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सीमापार आतंकवाद के खिलाफ

Thu, 17 Nov 2016 06:50 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Thu, 17 Nov 2016 06:50 PM IST
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Against cross border terrorism
मरिआना बाबर

पांच सौ और हजार रुपये की प्रचलित भारतीय मुद्रा के अमौद्रीकरण की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा को एक व्यापक राजनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक के रूप में देखा गया, जो मुल्क से नकली मुद्रा और काला धन के सफाये और नकली नोटों के जरिये सीमापार आतंकवाद को वित्तपोषित करने की कोशिश के खिलाफ एक साहसिक कदम है। लंबे समय से इसकी प्रतीक्षा की जा रही थी, क्योंकि अपनी हर भारत यात्रा के दौरान हमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के बारे में सुनने को मिलता था। अचानक की गई इस कार्रवाई ने ज्यादातर भारतीयों को हैरान और परेशान किया, जिसकी खबरें हर तरफ हैं और अब कुछ पाकिस्तानी भी भारत के इस नए कानून के बारे में वाकिफ हैं।

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कुछ पाकिस्तानियों ने, जो साल में कई बार भारत जाते रहते हैं, इस स्तंभकार को बताया कि हमारे पास भी पांच सौ रुपये के कुछ पुराने नोट हैं, जो आम तौर पर भारत यात्रा के दौरान हमारे पास बच जाते हैं। जब हम भारत में प्रवेश करते हैं, तो हमें टैक्सियों या कुलियों का भुगतान करने के लिए भारतीय मुद्रा की जरूरत होती है। हम इसे बदलवाना नहीं चाहते, क्योंकि यह बहुत छोटी राशि है। पर कोई ऐसा उपाय होना चाहिए कि हम इसे भारतीय चैरिटी के लिए दान कर सकें।
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भारत के इस बड़े नीतिगत फैसले को लेकर पाकिस्तान में हालांकि कोई खास हलचल नहीं है, न ही पाक मीडिया इसमें दिलचस्पी दिखा रहा है। इस समय वह पनामा पेपर लीक, जिसकी सुप्रीम कोर्ट में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके परिजनों के खिलाफ सुनवाई हो रही है और नियंत्रण रेखा पर लगातार जारी गोलीबारी, जिसमें इस हफ्ते आठ पाकिस्तानी सैनिक मारे गए हैं, को ज्यादा तवज्जो दे रहा है। चूंकि बड़ी संख्या में पाकिस्तानी भारत की यात्रा नहीं करते, इसलिए भी इसके प्रति उनमें दिलचस्पी नहीं है। पर इसका असर पाक आतंकवादियों और जेहादियों के उस छोटे से हिस्से पर जरूर पड़ेगा, जिनकी सीमापार आतंकवाद में संलिप्तता साबित हो चुकी है। इस पर उनकी प्रतिक्रिया जानना मुश्किल है, पर भारत सरकार का यह कदम अच्छा है। इससे आतंकियों की खूनी गतिविधियों को धक्का लगेगा।
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मुंबई आतंकी हमले में यह साबित हो चुका है कि जिन पाकिस्तानी आतंकवादियों ने सैकड़ों बेगुनाहों की जघन्य हत्या की थी, उनकी भारत के कुछ लोगों (स्लीपर सेल) ने मदद की थी। यह समझा जा सकता है कि उच्च मूल्य वर्ग की नकली मुद्रा का आतंकवाद में इस्तेमाल हो सकता है और अन्य जगहों पर आतंकी हमलों के लिए इसे ले जाने में आसानी होती है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पांच सौ और एक हजार रुपये के रूप में 80 फीसदी से ज्यादा मुद्रा बाजार में चलन में थी, जो भारी मात्रा में नकली मुद्रा के रूप में भी थी। सीमापार आतंकी गतिविधियों में शामिल रहने वाले आतंकियों को मोदी का यह कदम हतोत्साहित करेगा, क्योंकि भारत स्थित स्लीपर सेल के लिए हथियार खरीदने में नकली मुद्रा के साथ काले धन का उपयोग होता है। तो क्या दो हजार रुपये के जो नए नोट जारी किए गए हैं, वे भविष्य में अपनी नई सुरक्षा विशेषताओं के कारण नकली मुद्रा बनाने में बाधक बनेंगे?

