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सजा में देरी के खिलाफ
सुधांशु रंजन
Updated Mon, 25 Dec 2017 07:04 PM IST
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सुधांशु रंजन
एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) के अनुसार, वर्तमान लोकसभा में 187 सदस्य (34.4 प्रतिशत) दागी हैं, जिनमें 113 के विरुद्ध संगीन आरोप हैं। कानून की हमेशा मंशा रही है कि राजनीति को अपराध से मुक्त रखा जाए। इसलिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 में प्रावधान है कि दो वर्ष या इससे अधिक अवधि के लिए जेल की सजा पाने वाले चुनाव लड़ने के अयोग्य हैं। धारा 8 (1), (2) एवं (3) के अनुसार, सजा की अवधि तथा उसके खत्म होने के बाद छह वर्ष तक के लिए यह अयोग्यता जारी रहती है।
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पर धारा 8 (4) दो वर्गों के बीच एक अंतर पैदा करता है- संसद या विधानमंडल के चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवार और जो पहले से सांसद या विधायक हैं। इस दूसरे वर्ग के लिए यानी जो सजा सुनाए जाने के वक्त सांसद या विधायक हैं, उनकी अयोग्यता आगामी तीन महीने तक लागू नहीं होती, और यदि उस दरम्यान उस फैसले के खिलाफ अपील दायर हो जाती है, तो उसके निष्पादन तक उसकी योग्यता समाप्त नहीं होगी। 19 जुलाई, 2013 को लिली थॉमसन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारा 8 (4) को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन बताते हुए उसे असांविधानिक करार दिया। इसी कारण लालू यादव एवं कुछ अन्य सांसदों/विधायकों की सदस्यता समाप्त हो गई। पर इससे समस्या का पूरा निदान नहीं निकला, क्योंकि मामले काफी लंबे खिंचते हैं। लालू के मामले में ही फैसला करीब 18 वर्ष बाद आया। जयललिता को शीर्ष अदालत ने गंभीर भ्रष्टाचार का दोषी पाया। पर यह निर्णय उनकी मौत के बाद आया। मुख्यमंत्री पद की प्रबल दावेदार शशिकला नटराजन इस निर्णय के कारण ही पद से वंचित रह गईं और जेल की हवा खा रही हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए शीर्ष अदालत में एक जनहित याचिका दायर की गई कि सांसदों/विधायकों के विरुद्ध लंबित आपराधिक मामलों का निष्पादन शीघ्र हो। इस पर केंद्र सरकार ने न्यायालय को बताया है कि उसने विशेष अदालत के गठन का फैसला किया है, जो एक साल के अंदर ऐसे सभी मामलों का निष्पादन करेगी। अभी 1,581 सांसदों/ विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं।
अब यह तय हो गया है कि विशेष अदालतें एक साल के अंदर सांसदों-विधायकों के खिलाफ चल रहे मामलों पर निर्णय सुना देंगी। पर सवाल है कि क्या एक साल में ऐसा हो पाएगा। अभी तक का अनुभव इसकी गवाही नहीं देता। कई ऐसे कानून हैं, जिनमें छह महीने या एक साल के अंदर मामले के निष्पादन का प्रावधान है। पर कई बार तो छह-छह महीने की तारीख लगती है। दूसरा सवाल फैसले की गुणवत्ता को लेकर है। यदि ऊपरी अदालत में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया जाए और व्यक्ति निर्दोष घोषित कर दिया जाए, तो उसकी क्या भरपाई होगी।
इसमें पहल राजनीतिक दलों को करनी चाहिए कि वे दागियों को टिकट न दें। पर वे इसके लिए तैयार नहीं हैं। इसमें जनता का भी दोष है। जनता उनका समर्थन क्यों करती है? ऐसे भी उदाहरण हैं कि जब कोई सांसद अयोग्य हो गया, तो उसने पत्नी को प्रत्याशी बनवा दिया और जितवा भी दिया। सवाल केवल कानून का नहीं है। पर जहां तक कानून का सवाल है, तो पूरी व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत है। ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि जो कोई कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर मामले को लंबा खींचता है या झूठे मुकदमे करता है, उस पर कठोर कार्रवाई एवं भारी जुर्माना हो।