की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी। एयर इंडिया की वित्तीय स्थिति के विश्लेषण के बाद टाटा समूह और स्पाइसजेट वित्तीय बोली लगाएंगे। वित्तीय बोली में इन्हें बताना होगा कि वे एयर इंडिया के कितने ऋण का भुगतान


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करेंगे। वर्तमान परिस्थितियों में, इन दोनों में से जो कोई भी एयर इंडिया के लिए अधिकतम राशि की बोली लगाएगा, वही एयर इंडिया का मालिक बनेगा। 

मार्च, 2020 तक एयर इंडिया की कुल शुद्ध संपत्ति 45,863.27 करोड़ रुपये थी। इनमें भूमि, भवन, विमान बेड़े, अन्य अचल और अमूर्त संपत्ति शामिल हैं। वित्त वर्ष 2019-20 के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, एयर इंडिया का कुल कर्ज 38,366.39 करोड़ रुपये है। हालांकि, एयर इंडिया पर कर्ज का ज्यादा बोझ था, पर वित्त वर्ष 2020 में एयर इंडिया एसेट्स होल्डिंग लिमिटेड में एयर इंडिया के 22,064 करोड़ रुपये के ऋण का हस्तांतरण कर दिया गया था। चालू वित्त वर्ष में भी एयर इंडिया को 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है। इस तरह, एयर इंडिया का कर्ज बढ़कर 48,366.39 करोड़ रुपये हो सकता है। एयर इंडिया को खरीदने का सबसे मजबूत दावेदार टाटा समूह है। इस दौड़ में स्पाइस जेट भी शामिल है, लेकिन  टाटा समूह की तुलना में आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण उसे एयर इंडिया का अंतिम खरीददार नहीं माना जा रहा है। 

उल्लेखनीय है कि टाटा समूह और स्पाइसजेट के अलावा, एस्सार समूह, पवन रुइया की कंपनी डनलप और फाल्कन टायर्स ने भी इसे खरीदने के लिए अभिरुचि पत्र जमा किए थे, पर ये बाद में खरीद प्रक्रिया से बाहर हो गए। टाटा समूह एयर एशिया इंडिया के माध्यम से अपनी बोली लगा सकता है, जिसमें उसकी बड़ी हिस्सेदारी है। स्पाइसजेट ने भी अधिग्रहण के लिए कुछ योजनाएं बनाई हैं, लेकिन उनका खुलासा नहीं किया गया है। टाटा समूह ने मूल रूप से वर्ष 1932 में एयर इंडिया की स्थापना की थी, पर वर्ष 1953 में भारत सरकार ने इसका अधिग्रहण कर लिया था। माना जा रहा है कि एयर इंडिया को खरीदने के बाद टाटा समूह का विमानन क्षेत्र में दबदबा बढ़ जाएगा, क्योंकि टाटा समूह के प्रति आमजन का अटूट भरोसा है। 

गौरतलब है कि पिछले 20 वर्षों से एयर इंडिया को बेचने की कोशिश सरकार कर रही है। शुरू में, सरकार इसकी 20 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचना चाहती थी। इतना ही नहीं, पिछले वर्ष 31 अगस्त तक एयर इंडिया को खरीदने वाली इच्छुक कंपनियों को अभिरुचि पत्र जमा करना था। वर्ष 2018 में भी इसे बेचने की कोशिश हुई, पर कोई इसे खरीदने के लिए तैयार नहीं हुआ, क्योंकि सरकार इसकी केवल 74 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचना चाहती थी और यह कर्ज के बोझ से दबी थी। वर्ष 2017 में भी इसकी 74 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का प्रयास किया गया था, पर इसे बेचने के लिए तय की गई अव्यावहारिक शर्तों के कारण इसे बेचा नहीं जा सका। 

खैर, केंद्र सरकार अब एयर इंडिया में 100 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की कोशिश कर रही है। जबकि सभी प्रकार के संसाधनों से लैस होने के नाते, एयर इंडिया अब भी हवाई जहाजों के तार्किक उपयोग के माध्यम से राजस्व में वृद्धि कर सकता है। जैसे, जिस मार्ग पर अधिक यात्रियों की आवाजाही है, वहां इसके फेरों को बढ़ाया जा सकता है। ऐसे विमानों का अधिक उपयोग किया जा सकता है, जो कम ईंधन की खपत करते हैं। इसे योजनाबद्ध तरीके से लाभदायक बनाया जा सकता है। भारतीय रेल, यूको बैंक, पंजाब नेशनल बैंक आदि ने भी अतीत में ऐसा जादू  किया है। ऐसे में एयर इंडिया को लाभ में लाना असंभव नहीं है। इसके सभी हितधारकों को उपलब्ध संसाधनों को कुशलता से प्रबंधित करना होगा और सरकार को इसके कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना होगा। 

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