पांच सौ और हजार रुपये के जो पुराने नोट थे, वे सुरक्षा के लिहाज से काफी कमजोर थे और नकली मुद्रा छापने के लिए आसानी से उनका नकल किया जा सकता था। मालूम पड़ता है कि भारत और पाकिस्तान को मुद्रा छापने के लिए एक ही देश सामग्री (इंक और सिल्वर धागा) उपलब्ध कराता था। सभी पाकिस्तानी नोटों में सिल्वर धागा होता है, जो इस बात की गारंटी है कि मुद्रा असली है। भारत ने सिक्योरिटी फीचर्स का निर्माण करने वाले देशों-अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी से कहा है कि पाकिस्तान को ये सामग्री न बेचें। लेकिन उन देशों के लिए ऐसा कर पाना मुश्किल है। आखिरकार यह एक व्यापारिक सौदा है और अगर ये तीनों देश इससे पैसा कमाते हैं तथा उनके पाकिस्तान से संपर्क हैं, तो वे ऐसा करना पसंद नहीं करेंगे। इसलिए भारत को या तो अपनी तकनीक में सुधार करना होगा या अन्य स्रोतों से इस संदर्भ में सहयोग लेना होगा, ताकि नकल की आशंका न रहे।

इस मुद्दे को ऑल इंडिया मज्लिस-ए-इतेहदुल मुसलमीन के प्रमुख असदद्दीन ओवैसी ने भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान, दोनों को एक ही देश करेंसी नोटों में इस्तेमाल होने वाले इंक और सिल्वर धागे की आपूर्ति करता है। उन्होंने जानना चाहा कि इससे निपटने के लिए सरकार के पास क्या रणनीति है।

भले ही पाकिस्तानी आतंकवादी सीमापार आतंकवाद में संलिप्त रहते हैं, जैसा कि अतीत में देखा गया है, तो भी किसी देश में किसी एक आतंकी गुट का नियंत्रण नहीं रहता। मानव और मादक पदार्थों की तस्करी की तरह आतंकवाद में भी अंतरराष्ट्रीय माफिया शामिल रहते हैं, जिन्हें हर देश में भीतर के लोगों से मदद मिलती है। स्थानीय लोगों की मदद के बगैर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देना वास्तव में बहुत मुश्किल है। ऐसा पठानकोट हमले में भी देखा गया कि आतंकियों ने स्थानीय लोगों की मदद से मादक द्रव्यों की तस्करी मार्गों का इस्तेमाल किया। शुरू में भले मोदी सरकार के इस कदम से आतंकवादियों और तस्करों को झटका लगेगा, लेकिन आने वाले वर्षों में वे फिर कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे। यह ऐसा मुद्दा है, जिसके प्रति सतर्क रहने की जरूरत है। आतंकवादी जिस दूसरे मार्ग का इस्तेमाल करते हैं, वह है हवाला। अगर उन्होंने पांच सौ और हजार रुपये के नोटों को जमा किया है, तो वे शीघ्र ही रद्दी हो जाएंगे, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से वे उसे पाने में सक्षम नहीं होंगे।


इसके साथ ही इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि आतंकवाद क्यों पनपता है और क्यों यह दोनों देशों में लगातार जारी है। बेशक आतंकवाद से कोई समझौता नहीं हो सकता, लेकिन उन मुद्दों का समाधान ढूंढना भी जरूरी है, जो आतंकवाद के प्रति दुष्प्रेरित करता है।

लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं

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