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किसानी का संकट और मीडिया

Mon, 14 Aug 2017 10:51 AM IST
संदीप जोशी
संदीप जोशी Updated Mon, 14 Aug 2017 10:51 AM IST
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Agriculture Crisis and Media
संदीप जोशी

लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया था। आज अगर वही नारा लगाया जाए, तो शायद कुछ इस तरह होगा, ‘जय जवान, जाए किसान’। इसकी वजह यह है कि आज खाद्य आपूर्ति समस्या नहीं रह गई है।  तीन दशक से ग्रामीण जीवन और किसानी के अर्थशास्त्र पर पढ़ने-लिखने वाले पत्रकार पलागूमी साईनाथ ने पिछले दिनों दिल्ली में दो भाषण दिए। एक संपन्नता के वैचारिक गढ़ इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में, तो दूसरा गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के ‘सत्याग्रह मंडप’ में। एक भाषण अंग्रेजी में दिया, तो दूसरा हिंदी में। एक भाषण में आक्रामकता का आक्रोश था, तो दूसरे में विनम्र निवेदन। विचारों से समाज को झकझोरने वाले भाव दोनों भाषणों में थे।

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वर्षों पहले पी साईनाथ ने एवरीबडी लव्स अ गुड ड्राउट नाम की एक किताब लिखी थी, जिसका हिंदी अनुवाद तीसरी फसल के नाम से आया था। इसमें इसके ब्योरे हैं कि किस तरह दशकों से ग्रामीण भारत में अकाल के नाम पर सरकारी तंत्र ने अपने लिए तीसरी फसल काटी है। साईंनाथ ने समाज के इसी वैचारिक अकाल पर उनकी जमीनी पड़ताल की थी। आज किसानी के हालात बदतर हुए हैं। सरकारी इच्छाशक्ति नदारद रही है। व्यापार की वैश्विकता में लगे समाज को खेती-किसानी से कोई लेना-देना नहीं है। साईंनाथ ने बताया कि खेती से जुड़ी समस्याओं के मनगढ़ंत सरकारी आंकड़े जिस धौंस के साथ रखे जाते हैं, वह शर्मनाक है। इन्हीं सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए साईंनाथ ने यह निष्कर्ष निकाला कि नीतियां बनाने वालों को सही जमीनी समझ ही नहीं है। अब जब आंकड़े ही सही नहीं हैं, तो उनका आकलन भला सही कैसे हो सकता है? फिर आकलन अगर गलत है, तो सही नीतियां कैसे बनाई जा सकती है?
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नीति आयोग ने हाल की अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश में 53 प्रतिशत किसान हैं। तीस साल से पत्रकार के रूप में खेती-किसानी को देखने-समझने-लिखने वाले साईंनाथ कहते हैं कि नीति आयोग के आला अफसरों को यह नहीं मालूम कि किसान कौन है। साईंनाथ के मुताबिक, बेशक देश की 53 प्रतिशत आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है, लेकिन असलियत में मूल किसान देश में आठ प्रतिशत से भी कम हैं। अगर खेत मजदूर, मानसूनी किसान और खेतों पर काम करने वाली महिलाओं को जोड़ दें, तब भी देश में 24 प्रतिशत से अधिक किसान नहीं हैं। कड़वी हकीकत यह है कि किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं को कम करके दिखाने के लिए आंकड़ों से खेला गया। जब आत्महत्याओं की खबरें रोज अखबारों की सुर्खियां बनीं, तब नीति निर्धारकों ने उनको कम दिखाने के लिए आंकड़ों से खेलने का आसान रास्ता चुना। 
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पी साईंनाथ का मानना है कि राजनेताओं से लेकर सरकारी नीतिकारों और पत्रकारों तक में खेतों में जाकर जमीनी सच्चाई जानने की जागरूकता नहीं बची है। यह सब उसी कृषि प्रधान भारत में हो रहा है, जहां हर उत्पाद को जीडीपी के व्यापारिक तंत्र से तौलकर देखा जाता है।


खेती-किसानी के संकट को साईंनाथ अपनी पत्रकार बिरादरी की नाकामी भी मानते हैं। आज अखबारों में ग्रामीण मामलों की खबरें लगातार नदारद होती जा रही हैं। पत्रकारिता का उद्देश्य पाठकों को सही सूचना देने से भटक गया है। किसान उम्मीद लगाए, तो आखिर किससे? आसमान पर आस और जमीन पर जुताई के अलावा किसान वोट भी देता है। 31 प्रतिशत की  बहुमत सरकार को 24 प्रतिशत की आबादी पर भी ध्यान देना होगा।

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